चीटियों का
शौचालय
“ओफ इन तरह तरह के कीड़ों ने परेशान कर रखा है. सफाई करते करते परेशान हो जाओ,
बस गन्दगी फैलाने चले आते हैं’. अक्सर हम ऐसे जुमलों का इस्तेमाल करते है. कीड़े मकौड़े
यानी गन्दगी. ये हमारे घर को तो गंदा करते है, पर खुद का घर भी छी ची बना कर रखते
है. “हाँ तो इन कीड़े मकौडों को सफाई की क्या समझ” अगर आपकी धारणा कुछ ऐसी है तो
अपनी सोच की सफी कर डालिए . ये खुद को और अपने घर को बहुत साफ़ रखते हैं, ख़ास कर ये
सामाजिक कीड़े. वही जो समूह में रहती हैं और काम का बंटवारा करना पसंद करती हैं. जी
हाँ, चीटियों और मधुमक्खी की बात हो रही है यहाँ. ये अपने घर को साफ़ और स्वच्छ रखना
पसंद करती हैं. माना कि उनके पास हमारी तरफ सफाई और स्वच्छता बनाए रखने के लिए घर
के अन्दर इस्तेमाल किये जाने वाले कोई स्पेशल औजार और उपाय नहीं होते हैं. इसके
बावजूद वह हर वह प्रयास करती हैं, जिससे उनके घर की स्वच्छता पर कोई आंच न आये.
इनका अपना अंदाज है. मधुमक्खियाँ मल विसर्जन के लिए लम्बी उड़ान लेती हैं. अपने घर
से काफी दूर जा कर इन गन्दगी को छोड़ आती हैं. चीटियाँ अपने घर से बाहर इन गंदगियों
का ढेर लगाती हैं जिसे किचेन मिडडन्स (kitchen middens) कहते हैं. जिसमें अपने
शरीर की और घर गन्दगी से लेकर इनके मरे हुए साथियों के शरीर को भी डाला जाता है.
जिसका शायद बतौर खाद इस्तेमाल होता है. कुछ चीटियों के पास तो इस स्वच्छता अभियान
को चलाने के लिए एक ख़ास टीम होती है. सारी चीटियाँ इस कामको अपने हाथ में नहीं लेती
हैं. दीमक तो भाई बहुत स्मार्ट हैं वह अपने मल को अपने भवन निर्माण के काम में लगा
देते हैं.
जर्मनी में हुए हाल के शोध से एक चौंकाने वाली बात
सामने आयी है. चीटियों की ऐसी प्रजाती है
जिनके घर में एक प्रसाधन/शौचालय (toilet) भी होता है. हंसने वाली बात नहीं है. विद्या बालन को बताना चाहिए ताकि वह गाँव वालों
को समझा सके कि चीटियों को भी समझ है, फिर हमें क्यों नहीं. जर्मन जीववैज्ञानिक Tomer
Czaczkes काफी दिनों से चीटियों की अलग अलग प्रजाति के साथ काम कर रहे हैं.
चीटियों के काम करने के तरीके, रहन सहन, व्यवहार को वो काफी नजदीक से देख रहे हैं.
अपने काम के दौरान उन्होंने यह पाया कि चीटियों की कुछ प्रजाति के घोंसलों में एक
ख़ास कोना है जिसमें कुछ स्पाट्स यानी ख़ास तरह के धब्बे होते है. यह कोना लगभग घर
से थोड़ा अलग होता है. आखिर ये धब्बे क्या हैं? इसको समझने की कोशिश शुरू की गई. शोधकर्ताओं ने
सोचा कहीं यह मल तो नहीं. इस सोच पर आगे काम शुरू हुआ. इन चीटियों के खाने यानी
सुगर के घोल में खाने वाले रंग मिलाये गए. अलग अलग घोंसले की चीटियों के लिए अलग
अलग रंग इस्तेमाल किये गए. A घोसले वाली चीटियों को लाल रंग दिया गया तो B घोंसले
को नीला. फिर इनके घर में इन धब्बों की जांच की गई. करीब एक महीने बाद यह नजर आया
कि इन किनारों में उसी रंग के धब्बे हैं जिस रंग का खाना उन चीटियों को दिया जा
रहा है. यानी A घोंसले में उस किनारे वाले कमरे में लाल रंग था तो B में नीला.
इसका मतलब इन किनारों का इस्तेमाल शौचालय जैसा किया जाता है. नजदीक से छान बीन
करने के बाद यह भी पाया गया कि इन धब्बों में छोड़े हुए खाद्य पदार्थ या मरी हुई
चीटियाँ नहीं हैं. इस तरह की गंदगियाँ अभी भी घर के बाहर जमा होती है. इसका मतलब
है चीटी की प्रजातियाँ आलस्यवश ऐसा नहीं करतीं. वह सारी गन्दगी को अपने घर से अलग
कर देती हैं जिससे खतरनाक जीवों के आकर्षित होने का खतरा हो.
आखिरकार ऐसा क्यों करती हैं? शोधकर्ता ने इस विषय
पर सोचना शुरू कर दिया है. कुछ न कुछ तो कारण होगा. चीटियों द्वारा मल को अपने घर के अन्दर रखने का.
हांलाकि यहाँ भी सतर्कता बरती है उनहोंने.
यह घर का एक ख़ास कोना है, हर जगह नहीं बिखरती
है गन्दगी.
संभव है कि इनसे वो कुछ हानिकारक फफूंद को खुद से
दूर कर पा रही होंगी. आखिरकार कुछ दीमक तो ऐसा करते हैं. वो अपने मल का इस्तेमाल
कर कुछ फफूदियों की वृद्धी पर पूर्णविराम लगा देते हैं. इस मल का इस्तेमाल कर वह
अपने घर के चारो तरफ रख इन फफूंद के खिलाफ नाका बंदी भी कर लेते हैं. हो सकता है
ये चीटियाँ भी इन्हें अपनी सुरक्षा के लिए इस्तेमाल करती हों.
या ठीक उल्टा उपयोग हो, यानी फफूंद उगाने के लिए
इस्तेमाल होता हो इस मल का. जैसा की हमें पता है कि चीटिया और कुछ दीमक खेती करते
हैं, फफूंद उगाते है अपने भोजन के लिए. हो सकता है इन मल का इस्तेमाल वो खाद की
तरह करते हों फफूंद उपजाने के लिए.
तीसरी धारणा यह कहती है कि बुजुर्गों के इन मल में कुछ
पोषक पदार्थ छुपे हो. इन पोषक पदार्थ को ये अपने बच्चों यानी लार्वा को मजबूत करने
के लिए इस्तेमाल करते हों. मतलब लार्वा के भोजन में शामिल करते हों इस मल को.
अब इन शोधकर्ताओं को ढूँढना है आखिर क्या करती हैं
चीटियाँ अपने मल से. पर अनोखा है चीटियों का यह व्यवहार.
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