Thursday, 5 September 2013

On this Special day: For all

 





नथुनी बाबू
        हम तीनों भाई बहन में भाई काफी मेधावी और समझदार माने जाते थे, हर क्षेत्र पर उनकी पकड़ थी. वहीं मैं, चुप चाप रहने वाली, दब्बू लड़की मानी जाती थी, इसलिए में लाइम लाईट में भी नहीं रहती थी.  पर आज भी हम तीनों अपने शिक्षक नथुनी बाबू” को खुद से अलग नहीं कर पाते। उनसे शायद मैंने पढाये गए विषय के अलावा कुछ ऐसी बातें सीखी जिसने मुझे एक अभिभावक और शिक्षिका बनाने में बहुत मदद की। मेरे दोनों भाइयों में जिसे हम  UNDERSTANDING कहते है कि नीव, तो जहां तक में समझती हूँ हमारे बाबूजी ने डाली, हाँ, उसे विकसित उन दोनों ने अपने अपने तरीके से किया। पर उनकी पहचान को भी नथुनी बाबू ने सँवारा था। उन दिनों सीवान में उनकी एक अच्छे और प्रभावी शिक्षक के रूप में ख्याति थी। उस समय नौकरी से अवकाश प्राप्त करने के बाद अपने घर पर ही वे लड़कों को ट्यूशन पढ़ाया करते थे। एक पाँव से मजबूर होने के कारण डंडा उनके व्यक्तित्व का अंग बन गया था। उनके कुछ नियम थे; वो किसी के घर नहीं जायेंगे; और बालिकाओं को नहीं पढ़ाएंगे। और वो अपने नियमों का पालन काफी दृढ़ता से किया करते थे। उनके दरवाजे पर डीएम, एसजडीएम की गाडी लगी होती थी, पर नथुनी बाबू उनके साथ उनके घर नहीं जाते थे। उनके बच्चे नथुनी बाबू की झोंपड़ी के छोटे से कमरे में पढ़ने आते थे।
       पर उन्होंने ने दूसरे नियम को तोड़ा अपने एक प्रिय छात्र के लिए। हाँ मेरे छोटे भाई के कहने पर वो मुझे पढ़ाने तैयार हो गए। और फिर धीरे धीरे लड़कियों का एक बैच तैयार हो गया। एक और वाकया में नहीं भूलती, दसवीं की परिक्षा के समय में बीमार थी, किसी के दरवाजे पर नहीं जाने वाले नथुनी बाबू मेरे हर पेपर के बाद मुझसे मिलने आते। कभी यह नहीं पूछते कि पर्चा कैसा हुआ, हमेशा ठीक हो कह कर चले जाते।
दसवी के बाद उनका और  मेरा साथ शिक्षक छात्रा के रूप में टूट गया। पर आज भी मुझे याद है बारहवीं की परीक्षा के बाद जब मै बाबूजी के साथ उनसे मिलने गयी तो वो एक दम से खड़े हो गए, “बेबिया आयी है””, कहते हुए।
इन सब घटनाओं ने शायद मुझे अपने बच्चों का सम्मान करना सिखा दिया।