Friday, 29 May 2015

सैर की सैर



सैर की सैर
सैर को अपनी रूटीन में शामिल कर लो. इस तरह की हिदायद हम सबको मिलती रहती है. बहुत बार तो फोन पर भी बात- चीत के दौरान भी हमारे अपने पूछ डालते हैं, सैर करना बंद तो नहीं किया. आखिर क्यों न हो यह चिंता! हमारी lifestyle और अभी के मौसम के बदलते मिजाज ने हमें अनेक तरह के चहरदीवारों में कैद कर रखा है. वह घर की हो या आफिस की या फिर कार की या मेट्रो की हम दिन भर अन्दर ही तो रहते हैं.  अपनी सीट पर बैठ कर ही तो हम दिन गुजारते हैं; चाहे वह आफिस की सीट हो या घर की कुर्सी या कार, बस मेट्रो की सीट.  हाँ कभी कभी खड़े भी रहना होता है. 
काम नहीं होता या हम काम नहीं करते ऐसा तो नहीं है, काम तो शायद पहले के लोंगो से अधिक करते हैं, लेकिन काम का स्वभाव जो बदल गया है. इसलिए अपने पैरों को चलाने के लिए और यह याद रखने के लिए की मनुष्य अपने पैरों पर चलता भी है सैर अत्यावश्यक है.
बड़े शहर हों या छोटे सुबह सुबह या फिर शाम को सड़कों पर या पार्क में भागते हुए लोग मिल जायेंगे. बड़े शहरों में तो उन स्पाट पर जहां सैर किया जाता है आपको सुबह सुबह या शाम को कार की भीड़ नजर आ जायेगी. सैर करना है इसका मतलब यह तो नहीं कि हम घर से ही चल कर आयें. सड़क पर जगह घेरेंगे नहीं तो पता कैसे चलेगा सैर हो रहा है. 
खैर, मैं भी इस सैर वाले तबके में शामिल हूँ. मुझे सुबह सुबह यह काम कर लेना अच्छा लगता है. अभी दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस में हूँ तो विश्वविद्यालय का गार्डेन चुना है. ऐसे काफी लोग रिज भी जाते हैं. सुबह पांच बजे वहां उतनी भीड़ नहीं होती, 15-20 लोग टहलते नजर आते हैं. धीरे धीरे यह संख्या पांच से छ गुनी बढ़ जाती है.
अब सैर करते समय आँख और दिमाग तो खुला ही होता है, इसलिए आस पास नजर जाती रहती है. गार्डेन में काफी जगह है. सुबह पांच बजे ही गार्डेन के एक लान पर वरिष्ठ नागरिकों का एक दल आ जाता है, योगा क्लास करने. सिखाने वाले भी वरिष्ठ नागरिक ही हैं. फिर धीरे धीरे शुरू होता है उनका तरह तरह का आसन. मैं अपने प्रत्येक चक्कर में उनके अलग अलग आसन देखती हूँ. कभी सब पीठ के बल लेटे पैरों को ऊपर कर स्थिर करने की कोशिश में नजर आते हैं, कुछ कर भी लेते हैं, तो कभी पेट के बल लेट कर खुद को पर्वतासन में लाने की कोशिश में लगे रहते हैं. कभी अपने कधों, बांहों आदि को घुमाते नजर आते हैं, तो कभी आसन बाँध कर (कुछ के पैर खुले होते हैं) अनुलोम-विलोम करने की मुद्रा में. थोड़ा मुश्किल तो होता होगा इनके लिए लेकिन 15-20 लोंगो की उपस्थिति रोज ही दर्ज हो जाती है.
लान की दूसरी तरफ अलग अलग समूह नजर आते हैं, कोई दो के समूह में होता है, तो कोई तीन या चार तो कोई अकेला होता है. बहुत से लोग बस घास पर चलते नजर आते हैं आपस में बात करते हुए आ फिर अकेले ही. कुछ  कमर को घुमा कर अपनी waist-line सही करते नजर आते हैं. कुछ खुद से योगा के अलग अलग आसन करते और एक दूसरे को सिखाते नजर आ जाते है. 
बगीचे की तरफ जाने पर 5.45 के आस पास एक दूसरा सीनियर सिटिजन का समूह नजर आता है जो लान के बगल में बने चबूतरे पर बैठ पहले गायत्री मन्त्र और फिर तरह तरह के भजन का पाठ करता नजर आता है. इसे पाठ करना ही कहेंगें, क्योंकि लय  में बंध पाना हम सब के लिए थोड़ा कठिन तो होता ही है, और फिर यह तो सुबह की कोशिश है, एक सही शुरूआत की कोशिश. 
फिर अलग अलग छोटे छोटे पत्थर पर अलग अलग उम्र के पुरुष महिलायें किसी न किसी क्रिया में मगन नजर आते हैं. हाँ घास पर नंगे पाँव चलने वालों की संख्या भी कम नहीं है.
एक प्रमुख क्रिया की चर्चा नहीं हुई अभी तक, वह है शुद्ध सैर करने वाले जमात की. यह सबसे बड़ी जमात है, लेकिन विश्विद्यालय गार्डेन के इस छोटे से इकोसिस्टम के इस जमात में भी काफी विविधता है. एक बड़ा ग्रुप नजर आता है जो देश के हालात सरकार और नेताओं की खास्ता हालत से दुखी और निराश नाराज आता है. समस्याओं की गंभीरता के हिसाब से उनकी चाल भी बदलती है. दूसरा समूह व्यापार के उतार चढ़ाव की बातों में मशगूल होता है उसे किसी चीज की जल्दी नजर नहीं आती न तो चर्चा ख़त्म करने की न ही दूरी को जल्दी जल्दी तय करने. 
कुछ छोटे छोटे समूह भी होते हैं जिनके बीच भी चर्चा चलाती रहती है, लेकिन वो थोड़े गंभीर नजर आते हैं और अपनी गति को बनाए रखने पर भी ध्यान देते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य सैर होता है इसलिए अगर उसपर असर आता है तो वह समूह छोड़ना पसंद करते हैं. कई पति, पत्नी, भाई-बहन, दोस्त आदि भी आते हैं. समूह में शामिल सदस्य की संख्या घटती बढ़ती रहती है. महिलाओं के भी अलग अलग तरह के समूह होते हैं और उनके बीच चल रही चर्चा का विषय भी विविध है. 25-30 वर्ष के बीच की महिलायें अक्सर बच्चों, उनके स्कूल, पढाई को लेकर चिंतित नजर आती और एक दूसरे को टिप्स देती-लेती नजर आती हैं. वहीं कुछ बच्चों के विषय और करियर के चुनाव पर विचार-विमर्श करती नजर आती हैं. टी वी सीरियल और बढ़ती मंहगाई भी उनकी चर्चा का मुख्य मुद्दा होता है. 
हर किसी के चलने यानी इस सैर की प्रक्रिया को अंजाम देने का अंदाज भी जुदा होता है. एक लड़के और लड़की की चाल को देख ऐसा महसूस होता है कि उन्हें सेना में होना चाहिए, सीधी पीठ और लम्बे लम्बे डग, चाल में काफी तेजी और तय लक्ष्य. उनकी टी-शर्ट पर ‘सेना’ लिखा हुआ भी है. तो कुछ होते हैं ठीक उल्टे ट्रैक पर कानों में इयर फोन चाल में मस्ती. कुछ मेरी तरह होते हैं अपनी गति को बढाने की कोशिश में लगे हुए. कुछ थोड़ी दूर चल कर बैठ कर अपनी बातों को नए गियर में डालते हैं और फिर चलने की सोचते हैं, तो कुछ चाल की गियर को बदल बातों से दूर चले जाते हैं. किसी को चलते चलते हर किसी का अभिवादन करना पसंद है तो कोई अपनी आँखें को खुद पर जमाए रखता है. वहीं कुछ चलते चलते चिड़ियों के लिए दाना भी फैला जाते हैं, और बाकी उन चिड़ियों से बच  कर निकल जाते हैं.  और ऐसे ही चलती रहती है इस  सैर की सैर.  

Sunday, 17 May 2015

कीड़े मकौड़े की नींद कितनी जरूरी




चुपके से आ जा री अँखियन में निंदिया आ जा री आ जा
हर समय घूमते –फिरते, उड़ते, लड़ते-भिड़ते, खाते-पीते, काटते रहने वाले ये कीड़े मकौड़े कभी आराम भी करते हैं? आखिर ये खुद को हमारी तरह रिचार्ज करते हैं या नहीं? इन्हें नींद की जरूरत होती है? क्या ये सोते भी हैं? क्या इनकी माँ इनके लिए बिस्तर तैयार करती है? इनके सोते रहने पर डांटती हैं?”
शायद बहुत मुश्किल है यह कह पाना. थोड़ा छोटा सा दिमाग है इनका, अभी तक बहुत अच्छे से उसके व्यवहार को पढ़ा नहीं गया है. फिर हमारे आस पास, दूर-दराज में इतने सारे, इतनी तरह के कीड़े मकौड़े भी तो हैं. इसलिए बहुत आसानी से तो इस प्रश्न का ज़बाब ‘हाँ’ में तो नहीं दे सकते. पर शोध इतना जरूर बताते हैं कि इनमें से अधिकतर किसी न किसी समय में खुद को समेट कर इस शोर भरी दुनिया से दूर करते हुए झपकी ले ही लेते हैं. वैज्ञानिक शब्दों में कहें तो वो ऐसा समय निकाल लेते हैं जब उनकी जीवन संबधी प्रक्रिया धीमी पड़ती है, वो अपने शरीर और मांसपेशियों को ढीला छोड़ते हैं. ठीक वैसा ही जैसा हमारा शरीर हमारे निद्रा देवी के गोद में जाने के बाद करता है. इन कीड़े मकौडों के पास पलकें तो हैं नहीं जिससे उनकी आँखे बंद दिखें.
अब थोड़ा ध्यान से अपने आस पास वाले कीड़ों को देखते हैं, मक्खियाँ प्रत्येक शाम अपने जबड़ों से किसी डंठल को जकड लेतीं है. अपने पैरों को मोड़ कर पंखों के पीछे/नीचे छुपा देती हैं. और फिर वहीं सिकुड़ कर पड जाती हैं सुबह होने तक. पूरे रात की नींद लेती हैं.
मोनार्च तितलियाँ (Monarch butterfly) अकेले नहीं सोतीं. पूरा समूह पेड़ों की पत्तियों के बीच खुद को  छुपा कर अपने पंखों को बंद कर पडा रहता है. उन दौरान यह पहचानना मुश्किल होता है कि कौन सी तितली है और कौन पत्ता. पूरी रात आराम करती हैं ताकि दिन भर बिना थके अपनी ड्यूटी कर सकें. बहुत सारे कीड़े सोते वक्त खुद को अपने आस पास के वातावरण से इस तरह मिला लेते हैं कि आपके लिए यह पहचान पाना मुश्किल होता है कि वह कीड़ा है या पेड़ की छाल या लकड़ी या कुछ और.
बहुत सारे कीड़े जैसे pill bug खुद को बचाने के लिए सो जाते हैं. ख़तरा भांपते ही खुद को गेंद की तरह बना लेते हैं और जीवन संबंधी सारी प्रक्रिया धीमी कर लेते हैं. और इस तरह खतरे को उस जीवन का भान नहीं होता और वह बच जाते हैं. (ऐसा वो सोचते हैं शायद).
अब न्यूजीलैंड में ऊंचाईयों पर पाए जाने वाले झिंगुर की समझदारी का क्या कहना, प्रत्येक रात को वह सोने के लिए बर्फ बन जाता है (freezes solid) और सुबह देख झटक कर निकल आता है अपने उस रूप से.
बहुत सारे कीड़े जिसमें हड्डा, लेडी बग, फत्तिंगे, भृंग आदि शामिल है  पेड़ों के में लम्बे समय के लिए गहरी नींद सोते हैं जिसे वैज्ञानिक डायपौज़ (diapause) कहते हैं.  
वैज्ञानिकों का कहना है कि इनके लिए भी नींद उतनी ही जरूरी है जितनी हमारे लिए. तेलचट्टा, फलों पर मंडराने वाली मक्खियाँ, बिच्छू को ठीक हमारे तरह अपनी जवानी में अधिक नींद आती है.  इनके भी दिमाग में बनने वाले रसायन इनकी नींद की जरूरत को नियंत्रित करते हैं. यह वही रसायन है जो हमारी नींद की जरूरत को नियंत्रित करता है. नींद नहीं पूरी होने पर ये भी हमारी तरह गलतियां करते हैं. आमतौर पर मधुमक्खियाँ खाने की जगह की दूरी बताने के लिए एक ख़ास तरह का नृत्य करती हैं, जिसे हम वैगल डांस कहते हैं. नींद न पूरी होने पर मधुमक्खियाँ इस नृत्य को सही ढंग से नहीं कर पातीं.
इतनी समानता है इसीलिये हमारी नींद के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने के लिए शोधकर्ता फलों पर मंडराने वाली मक्खियों का इस्तेमाल करते है. जी हाँ ये नींद लाने वाली दवाईयों और कॉफ़ी आदि के प्रति वही रवैया रखते हैं जो हम मनुष्य. यानी हमारी नींद के बारे में पता करने के लिए हमें तंग नहीं किया जाता है तंग होती हैं ये बेचारी मक्खियाँ. चलो इन्हें लोरी सुनाते हैं इनका सोना जरूरी है.
चुपके से आ जी री अँखियन में निंदिया आ जा री आ जा.

चीटियों का शौचालय


चीटियों का शौचालय
ओफ इन तरह तरह के कीड़ों ने परेशान कर रखा है. सफाई करते करते परेशान हो जाओ, बस गन्दगी फैलाने चले आते हैं. अक्सर हम ऐसे जुमलों का इस्तेमाल करते है. कीड़े मकौड़े यानी गन्दगी. ये हमारे घर को तो गंदा करते है, पर खुद का घर भी छी ची बना कर रखते है. “हाँ तो इन कीड़े मकौडों को सफाई की क्या समझ” अगर आपकी धारणा कुछ ऐसी है तो अपनी सोच की सफी कर डालिए . ये खुद को और अपने घर को बहुत साफ़ रखते हैं, ख़ास कर ये सामाजिक कीड़े. वही जो समूह में रहती हैं और काम का बंटवारा करना पसंद करती हैं. जी हाँ, चीटियों और मधुमक्खी की बात हो रही है यहाँ. ये अपने घर को साफ़ और स्वच्छ रखना पसंद करती हैं. माना कि उनके पास हमारी तरफ सफाई और स्वच्छता बनाए रखने के लिए घर के अन्दर इस्तेमाल किये जाने वाले कोई स्पेशल औजार और उपाय नहीं होते हैं. इसके बावजूद वह हर वह प्रयास करती हैं, जिससे उनके घर की स्वच्छता पर कोई आंच न आये. इनका अपना अंदाज है. मधुमक्खियाँ मल विसर्जन के लिए लम्बी उड़ान लेती हैं. अपने घर से काफी दूर जा कर इन गन्दगी को छोड़ आती हैं. चीटियाँ अपने घर से बाहर इन गंदगियों का ढेर लगाती हैं जिसे किचेन मिडडन्स (kitchen middens) कहते हैं. जिसमें अपने शरीर की और घर गन्दगी से लेकर इनके मरे हुए साथियों के शरीर को भी डाला जाता है. जिसका शायद बतौर खाद इस्तेमाल होता है. कुछ चीटियों के पास तो इस स्वच्छता अभियान को चलाने के लिए एक ख़ास टीम होती है. सारी चीटियाँ इस कामको अपने हाथ में नहीं लेती हैं. दीमक तो भाई बहुत स्मार्ट हैं वह अपने मल को अपने भवन निर्माण के काम में लगा देते हैं.
जर्मनी में हुए हाल के शोध से एक चौंकाने वाली बात सामने आयी है.  चीटियों की ऐसी प्रजाती है जिनके घर में एक प्रसाधन/शौचालय (toilet) भी होता है. हंसने वाली बात नहीं है.  विद्या बालन को बताना चाहिए ताकि वह गाँव वालों को समझा सके कि चीटियों को भी समझ है, फिर हमें क्यों नहीं. जर्मन जीववैज्ञानिक Tomer Czaczkes काफी दिनों से चीटियों की अलग अलग प्रजाति के साथ काम कर रहे हैं. चीटियों के काम करने के तरीके, रहन सहन, व्यवहार को वो काफी नजदीक से देख रहे हैं. अपने काम के दौरान उन्होंने यह पाया कि चीटियों की कुछ प्रजाति के घोंसलों में एक ख़ास कोना है जिसमें कुछ स्पाट्स यानी ख़ास तरह के धब्बे होते है. यह कोना लगभग घर से थोड़ा अलग होता है. आखिर ये धब्बे क्या हैं?  इसको समझने की कोशिश शुरू की गई. शोधकर्ताओं ने सोचा कहीं यह मल तो नहीं. इस सोच पर आगे काम शुरू हुआ. इन चीटियों के खाने यानी सुगर के घोल में खाने वाले रंग मिलाये गए. अलग अलग घोंसले की चीटियों के लिए अलग अलग रंग इस्तेमाल किये गए. A घोसले वाली चीटियों को लाल रंग दिया गया तो B घोंसले को नीला. फिर इनके घर में इन धब्बों की जांच की गई. करीब एक महीने बाद यह नजर आया कि इन किनारों में उसी रंग के धब्बे हैं जिस रंग का खाना उन चीटियों को दिया जा रहा है. यानी A घोंसले में उस किनारे वाले कमरे में लाल रंग था तो B में नीला. इसका मतलब इन किनारों का इस्तेमाल शौचालय जैसा किया जाता है. नजदीक से छान बीन करने के बाद यह भी पाया गया कि इन धब्बों में छोड़े हुए खाद्य पदार्थ या मरी हुई चीटियाँ नहीं हैं. इस तरह की गंदगियाँ अभी भी घर के बाहर जमा होती है. इसका मतलब है चीटी की प्रजातियाँ आलस्यवश ऐसा नहीं करतीं. वह सारी गन्दगी को अपने घर से अलग कर देती हैं जिससे खतरनाक जीवों के आकर्षित होने का खतरा हो. 

आखिरकार ऐसा क्यों करती हैं? शोधकर्ता ने इस विषय पर सोचना शुरू कर दिया है. कुछ न कुछ तो कारण होगा.  चीटियों द्वारा मल को अपने घर के अन्दर रखने का.  हांलाकि यहाँ भी सतर्कता बरती है उनहोंने.  यह घर का एक ख़ास कोना है, हर जगह नहीं बिखरती है गन्दगी. 

संभव है कि इनसे वो कुछ हानिकारक फफूंद को खुद से दूर कर पा रही होंगी. आखिरकार कुछ दीमक तो ऐसा करते हैं. वो अपने मल का इस्तेमाल कर कुछ फफूदियों की वृद्धी पर पूर्णविराम लगा देते हैं. इस मल का इस्तेमाल कर वह अपने घर के चारो तरफ रख इन फफूंद के खिलाफ नाका बंदी भी कर लेते हैं. हो सकता है ये चीटियाँ भी इन्हें अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करती हों.
या ठीक उल्टा उपयोग हो, यानी फफूंद उगाने के लिए इस्तेमाल होता हो इस मल का. जैसा की हमें पता है कि चीटिया और कुछ दीमक खेती करते हैं, फफूंद उगाते है अपने भोजन के लिए. हो सकता है इन मल का इस्तेमाल वो खाद की तरह करते हों फफूंद उपजाने के लिए.

तीसरी धारणा यह कहती है कि बुजुर्गों के इन मल में कुछ पोषक पदार्थ छुपे हो. इन पोषक पदार्थ को ये अपने बच्चों यानी लार्वा को मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करते हों. मतलब लार्वा के भोजन में शामिल करते हों इस मल को.
अब इन शोधकर्ताओं को ढूँढना है आखिर क्या करती हैं चीटियाँ अपने मल से. पर अनोखा है चीटियों का यह व्यवहार.   

Wednesday, 13 May 2015

सिप सिप

सिप-सिप सुड़क
इतने तरह की चिड़ियाँ, उनके विविध रूप के भोजन; अन्न के दाने, छोटे-छोटे बीज, मुलायम पत्तियाँ, तरह तरह के फल, मांस-मछली और न जाने क्या क्या. जितने तरह के भोजन उतने तरह की चोंच. हम जब आस पास देखते हैं तो यह सारी विभिन्नता स्पष्ट नजर आती है. ऐसे में ढूंढते है ऐसी चोंच को जो सिप करता है. है क्या ऐसी कोई चोंच है हमारे आस पास? अरे उस नन्हीं सी चिड़िया की लम्बी सी चोच जो बस फडफडाती ही रहती है. फडफडा फूलों के चारो तरफ मंडरा मंडरा कर अपनी लम्बी-ई-ई-ई चोंच को फूलों के अन्दर डाल कर चूस लेती है. अपनी लम्बी-लम्बी सूई जैसी चोंच वाली,  आगे-पीछे; ऊपर-नीचे उड़ने वाली हमारी हमिंग बर्ड फूलों में चोंच डाल कर चुप-चाप रस चूस लेती है. पर अनोखा है उनका फूलों से रस चुराने का यह तरीका.
हम जब भी इस नन्ही चमकीली चिड़िया को फूलों में चोंच डाले देखते हैं तो हम एक स्ट्रा की कल्पना करते हैं जो फूल के रस को ऊपर खींच रहा है. पर वहां ऐसा कुछ नहीं होता. इनकी पतली नुकीली चोंच रस चूसने का काम नहीं करतीं बल्कि ये अपने अन्दर इस चिड़िया की चोंच को छुपा कर रखती हैं. और यहीं चोंच चुराती हैं फूलों से शहद.
हमिंग बर्ड की यह लम्बी पतली जीभ अपने अगले हिस्से पर दो नन्हीं नालियां होती हैं, जिसपर छोटे छोटे बाल होते हैं. इस नन्हे पक्षी को जब फूलों से शहद चाहिए होता है यह अपनी जीभ फूलों से चिपका लेते हैं और इसके अगले हिस्से के दोनों हिस्से/गर्त (trough) फूलों के रस को चूस;  नहीं-नहीं सोंख लेते हैं. जी हाँ यहाँ रस चूसे नहीं जाते सोंख लिए जाते हैं ठीक उसी तरह जैसे हम सोख्ते से स्याही या दूसरे द्रव को सोंख लेते हैं. एक बार रस सोंखाने के बाद हमिंग बर्ड अपनी जीभ को खींच लेती है जिससे की रस चिड़िया के गले तक पहुंच जाते हैं और चिड़िया फिर से फूलों से रस सोंखने का काम शुरू कर देती है.
अपनी जीभ की लम्बाई के आधार पर यह अपनी जीभ को हर मिनट में 3 से 13 बार फूलों से रस लेने के लिए इस्तेमाल करते हैं. यह ऐसा सिर्फ इसलिए कर पाते हैं क्योंकि इनके पास एक अद्भुत रचना है जिसे हम हाइऔड (hyoid) कहते हैं. यह हाइऔड हड्डी, मांसपेशियों और कार्टीलेज का बना होता है. यह तंत्र इसकी जीभ का अभिन्न हिस्सा है. यह हाइऔड एपेरेटस चोंच के निचले हिस्से में पहुंच कर दो भाग में बंट जाता है.. इसके दोनों हिस्से फोरामेन मैग्नम (ऐसा बड़ा छेद जिससे होकर स्पानल कार्ड ब्रेन तक जाता है) के दोनों तरफ फ़ैल जाते हैं. फोरामेन मैग्नम के दोंनों तरफ से यह हाइऔड एपेरेटस पीठ से होकर स्कल (खोपड़ी) के ऊपरी भाग तक पहुंचता है, आँखों के बीच तक.
यह हाइऔड एपेरेटस सिर्फ हमिंग बर्ड और कठफोड़वा में होता है, ताकि ये आसानी से जीभ को फूलों और पेड़ों के तनों के अन्दर से रस लेने के लिए इस्तेमाल कर सकें.