मक्खी को मकड़े का आमंत्रण
धूर्त मकडी ने छलकाया मकडी पर प्यार
अपनापन दिखाने के लिए मैं कैसे करूं आपका सत्कार
अपने दर पर लगाया मैंने आपकी पसंद की चीजों के भडार
उसे स्वीकार कर आप मुझ पर कर दें उपकार
अरे नहीं, नहीं मुझसे छुपा नहीं आपका यह श्रृंगार
इस मोह में पड़ना नहीं चाहता मैं एक भी बार
न कोई तुम सा सुन्दर, न कोई तुम सा समझदार, चमकती आँखें सुनहरे पर
आईना तरसता तुम्हें खुद में उतारने, मेरे घर पर
आ जाओ एक बार, न भूलेगा यह अहसान वह जिन्दगी
भर
जो कुछ भी आपने कहा उसका बहुत बहुत आभार
अभी चलता हूँ मैं, फिर कभी सुनूंगा ये
उदगार
अपने माँद में चली गई मकडी इन सारी बातों के बाद
वापस आयेगी यह मक्खी इसका था उसे पूरा विशवास
प्यारा सा छोटा सा एक जाला किया तैयार इस बार
बिछा दस्र्तरखान किया खुद को नए दावत के लिए तैयार
मकड़े के दरवाजे पर गूंजा एक मधुर संगीत
सुन जिसे बाबरी मक्खी बन गयी उसकी मीत
अपने सुन्दर आँखों, पंखों के समेटे पहुच गयी वह उसके घर
हाय! बेचारी मक्खी उलझी उस सुन्दर बिस्तर पर
सीढी में उलझी, पार्लर में पहुची बस आ न सकी वह फिर अपने घर
मेरी होविट की कविता के अनूदित अंश
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