यूं मिली आँख
भगवान ने काफी मनोयोग से एक नई रचना का निर्माण किया. उस रचना का नाम दिया
मनुष्य. हाथ, पाँव, चेहरा सब कुछ था उसके
पास, निर्माता की यह एक अनूठी रचना थी, इस रचना को देख वह खुद भी अचंभित हो रहे थे.
अपनी इस कृति को भी उन्होंने धरती पर पेड़, पौधों, पक्षी और अन्य जानवरों के साथ रहने
भेज दिया. मनुष्य धरती पर रहने आ गया लेकिन आँख के आभाव में उसे अनेक मुश्किलों का
सामना कर पड़ रहा था.
जी हाँ, सृजनकर्ता उसे आँख देना भूल गए थे. कुछ समय बाद भगवान
को अपनी इस गलती का अहसास हुआ. अपनी इस भूल का सुधार करने भगवान धरती पर आये. अब
आखिर क्या करें भगवान की नजर रास्ते में फुदकते गिलहरी पर पड़ी उन्होंने सोचा इस
गिलहरी की चमकती आँखें मनुष्य को दे देते हैं. गिलहरी से उसकी आँख लेने भगवान् आगे
बढे, लेकिन गिलहरी उनके हाथ में कहां आने वाली थी, यह लो, वह दो देखते देखते वह पत्तियों की ओट में न जाने कहां गायब हो गयी.
भगवान ने अपनी नजरें इधर उधर दौडानी शुरू कर दी. सामने से एक हिरन अपनी आँखें फैलाए
घास का मजा ले रहा था. बस इसे पकड़ता हूँ इस सोच के साथ पालनहारा उसकी तरफ बढ़े लेकिन
यहाँ भी उनसे चूक हो गयी. आहट पाते ही हिरण ने चौकड़ी भरी अब अपनी इस रचना को पकड़
पाना भगवान के लिए संभव नहीं हुआ. अब क्या करें इसी उधेड़-बुन के साथ इधर उधर नजरें
फेरते अल्लाह मियाँ की नजर सामने नदी के किनारे अपनी धीमी चाल के साथ टहलते कछुए
पर पडी.. भगवान की आँखें चमक गयीं यह तो भाग नही पायेगा इसकी गोल गोल आँखें के
चेहरे पर अच्छी भी लगेंगी, इस सोच के साथ आगे बढे भगवान. लेकिन यह क्या उन्हें देख
कछुए ने खुद को अपने खोल के अन्दर गायब कर लिया. ओह यहाँ भी असफलता.
अब कुछ सोचना
पड़ेगा शाम हो गयी थी. रात के जानवर और पक्षी इधर उधर घूमने लगे थे. इस बार भगवान्
जी ने एक उल्लू को दबोच लिया इसकी आँखें बड़ी और चमकदार भी हैं खुश होते हुए भगवान
ने अपनी हाथ बढ़ाया. ऊऊऊउह इसने ने तो बड़े जोर से काट खाया. उफ़ परेशान हो गए थे
भगवान अब उन्हें यह महसूस हुआ कि वह गलत दिशा में सोच रहे हैं. किसी जीवित जानवर
या पक्षी की आँखें लेना गलत है उन्हें कुछ और सोचना होगा, लेकिन क्या. इस उधेड़ बन
में डूबे भगवान शरीफा के पेड़ के नीचे बैठ गए. अचानक उनके पैर के पास शरीफा का बीज
गिरा. पेड़ पर बैठा तोता शरीफा का मजा ले रहा था. काले, चमकदार बीज को देख
सृजनकर्ता को जैसे खजाना मिल गया , उन्होंने बिल्कुल देर नहीं की उन बीज को उठाये
दौड़ कर अपनी नवीनतम रचना के पास गए और उसके चेहरे पर नाक के दोनों तरफ इन चमकते
बीज को सजा दिया. हा आखिरकार मैंने अपनी गलती सुधार ली. मनुष्य को भी दुनिया नजर
आने लगी उसने अपने सृजनकर्ता का आभार व्यक्त किया. भगवान निश्चिन्त हो कर अपने धाम
वापस चले गए. अपनी दो चमकती आँखों के साथ मनुष्य भी खुशी खुशी अपने काम में व्यस्त
हो गया.
एक दिन मनुष्य से मिलने कुछ परियां आईं. वह उनके सामने आ कर बैठीं थोड़ी
देर तक बैठी रहीं. यह क्या मानव बस उन्हें घूरे जा रहा है. जरा सी भी तमीज नहीं
है घर आये मेहमान का स्वागत कैसे करते हैं, इन्हें पता नहीं है. परियां नाराज हो कर चल पडीं, लेकिन कुछ
आगे बढ़ने पर उन्हें कुछ समझ में आया. ओह ओ! यह तो सो रहे है. इनके पास पलकें और भौं तो है नहीं सिर्फ पुतलियाँ हैं फिर इनका सोना जगना एक सा होता है. बेचारे
उन्हें पलकों और भौं की जरूरत है ऐसे तो उनकी आँखों को नुक्सान भी पहुँच सकता है.
यह सोच परियां वापस आयीं, छोटी छोटी पत्तियों की सहायता से मनुष्य की पलकें बनी और
मोर के पंख से बाल निकालकर भौं को आँखों के ऊपर सजाया गया. अरे यह क्या अब तो मानव
अपनी आँखों को बंद भी कर सकता है. मानव खुशी से झूम उठा और इस तरह उसे मिली भौं,
और पलक से सजी आँखें.
(लोक कथा पर आधारित)
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