Monday, 5 December 2016

जल चक्र की कहानी बूँद की जबानी

मैं हूँ पानी की एक बूँद

मैं हूँ अंशुल, सबा, रेशमा और हरप्रीत की बहन. ओह हो! आपने मुझे नहीं पहचाना. मुझे आश्चर्य नहीं हुआ. आप मुझे कैसे पहचानेंगे मैं आपको नीले नीले आसमान से देखती रहती हूँ, अक्सर आपके घर तक भी आती हूँ आप मेरा स्वागत भी करते हैं, देखते भी हैं लेकिन मेरे इस परिचय से शायद वाकिफ नहीं हैं.

दरअसल मैं हूँ पानी की एक बूँद. आसमान में तैरने वाले बादल मेरा घर है. वहां मैं अपने भाई बहनों और साथियों के साथ रहती हूँ. अपने आशियाने के साथ हम सब नीले आसमान में इधर उधर तैरते इठलाते रहते हैं. तैरते, घूमते, इठलाते हम भाई बंधू, दोस्त-बंधू जब बिलकुल करीब हो जाते हैं तो हमारा घर हमें अपने अन्दर समेट कर रख नहीं पाता है. और फिर शुरू होती है हमारी दौड़. हमारी यह दौड़ हमें धरती तक यानी आपकी दुनिया तक पहुंचा देती है. जब हम धरती की तरफ रुख करते हैं तो पूरी धरती बाँहें फैलाए हमारा इंतजार करती नजर आती है.

ऊंचे ऊंचे पहाड़, नदियाँ, तालाब, समुद्र, कुएं, पेड़ पौधे यहाँ तक कि तुम हमारा इन्तजार करते नजर आते हो. हमें भी तुम सबके पास आना काफ़ी भाता है. आसमान से नीचे उतर मैं और मेरे भाई बंधू धरती पर मौजूद नदी, समुद्र झरनों के पानी के साथ तो मिल ही जाते हैं, साथ ही तुम्हारे द्वारा बनाये गए कुओं, तालाब के पानी से भी हमारी दोस्ती हो जाती है. इतना ही नहीं जमीन की मिट्टी हमें सोंख कर अपने अन्दर समेट लेती है. क्यों न समेटे पेड़ पौधों की जरूरत जमीन के अन्दर मौजूद पानी से ही तो पूरी होती है. यहाँ तक हैण्ड पम्प आदि जैसे उपकरण से तुम भी तो जमीन के अन्दर से पानी निकाल कर उपयोग करते हो. ठीक ही है आखिर नदियाँ, झरने, तालाब तुम्हारे घर के आँगन में तो मिलेंगे नहीं. इस तरह हम धरती पर मौजूद अपने तरह तरह के निवास में कुछ दिनों तक डेरा डालते हैं. 

कितने दिनों तक यहाँ रहें हमें वापस आसमान में आना होता है अपने हलके फुल्के तैरते इठलाते बादल के अन्दर. एक समस्या है वापस बादल तक पहुँचने के लिए हमें अपना रूप बदलना होगा. हल्के-फुल्के भाप का रूप लेना पड़ेगा. इसके लिए हमें गर्मी चाहिए. कोई बात नहीं सूरज दादा हैं न. बस उनकी चमकती बिखरती किरणें हमें अपनी गर्मी से भाप में बदल देती हैं. गर्मी पाकर हमारे यानी पानी के भाप में बदलने की प्रक्रिया को तुमने वाष्पीकरण का नाम दिया है. तो सीधे सादे शब्द में कहूँ तो सूरज की गर्मी से वाष्पीकरण की प्रक्रिया शुरू होती है और हम भाप का रूप लेते हैं. 

अब क्या है हमारा हल्का फुल्का रूप हमें ऊपर की तरफ चल पड़ने में सहायक होता है और हम चल पड़ते हैं अपनी दूसरी दुनिया की ओर. क्या पूछा आपने “हमारा तो रूप बदल गया अब मैं फिर से बूँद कैसे बनूंगी”? अरे बुद्धू ऊपर यहाँ आसमान में सूरज की गर्मी बहुत कम होती है और आप तो जानती ही हैं कि भाप को ठंढक मिली नहीं कि वह हमारा यानी पानी का शक्ल अख्तियार कर लेता है.  अरे हाँ इस प्रक्रिया यानी हमारे भाप से पानी में बदलने की प्रक्रिया को तुम लोगों ने संघनन कहना शुरू किया है. तुम मनुष्य भी हर चीज को एक नाम दे डालते हो. 

बस आसमान की दुनिया की ठंढ इस संघनन की प्रक्रिया से हमें  बूंदों की शक्ल दे  देती है. हम बूँदें अपने बादल वाले घर में डेरा डाल लेती हैं. मेरी ही तरह मेरे भाई बहन भी धरती से सैर कर वापस लौटते हैं. धीरे धीरे हमारा घर भर जाता है. हम सब खेलते मचलते हैं और जब बहुत सारे एक साथ हो जाते हैं तो फिर से हमारी यात्रा शुरू होती है. धरती से मिलने की यात्रा. इस तरह हमारा आना जाना लगा रहता है. अब चलती हूँ बाय.


Sunday, 4 December 2016

यूं मिली मनुष्य को उनकी आँख

यूं मिली आँख 

भगवान ने काफी मनोयोग से एक नई रचना का निर्माण किया. उस रचना का नाम दिया मनुष्य. हाथ, पाँव, चेहरा सब कुछ था उसके पास, निर्माता की यह एक अनूठी रचना थी, इस रचना को देख वह खुद भी अचंभित हो रहे थे. अपनी इस कृति को भी उन्होंने धरती पर पेड़, पौधों, पक्षी और अन्य जानवरों के साथ रहने भेज दिया. मनुष्य धरती पर रहने आ गया लेकिन आँख के आभाव में उसे अनेक मुश्किलों का सामना कर पड़ रहा था. 

जी हाँ, सृजनकर्ता उसे आँख देना भूल गए थे. कुछ समय बाद भगवान को अपनी इस गलती का अहसास हुआ. अपनी इस भूल का सुधार करने भगवान धरती पर आये. अब आखिर क्या करें भगवान की नजर रास्ते में फुदकते गिलहरी पर पड़ी उन्होंने सोचा इस गिलहरी की चमकती आँखें मनुष्य को दे देते हैं. गिलहरी से उसकी आँख लेने भगवान् आगे बढे, लेकिन गिलहरी उनके हाथ में कहां आने वाली थी, यह लो, वह दो देखते देखते  वह पत्तियों की ओट में न जाने कहां गायब हो गयी. 

भगवान ने अपनी नजरें इधर उधर दौडानी शुरू कर दी. सामने से एक हिरन अपनी आँखें फैलाए घास का मजा ले रहा था. बस इसे पकड़ता हूँ इस सोच के साथ पालनहारा उसकी तरफ बढ़े लेकिन यहाँ भी उनसे चूक हो गयी. आहट पाते ही हिरण ने चौकड़ी भरी अब अपनी इस रचना को पकड़ पाना भगवान के लिए संभव नहीं हुआ. अब क्या करें इसी उधेड़-बुन के साथ इधर उधर नजरें फेरते अल्लाह मियाँ की नजर सामने नदी के किनारे अपनी धीमी चाल के साथ टहलते कछुए पर पडी.. भगवान की आँखें चमक गयीं यह तो भाग नही पायेगा इसकी गोल गोल आँखें के चेहरे पर अच्छी भी लगेंगी, इस सोच के साथ आगे बढे भगवान. लेकिन यह क्या उन्हें देख कछुए ने खुद को अपने खोल के अन्दर गायब कर लिया. ओह यहाँ भी असफलता. 

अब कुछ सोचना पड़ेगा शाम हो गयी थी. रात के जानवर और पक्षी इधर उधर घूमने लगे थे. इस बार भगवान् जी ने एक उल्लू को दबोच लिया इसकी आँखें बड़ी और चमकदार भी हैं खुश होते हुए भगवान ने अपनी हाथ बढ़ाया. ऊऊऊउह इसने ने तो बड़े जोर से काट खाया. उफ़ परेशान हो गए थे भगवान अब उन्हें यह महसूस हुआ कि वह गलत दिशा में सोच रहे हैं. किसी जीवित जानवर या पक्षी की आँखें लेना गलत है उन्हें कुछ और सोचना होगा, लेकिन क्या. इस उधेड़ बन में डूबे भगवान शरीफा के पेड़ के नीचे बैठ गए. अचानक उनके पैर के पास शरीफा का बीज गिरा. पेड़ पर बैठा तोता शरीफा का मजा ले रहा था. काले, चमकदार बीज को देख सृजनकर्ता को जैसे खजाना मिल गया , उन्होंने बिल्कुल देर नहीं की उन बीज को उठाये दौड़ कर अपनी नवीनतम रचना के पास गए और उसके चेहरे पर नाक के दोनों तरफ इन चमकते बीज को सजा दिया. हा आखिरकार मैंने अपनी गलती सुधार ली. मनुष्य को भी दुनिया नजर आने लगी उसने अपने सृजनकर्ता का आभार व्यक्त किया. भगवान निश्चिन्त हो कर अपने धाम वापस चले गए. अपनी दो चमकती आँखों के साथ मनुष्य भी खुशी खुशी अपने काम में व्यस्त हो गया.

एक दिन मनुष्य से मिलने कुछ परियां आईं. वह उनके सामने आ कर बैठीं थोड़ी देर तक बैठी रहीं. यह क्या मानव बस उन्हें घूरे जा रहा है. जरा सी भी तमीज नहीं है घर आये मेहमान का स्वागत कैसे करते हैं, इन्हें पता नहीं है. परियां नाराज हो कर चल पडीं, लेकिन कुछ आगे बढ़ने पर उन्हें कुछ समझ में आया. ओह ओ! यह तो सो रहे है. इनके पास पलकें और भौं तो है नहीं सिर्फ पुतलियाँ हैं फिर इनका सोना जगना एक सा होता है. बेचारे उन्हें पलकों और भौं की जरूरत है ऐसे तो उनकी आँखों को नुक्सान भी पहुँच सकता है. यह सोच परियां वापस आयीं, छोटी छोटी पत्तियों की सहायता से मनुष्य की पलकें बनी और मोर के पंख से बाल निकालकर भौं को आँखों के ऊपर सजाया गया. अरे यह क्या अब तो मानव अपनी आँखों को बंद भी कर सकता है. मानव खुशी से झूम उठा और  इस तरह उसे मिली भौं, और पलक से सजी आँखें.



(लोक कथा पर आधारित)