जड़ का संसार
आज अपने छत पर मुस्कुराते फूल पौधों को देख तृप्ति तृप्त हो रही है. छोटी छोटी
पत्तियों वाले दूधी से लेकर, झाड़ियों के रूप में फैलने वाले गुलाब, कचनार, बोगैनविलिया, और चम्पा, मीठा
नीम, और अच्छी खासी ऊँचाई को प्राप्त करने
वाले नागफनी उसके छत की ख़ूबसूरती को बढ़ा रहे थे. अरे उधर कोने में देखो मनी प्लांट
की लता के बगल में बांस कैसे अपनी पीठ सीधी रख इठला रहां है.
“कौन इठला रहा है यह सीधा खडा बांस का तना. इठलाएगा ही उसे कौन सा अंतर पडा है
फर्क तो हम पर पडा है.
अरे! आवाज कहां से आ रही है तृप्ति ने गर्दन घुमा कर चारो तरफ देखा. कोई नजर
नहीं आ रहा बस पूरे छत पर इन पौधों के अलावा दो मोढ़े और दो मैना नजर आ रहे हैं.
लगता है मुझे “भ्रम हुआ है तृप्ती ने अपना कान खुजाते हुए सोचा.
“उफ़ कितना दम घोंटू है.” फिर से आवाज आई, इस बार तृप्ती बुरी तरह चौंक गयी, यह
धोखा नहीं हो सकता है, कुछ तो आस पास में है जो कुछ कहना चाह रहा है. अचानक उसकी नजर
चम्पा के गमले पर पडी कुछ हलचल है वहां. वह डरते डरते दबे पाँव गमले तक पहुंची.
क्या है यहाँ, उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था, उसने धीरे धीरे चम्पा के गमले ली
मिट्टी को छुआ वहीं कुछ हिल रहा था. “तुम क्यों घबरा रही हो, तुम्हें पसीना क्यों
आ रहा है. तुम्हें तो हवा, धूप अच्छे बुरे
मित्र, रिश्तेदार सभी का साथ मिलता रहता है.” इस बार आवाज तेज थी.
“त त तुम कौन हो और मुझे डरा क्यों रहे हो. सामने आओ,
“हा हा मैं सामने ही तो नही आ सकता और आना भी नहीं चाहता. तुम्हें और इस तना
और टहनियों को ही मुबारक हो यह रोशनी भरी दुनिया. मुझे यह रोशनी से भरी दुनिया कभी
भी नही भाती है. मेरी दुनिया तो जमीन के अन्दर की दुनिया है, शांत, बहुत अंधेरी
किन्तु जीवन से भरपूर.”
“तुम जमीन के अन्दर हो क्या वाकई कोई भूत हो.” तृप्ती अब वाकई परेशान हो उठी.
“ जमीन के अन्दर रहने कहां दिया है तुमने मुझे यहाँ लाकर गमले की मिट्टी में
डाल दिया है. एक बार भी मेरे बारे में नही सोचा. बस खुद के संतोष और दिखावे का
ख्याल रखा.”
“गमले के मिट्टी में?” अब तह तृप्ती पसीने में नहा चुकी थी.
“तो पेड़ पौधे की जड़ के बिना तुम्हारे पौधे, फूल मुस्कुरा सकते हैं क्या.”
“ओह तो यह जड़ की आवाज है. लेकिन मैंने तुम्हारे साथ क्या ज्यादती की है पौधे
के अनुसार गमले हैं. देखो छोटे पौधे तो छोटे गमलों में हैं लेकिन बढ्दो को हमने
बड़े बड़े गमले में डाला है. फिर नियमित रूप से पानी और खाद देते रहते हैं.” फिर तुम
क्यों दुखी हो जड़ की बातों ने तृप्ती को परेशान किया.
“हाँ बड़ा गमला दे दिया, एक दो दिन में पानी डाल दिया और हो गयी हमारी जरूरत
पूरी. ऐसे ही सोचते हो तुम मनुष्य. देखो उस जमीन को जिसके अन्दर हम फैलते हैं,
जितनी मर्जी अपनी बाँहें फैलाते हैं. तुमने कभी सोचा है आजादी मिलने पर हम धरती
माँ के वक्ष तक पहुंचने की काबिलियत रहते हैं.
हमारी बाँहें दूर दूर तक फ़ैल कर जमीन के अन्दर की दुनिया से अपना सम्बन्ध
बनाती हैं. तुम्हें पता है दुबला पतला नजर आने वाले राई के पौधे की जड़ यानी हम लगभग
5 किलोमीटर प्रति दिन के हिसाब से बढ़ती हैं. मक्का, कपास आदि जैसे पौधों की जड़ें
भी इन पौधों से बड़ी होती हैं. इनके पास तकरीबन 14 लाख शाखाएं होती हैं. जमीन के
अन्दर हमारी बाँहें दूर दूर फ़ैल कर हमारा दायरा बढाती हैं. कितने तरह के दोस्त
बनाती हैं. हमारी बांहों से निकलने वाले नन्हे नन्हे रेशे जमीन के अन्दर पाए जाने
वाले मिट्टी के मासूम कणों, उनके बीच पाए जाने वाले पानी की बूंदों से एक प्यारा
सा सम्बन्ध बनाते हैं, उनके बीच की खींचा तानी, लेन-देन हमारी जिन्दगी का आधार
बनती है.”
“तुम्हें किसने मना किया है गमले की मिट्टी को हम इसीलिये तो गीला रखते हैं,
ताकि तुम्हारे और पानी के बीच वह रिश्ता स्थापित हो. साथ ही हम मिट्टी में वह सब कुछ मिलाते हैं जिसकी तुम्हें जरूरत होती है ”
तृप्ती को दोषी बनना मंजूर नहीं था.
“हाँ, पानी तो तुम दे देती हो, इतना ही नहीं हमारी जरूरतों का भी काफी ख्याल रखती हो. मजबूरी है तुम्हारी हंसती
खिलखिलाती पत्तियाँ, रंगीनियाँ बिखेरने वाले फूल सब हमारे और पानी के इस रिश्ते पर
आधारित जो ठहरे. देखो मैं तुम्हें दोष नहीं दे रहा बस अपने मन की बात कह रहा हूँ.
उन दिनों को याद कर रहा हूँ जब मैं जिसे तुम शायद मूल जड़ कहते हो बीज में छुपे
मूलांकुर के रूप में बाहर आया था. रोशनी मुझे अच्छी नहीं लगी थी, मैंने चुपचाप
अपना मुँह मिट्टी के अन्दर घुसा लिया था. मिट्टी की नमी उसके अन्दर की गमक सब कुछ
कितनी मनोहारी थी मैं तुम्हें नहीं बता सकता. धरती की मिट्टी से बहुत प्यार से
मुझे अपने आगोश में लिया था. फिर मिट्टी के एक एक कण इनके बीच छिप कर बैठी पानी की
बूँदें, छोटे छोटे कीड़े, जीवाणु,हवा यहाँ तक की पहले से अपनी जगह बना चुकी दूसरे
पौधों की जड़ें सबने मेरा स्वागत किया. इस गर्माहट ने जमीन के अन्दर की दुनिया से
जल्दी से परिचित होने की मेरी चाहत बढ़ा दी. फिर क्या था मैंने तेजी से नीचे उतरना
शुरू किया साथ ही चारो तरफ अपनी बाहें फैला कर अपनी जान पहचान बढानी शुरू कर दी. तुम्हें
पता है यह जो रूखी सूखी मिट्टी नजर आती है तुम्हें दरअसल खजाना है खजाना. इसके
अन्दर उतर कर इससे दोस्ती करने पर पता चलता है. अनेक तरह के लवण भरे हैं. खट्टे,
मीठे, कडवे. अरे आँखें मत फैलाओ मुझे स्वाद का पता नहीं है मैं तो बस यूं ही कह रहा
था. स्वाद नहीं है हमारे पास किन्तु हम इतना समझ जाते हैं कि इनमें से हमें कौन भाएगा.
फिर क्या हमारे रेशे और पानी की बूंदों के बीच होने वाली खींचा तानी का फ़ायदा उठा
हम इन लवण का आनंद लेते हैं. बहुत आनद मिलता है उस नोक झोंक में. तुम्हें पता है
जमीन के अन्दर की जो हमारी दुनिया है वहां भी लेन-देन, लड़ाई-झगड़ा, कहा-सुनी,
रूठना-मनाना सब चलता रहता है. यहाँ हमारे किरायदार, पड़ोसी, दुकानदार-खरीददार सब होते हैं. तुम्हें अजीब लग रही हैं मेरी
बातें. चलो मैं तुम्हारी उलझन सुलझाने की कोशिश करता हूँ. अब इस राइजोबियम जीवाणु
को रहने के लिए घर चाहिए. उसके और हमारे दाल परिवार के सदस्यों के बीच में डील हो
गयी है. अब दाल परिवार के पौधों की जड़ें उन्हें कमरा दे देती हैं, किराए के तौर पर
उन्हें नाइट्रेट या नाइट्राईट मिल जाता है. मजेदार बात यह है कि इस किराए का लाभ
सिर्फ इन मकानमालिकों को ही नहीं मिलता. इन
पौधों के पड़ोसी, यहाँ तक कि उस जमीन पर कुछ दिन बाद बसेरा बनाने वाले भी उस किराए
से लाभान्वित होते हैं. है न अनोखी डील. तुम्हारी तरह हमेशा हम एक जैसा किराया
नहीं लेते हैं. यह सब कुछ मकानमालिक और
किरायदार के स्वभाव और रिश्ते पर निर्भर करता है. हमारा दूसरा किरायदार एक फफूंद
है. इसे हमारे घर के अन्दर जाना पसंद नहीं, हमसे लिपटा बाहर ही पडा रहता है. इसे
हमारी पत्तियों द्वारा बनाया गया खाना बहुत पसंद है. सच कहा पेइंग गेस्ट है. बदले
में यह जमीन से पानी और उसमें घुले लवण हमें देता है. इस तरह हमारा काम आसान होता
है.
अब यह मत सोचना यहाँ सारे हमारे दोस्त ही हैं. कई दुश्मन भी मौजूद हैं यहाँ,
जो कभी हमारा पानी चूसते हैं, हमें बीमार बनाते हैं, यहाँ तक कि काट भी डालते हैं.
इन दुशमनों से भी निपटने का उपाय हम सोचते रहते हैं तरह तरह के हथियार ढूँढते है
इस नमी भरी अंधेरी दुनिया में. इन सब को तो छोड़ दो. हम जड़ें
भी एक दूसरे की जड़ काटने में लगी रहती हैं. हम सब भी जमीन के खजाने को
लूटने में लगे रहते हैं. जिसके हाथ जो लग जाए. ऐसे में अधिकतर ऐसा होता है बलशाली
बाजी मार ले जाता है. कमजोर या तो हथियार डालता है या खुद की आदतों को बदल
बलशालियों के मुँह पर तमाचा जमाता है.
इस लड़ाई-झगड़े, दोस्ती-मनुहार में भी कई चीजें सीखते हैं, कभी कुछ नया कर जाते
हैं जिसपर हम ही नहीं पूरी प्रकृति नाज करती है. तुम्हें पता है जमीन के अन्दर
रहने वाले कीड़े-मकौड़े और दूसरे जानवर हमारा नुक्सान करते हैं लेकिन वह अनजाने में
हमारे मदद भी कर देते हैं. वह मिट्टी को चबा चबा कर ढीला करते हैं. मिट्टी के ढीला
होते ही हवा को इसके अन्दर आने का मौक़ा मिलता है और हम जड़ चैन की सांस लेते हैं.
यानी खुल कर सांस लेते हैं. तुम सोच रहे होगे कि मैंने दूसरे जीव जंतुओं से अपनी
दोस्ती की बात तो कर ली लेकिन अपने समुदाय से सिर्फ अपने लड़ाई झगड़े की बात की. अरे
यह लड़ाई-झगडा ही तो हमें करीब लाता है देखा है न तुमने कई बार मजबूत और बलशाली
बिरादर अपने कमजोर साथी को अपने ऊपर आसरा दे देते हैं. तुम ध्यान देना बहुत बार तुम
हमें आपस में गलबहियां डाले एक दूसरा का साथ देते भी पाओगे. आखिर का जमीन को काटने
से हम सब मिल जुल कर ही तो रोकते हैं.
अब मेरी बातों को दिल पर मत लेना मैंने तो यूं ही बक बक कर ली. अपनी उस
साझेदारी की दुनिया को मिस कर रहा था इसलिए. ऐसे आज जब जमीन पर जगह कम है तुमने
हमें गमले में जगह दी यह भी काफी है मेरे लिए. बाय.
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