मैं हूँ पानी की एक
बूँद
मैं हूँ अंशुल, सबा, रेशमा और हरप्रीत की बहन. ओह हो! आपने मुझे नहीं
पहचाना. मुझे आश्चर्य नहीं हुआ. आप मुझे कैसे पहचानेंगे मैं आपको नीले नीले आसमान
से देखती रहती हूँ, अक्सर आपके घर तक भी आती हूँ आप मेरा स्वागत भी करते हैं,
देखते भी हैं लेकिन मेरे इस परिचय से शायद वाकिफ नहीं हैं.
दरअसल मैं हूँ पानी की एक बूँद. आसमान में तैरने वाले बादल मेरा घर है.
वहां मैं अपने भाई बहनों और साथियों के साथ रहती हूँ. अपने आशियाने के साथ हम सब
नीले आसमान में इधर उधर तैरते इठलाते रहते हैं. तैरते, घूमते, इठलाते हम भाई बंधू,
दोस्त-बंधू जब बिलकुल करीब हो जाते हैं तो हमारा घर हमें अपने अन्दर समेट कर रख
नहीं पाता है. और फिर शुरू होती है हमारी दौड़. हमारी यह दौड़ हमें धरती तक यानी आपकी
दुनिया तक पहुंचा देती है. जब हम धरती की तरफ रुख करते हैं तो पूरी धरती बाँहें
फैलाए हमारा इंतजार करती नजर आती है.
ऊंचे ऊंचे पहाड़, नदियाँ, तालाब, समुद्र, कुएं, पेड़ पौधे यहाँ तक कि तुम
हमारा इन्तजार करते नजर आते हो. हमें भी तुम सबके पास आना काफ़ी भाता है. आसमान से
नीचे उतर मैं और मेरे भाई बंधू धरती पर मौजूद नदी, समुद्र झरनों के पानी के साथ तो
मिल ही जाते हैं, साथ ही तुम्हारे द्वारा बनाये गए कुओं, तालाब के पानी से भी
हमारी दोस्ती हो जाती है. इतना ही नहीं जमीन की मिट्टी हमें सोंख कर अपने अन्दर
समेट लेती है. क्यों न समेटे पेड़ पौधों की जरूरत जमीन के अन्दर मौजूद पानी से ही
तो पूरी होती है. यहाँ तक हैण्ड पम्प आदि जैसे उपकरण से तुम भी तो जमीन के अन्दर
से पानी निकाल कर उपयोग करते हो. ठीक ही है आखिर नदियाँ, झरने, तालाब तुम्हारे घर
के आँगन में तो मिलेंगे नहीं. इस तरह हम धरती पर मौजूद अपने तरह तरह के निवास में
कुछ दिनों तक डेरा डालते हैं.
कितने दिनों तक यहाँ रहें हमें वापस आसमान में आना होता है अपने हलके फुल्के तैरते इठलाते बादल के अन्दर. एक समस्या है वापस बादल तक पहुँचने के लिए हमें अपना रूप बदलना होगा. हल्के-फुल्के भाप का रूप लेना पड़ेगा. इसके लिए हमें गर्मी चाहिए. कोई बात नहीं सूरज दादा हैं न. बस उनकी चमकती बिखरती किरणें हमें अपनी गर्मी से भाप में बदल देती हैं. गर्मी पाकर हमारे यानी पानी के भाप में बदलने की प्रक्रिया को तुमने वाष्पीकरण का नाम दिया है. तो सीधे सादे शब्द में कहूँ तो सूरज की गर्मी से वाष्पीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है और हम भाप का रूप लेते हैं.
अब क्या है हमारा हल्का फुल्का रूप हमें ऊपर की तरफ चल पड़ने में सहायक होता है और हम चल पड़ते हैं अपनी दूसरी दुनिया की ओर. क्या पूछा आपने “हमारा तो रूप बदल गया अब मैं फिर से बूँद कैसे बनूंगी”? अरे बुद्धू ऊपर यहाँ आसमान में सूरज की गर्मी बहुत कम होती है और आप तो जानती ही हैं कि भाप को ठंढक मिली नहीं कि वह हमारा यानी पानी का शक्ल अख्तियार कर लेता है. अरे हाँ इस प्रक्रिया यानी हमारे भाप से पानी में बदलने की प्रक्रिया को तुम लोगों ने संघनन कहना शुरू किया है. तुम मनुष्य भी हर चीज को एक नाम दे डालते हो.
बस आसमान की दुनिया की ठंढ इस संघनन की प्रक्रिया से हमें बूंदों की शक्ल दे देती है. हम बूँदें अपने बादल वाले घर में डेरा डाल लेती हैं. मेरी ही तरह मेरे भाई बहन भी धरती से सैर कर वापस लौटते हैं. धीरे धीरे हमारा घर भर जाता है. हम सब खेलते मचलते हैं और जब बहुत सारे एक साथ हो जाते हैं तो फिर से हमारी यात्रा शुरू होती है. धरती से मिलने की यात्रा. इस तरह हमारा आना जाना लगा रहता है. अब चलती हूँ बाय.
कितने दिनों तक यहाँ रहें हमें वापस आसमान में आना होता है अपने हलके फुल्के तैरते इठलाते बादल के अन्दर. एक समस्या है वापस बादल तक पहुँचने के लिए हमें अपना रूप बदलना होगा. हल्के-फुल्के भाप का रूप लेना पड़ेगा. इसके लिए हमें गर्मी चाहिए. कोई बात नहीं सूरज दादा हैं न. बस उनकी चमकती बिखरती किरणें हमें अपनी गर्मी से भाप में बदल देती हैं. गर्मी पाकर हमारे यानी पानी के भाप में बदलने की प्रक्रिया को तुमने वाष्पीकरण का नाम दिया है. तो सीधे सादे शब्द में कहूँ तो सूरज की गर्मी से वाष्पीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है और हम भाप का रूप लेते हैं.
अब क्या है हमारा हल्का फुल्का रूप हमें ऊपर की तरफ चल पड़ने में सहायक होता है और हम चल पड़ते हैं अपनी दूसरी दुनिया की ओर. क्या पूछा आपने “हमारा तो रूप बदल गया अब मैं फिर से बूँद कैसे बनूंगी”? अरे बुद्धू ऊपर यहाँ आसमान में सूरज की गर्मी बहुत कम होती है और आप तो जानती ही हैं कि भाप को ठंढक मिली नहीं कि वह हमारा यानी पानी का शक्ल अख्तियार कर लेता है. अरे हाँ इस प्रक्रिया यानी हमारे भाप से पानी में बदलने की प्रक्रिया को तुम लोगों ने संघनन कहना शुरू किया है. तुम मनुष्य भी हर चीज को एक नाम दे डालते हो.
बस आसमान की दुनिया की ठंढ इस संघनन की प्रक्रिया से हमें बूंदों की शक्ल दे देती है. हम बूँदें अपने बादल वाले घर में डेरा डाल लेती हैं. मेरी ही तरह मेरे भाई बहन भी धरती से सैर कर वापस लौटते हैं. धीरे धीरे हमारा घर भर जाता है. हम सब खेलते मचलते हैं और जब बहुत सारे एक साथ हो जाते हैं तो फिर से हमारी यात्रा शुरू होती है. धरती से मिलने की यात्रा. इस तरह हमारा आना जाना लगा रहता है. अब चलती हूँ बाय.