Thursday, 26 February 2015

विषय की खूबसूरती



आज दांत में अमरुद का एक छोटा सा बीज फंस गया, पूरा मुंह परेशान हो उठा. जीभ बार बार उस बीज को निकालने की कोशिश कर रहा था, मुंह के अन्दर लार की बाढ़ आ रही थी. मैंने शिउली को पढाने की कोशिश कर रही थी पर लार के कारण आवाज गड़बड़ हो रही थी. बड़ी मुश्किल से जब उस बीज को मुंह से निकाल फेंका तो मुंह को चैन मिला. यह तो हमने अक्सर देखा है शरीर के साथ कुछ गडबड़ी होती अलग अलग तरीके से चेतावनी देता है और गडबड़ियों को दूर करने की पूरी कोशिश करता है. एक जीवविज्ञान शिक्षिका होने के नाते शारीरिक बनावट, जिन्दगी और उससे जुड़े हर पहलू की बारीकियों से हम रूबरू होते रहते हैं. बच्चों को समझाना है इसलिए इन बारीकियों के गहराई में उतरना मेरी जरूरत है. जितना हम इन बारीकियों के जितना करीब जाते हैं आश्चर्य और उत्सुकता के समुन्द्र में गोते लगाते है. मनुष्य के विभिन्न शारीरिक तत्र की बात हो या फूल की बनावट की सजावट या फिर केंचुए और मिट्टी की दोस्ती या फिर हवा में पंछियों या खुशबू की रवानगी हो सब कुछ इतने रहस्य के पर्दे खोलता है, हमारी उत्सुकता जगाता है साथ ही हमें अपने सामाजिक, भौतिक, रासायनिक और मानसिक समाज से जुडी हर अवधारणा को समझाने में मददगार साबित होता है. यह जगत यह विज्ञान हमेशा एक लय में बहता नजर आता है. इतना खूबसूरत विषय परन्तु पढ़ने वालों की संख्या बहुत तेजी से घट रही है. मुझे याद है जब मैंने स्कूल में इस विषय को पढ़ाना शुरू किया था, उस वक्त मेरी कक्षा में अच्छे खासे बच्चे थे तकरीबन 35 पर धीरे धीरे यह संख्या घटने लगी, मुझे खुद पर संदेह होने लगा. हांलाकि, जितने बच्चे इस विषय से जुड़े थे वो बहुत उत्सुक, संवेदनशील विषय के प्रति और कक्षा में होने वाली बातों से संतुष्ट नजर आते थे.  निचली कक्षा यानी नौंवी दसवीं में बहुत ही चाव और उत्सुकता के साथ जीव-विज्ञान की बातें करते नजर आने वाले बच्चे भी ग्यारहवीं में जब विषय चुनने की बात होती इससे किनारा करते नजर आते थे. मेरी चिंता बढ़ रही थी. मैंने दूसरे विद्यालय के शिक्षकों से भी बात की, पता चला वहां भी यही हाल है; चार-पांच ज्यादा से ज्यादा दस बच्चे जीवविज्ञान से जुड़ते दिखे. उन बच्चों से बात करने के बाद मेरा मन और दुखी हो गया क्योंकि उनके अनुसार उन्हें विज्ञान पढ़ना था परन्तु गणित नहीं मिला इसलिए जीव विज्ञान लेना पडा. हांलाकि यह तो हमेशा से होता था कि जीव विज्ञान को गणित से कम सम्मान दिया जाता था पर इस विषय के प्रति आकर्षण तो था.
इतना खूबसूरत विषय परंतु इसके चाहने वालों की संख्या घटती चली जा रही है, इसकी बारीकियों, इसके गुण से बच्चों को जोड़ने में हम नाकामयाब हो रहे हैं. अगर कोई बच्चा जीव विज्ञान अपनाता है तो एक ही सवाल होता है , डाक्टर बनना है? मेरे बेटे ने जीव विज्ञान को ही अपना विषय बनाया था, पर जब उसने गणित को नहीं कुबूला था मैं उसके भविष्य को ले कर आशंकित हो उठी थी. जीवविज्ञान के साथ वह कैसे आगे बढे इस तलाश में मैंने एक सहारा ढूंढा वह था, “बायोमेडिकल साइंस” इसमें मुझे इस विषय की वही आत्मा नजर आई, जिससे मैं जुडी हूँ, फिर मैंने यह भी महसूस किया यह इन खूबसूरत रहस्यों, संबंधों से जोड़ने में अधिक सहायक होगा. परन्तु मेरे बेटे को मेडिकल साइंस से जरिये शायद इस दुनिया से जुड़ना था इसलिए उसने वह रास्ता चुना. हाँ, इस अनुसंधान के दौरान मुझे जरूर लगता रहा, काश मैं अपने विद्यार्थी जीवन में इन विषय के बारे जानती तो शायद और पहले इसके खूबसूरत पहलुओं से जुड़ पाती.
खैर, मेरी यह खोज खाली नहीं गई, हमारे दोस्त की बेटी ने इस विषय से खुद को जोड़ा, मैंने उत्साहित हो कर इसके शोध रूपी सवभाव से परिचित कराया. अब उस बच्ची ने तीन साल पूरे कर लिए. अब समय आया है आगे का रास्ता तय करने का. एक बार फिर मैं आश्चर्य में पडी. तीन साल तक इस विषय के जुड़ने के बाद भी उसका चुनाव था ‘मैनेजेमेंट’. उसका कहना था अब जल्दी से मैं निश्चिन्त होना चाहती हूँ. उसके यह कहते ही मुझे उन अभिभावकों की बात याद आ गई जो जीव विज्ञान से अपने बच्चों को इसलिए नहीं जोड़ना चाहते क्योंकि एक तो इस विषय के साथ आगे बढ़ने का कोई ऐसा रास्ता नजर नहीं आता जिससे बच्चे जल्दी से निश्चिन्त हो जाएँ. बच्चों का कहना है जीव विज्ञान मतलब चिकित्सा विज्ञान और उसमें इतना पढ़ना पड़ता है. चिकित्सा विज्ञान से जुड़ने की इच्छा रखने वाले बच्चों में करीब 50% बच्चे अपने माता पिता के चिकित्सा विज्ञान से जुड़े रहने के कारण इससे जुड़ते हैं, कुछ लडकियां होने के कारण.
शिक्षा का एक उद्देश्य जीविका का साधन सुनिश्चित करना तो है ही, पर इसके साथ जीवन के हर पहलुओं, अपने चारो तरफ बिखरे रहस्य को समझना और उसे सुलझाने की कोशिश करना, संबंधों की समझ बनाना के साथ खुद को प्रश्न पूछने के लायक बनाना है. परन्तु हमारा शिक्षा तंत्र शायद यह काम ठीक से नहीं कर पा रहा है. हम विभिन्न विषयों की आत्मा से परिचित नहीं हो पा रहे, बस उसे एक औजार की तरह इस्तेमाल करते हैं.




Monday, 23 February 2015

Story of a scientist


Story of a Scientist

This a story of famous medical scientist who have made several important medical breakthroughs. He was interviewed by a newspaper who asked why he thought that he will be able to be more creative and explorative than an average person.
He responded that, this all came from an experience with his mother that occurred when he was 2 year old. He was trying to remove a bottle of milk from refrigerator. The bottle slipped due to its slippery surface, it fell spilling milk all over on the kitchen floor making a pool of milk. When his mother came into kitchen ispite of yelling or giving lecture or punishing him she told Robert what great wonderful you have made.  Ok the damage has already been done would like to play with it before we would clean it up?
Indeed, he did. After a few minute his mother said Robert you know whenever you make a mess like this you have to clean it up and restore everything to its proper order , so how would you to do that you would like to use a sponge, a towel or  a mop. He choose sponge and together they cleaned the milk.
His mother than said see that was a failed experiment “how to catch a big milk bottle without falling it with your two little tiny hands, so let us go to backyard fill the bottle with water and try to find the way”.
He then learnt that the bottle is grasped at the neck near the lid with the two hands it will not fall.
This renowned scientist remarked that at that moment I learnt that I should not be afraid of making mistake . Mistakes are opportunities for learning something new.
is a story of famous medical scientist who have made several important medical breakthroughs. He was interviewed by a newspaper who asked why he thought that he will be able to be more creative and explorative than an average person.


He responded that, this all came from an experience with his mother that occurred when he was 2 year old. He was trying to remove a bottle of milk from refrigerator. The bottle slipped due to its slippery surface, it fell spilling milk all over on the kitchen floor making a pool of milk. When his mother came into kitchen ispite of yelling or giving lecture or punishing him she told Robert what great wonderful you have made.  Ok the damage has already been done would like to play with it before we would clean it up?
Indeed, he did. After a few minute his mother said Robert you know whenever you make a mess like this you have to clean it up and restore everything to its proper order , so how would you to do that you would like to use a sponge, a towel or  a mop. He choose sponge and together they cleaned the milk.
His mother than said see that was a failed experiment “how to catch a big milk bottle without falling it with your two little tiny hands, so let us go to backyard fill the bottle with water and try to find the way”.
He then learnt that the bottle is grasped at the neck near the lid with the two hands it will not fall.
This renowned scientist remarked that at that moment I learnt that I should not be afraid of making mistake . Mistakes are opportunities for learning something new. 

source: From a module designed  for teacher training 

Saturday, 21 February 2015

सत्ता




सत्ता

कुछ रोज पहले बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री द्वारा दिया गया वक्तव्य, “मैंने मांझी को अपनी सरकार दे दी, अब वह मेरी पार्टी चाहता है,” ने मेरा ध्यान ‘मेरी और अपनी’ जैसे शब्दों के इर्द गिर्द घूमने पर मजबूर कर दिया है.  ये दोंनो शब्द हमारे बहुत अपने हैं हमारी सत्ता का द्योतक हैं. इन शब्दों को अगर कोई चुनौती देता नजर आता है तो हम तिलमिला जाते हैं, और ऐसा क्यों न हो हमारे वजूद से जुडा है यह और फिर जानवर भी अपनी सत्ता की रक्षा किसी भी तरह करते हैं हम तो समझदार मनुष्य हैं.

शादी के बाद जब मैंने ससुराल में रसोई का काम सम्भाला था तब मुझे बहुत अजीब से अनुभव हुए थे. मेरी जिठानी जो उस रसोई की आज भी मालकिन हैं अचानक आ कर कभी कूकर में उबलने के लिए रखे गए आलू की संख्या बढ़ा जाती थीं (भले ही वह एक ही आलू डालें) या फिर कभी कड़ाही में तेल की मात्रा. अगर मैं अपनी रेसिपी इस्तेमाल करना चाहती थी तो मुझसे यह कह कर उसे बदलने के लिए प्रेरित करती थीं कि लोंगो को पसंद नहीं आयेगा. पहले मैं उनकी बात मान तो लेती थी पर उसका कारण होता था मेरे पास किसी और उपाय का न होना, क्योंकि मैं बहुत प्रतिरोध नहीं कर पाती. आज उनका मेरी बहुत सारी पहल को रोकना मुझे आश्चर्य में नहीं डालता हाँ झुंझलाहट जरूर होती है, क्योंकि अब मेरा भी यह दावा है कि मैं घर वालों को अच्छी तरह जानती हूँ. पर इतना समझ में तो आता है उनकी यह आदत या कार्रवाही सिर्फ उनकी सत्ता को सुरक्षित रखने का तरीका है, हांलाकि वह शायद ऐसा सोचती नहीं हैं. उनकी एक और आदत है वह कहीं भी जाती हैं तो खुद को सुसुप्त नहीं कर पातीं अपनी सत्ता को बनाए रखने की कोशिश जारी रहती है.
अभी हाल में मैं अपने एक रिश्तेदार के यहाँ गई थी ननद-भाभी काफी दिनों से साथ साथ हैं. भाभी का घर है. दोंनो बहुत ही सहज तरीके से साथ हैं. जिस दिन मैं उनके घर गई उनका ड्राइवर जो कहीं बाहर रहता है आया हुआ था. दिन के करीब 1 बज रहे थे. ननद ने ड्राइवर के लिए खाना तैयार कर लिया था. ड्राइवर को खाना तो देना ही है समय भी हो गया है पर अभी किसी चीज का इंतज़ार है जी हाँ भाभी की हामी का. सत्ता वाली बात है.

मैं भी अपनी भाभी के साथ लंबा समय गुजारती हूँ हमारा रिश्ता भी काफी सहज है. यहाँ तो बहुत सारे निर्णय भी मैं लेती हूँ, पर अभी काम करने वाली ने मुझसे कहा कि जा रही हूँ मेरे मुंह से सहज ही निकला भाभी को बता दो.
एक बार ट्रेन के सफ़र के दौरान मुझे बीच वाली सीट मिली नीचे वाली सीट पर एक जवान लड़का बैठा नजर आया. मैंने उससे सीट बदलने का आग्रह किया, वह राजी हो गया. थोड़ी देर बाद उसके ताऊ आये उन्हें उस बच्चे ने मेरे आग्रह और उसके सहमत होने की बात बताई. ताऊ नाराज हो गए, “बिना मुझसे पूछे तुमने कैसे हाँ कह दिया.” मुझे बीच वाली सीट से संतोष करना पड़ा, यहाँ भी सत्ता का मामला था.

जब मैं स्कूल में पढाती थी मुझे एक वाकया याद है. एक बार मैं क्लास लेने गयी और कुछ बच्चे मैदान में थे. मुझे देख वो दौड़ते हुए कक्षा तक आ गए पर मैंने उन्हें दरवाजे पर पांच मिनट तक खडा कर दिया. पांच मिनट बाद अन्दर बुलाया. सत्ता का मामला था.

उसी विद्यालय की प्राचार्या किसी भी बच्चे या शिक्षक को उनकी गलतियों से रू ब रू कराने की जो कोशिश करती थी वह काफी  जोरदार (आवाज की तीव्रता के साथ) और इतना असरदार होता था कि सामने वाला बुरी तरह उलझ जाता था. उनकी बातों में (जो सत्ता के कारण दमदार होती थी) इतना असर होता था कि न चाहते हुए भी सामने वाले को सहमत होना पड़ता था.

सरोज जो हमारे घर की साफ़ सफाई करती है काफी पुरानी हो गई है, वह हमारे घर में आने वाले किसी भी नए काम करने वाली को अच्छे से तौलती परखती है. उसकी सत्ता को स्वीकार कर लो बहुत अच्छा नहीं तो शिकायतों का पुलिंदा तैयार रहता है.

हम अपने बच्चों को निर्णय लेने के काबिल, आत्मनिर्भर बनाते हैं, यह हमारी दिली इच्छा भी होती है लेकिन जब वह हमें अपने निर्णय में शामिल नहीं करते तो हम  दुखी (Hurt) होते हैं. यहाँ भी कुछ कुछ सत्ता का मामला होता है.

बच्चे भी अपनी सत्ता के प्रति सजग होते हैं, उनक्स चाकलेट कोई और सामान भले ही पड़ा पडा खराब होता रहे किसी ने बिना पूछे छू भी लिया तो तूफ़ान आ जाएगा.

अगर मैं कहीं बाहर थी और किसी और ने मेरा घर सम्हाल रखा है तो शायद मेरा यह हक़ बनता है कि मैं उसमें नुक्स निकालूं , बिना कहे या कह कर. मेरा घर मेरी सत्ता है.

हाँ एक सवाल जरूर उठता है आज कल ज्यादातर समय अपनी सत्ता को साबित करने के लिए हमें ऊंची और कड़े शब्दों से सुसज्जित आवाज का सहारा क्यों लेना पड़ता हो अब वह प्रधान मंत्री मोदी की सभा हो, या आफिस का बॉस, घर के मालिक-मालकिन हों या फिर शिक्षक या माता. ऐसा बहुत कम ही मौक़ा होता है  जब शान्ति और मुलायम शब्दों की सहायता से हम अपनी सत्ता स्थापित कर पाते हों.

ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं हमारे आस पास.  पर मेरे मन में यह सवाल है हमें अपनी सत्ता के प्रति जागरूक तो रहना है पर यह जागरूकता अक्सर बहुत सारी उलझनों, मसलों को जन्म देती है, है न. आखिर सत्ता का मामला है.  

Saturday, 7 February 2015

हँसी : एक अच्छी अनुभूति

हँसी : एक अच्छी अनुभूति
एक थी फूलकुमारी.बहुत प्यारी, बहुत खुश रहने वाली. जब भी फूलकुमारी हँसती थी तो फूल झड़ते थे. वह जब चुप हो जाती तो जैसे सारी दुनिया हँसना भूल जाती थी.फूलकुमारी की हंसी कल कल करते झरने की तरह थी, इसमें चिड़ियों का चहकना शामिल होता था. एक दिन अचानक फूलकुमारी चुप हो गयी, वह जैसे हँसना भूल गयी. नतीजा फूलों ने खिलना छोड़ दिया, चिड़ियाँ जैसे चहकना भूल गईं, झरनों का संगीत बंद हो गया. हर तरफ बस उदासी बिखर गयी, राजा उदास, रानी उदास, मंत्री उदास, प्रजा उदास बच्चे भी हँसना भूल गए. फूलकुमारी का हंसाना जरूरी था. राजा-रानी ने बहुत सारे जतन किये परन्तु वो सफल न हुए. न जाने कितने जादूगर आये, मसखरे आये , कलाबाज आये पर कोई भी फूलकुमारी को हंसा न पाया. सब परेशान थे शहर चहकना भूल गया था. अंत में राजा ने मुनादी करा दी, “ सुनो, सोनो, सुनो, राजा का एलान है, जो भी फूलकुमारी को हंसा देगा, उसे आधे राज्य का मालिक बना दिया जाएगा:, सुनो, सुनो, सुनो.” इस मुनादी को सुन तरह तरह के लोग आये पर सब के सब खाली हाथ वापस हो गए. एक दिन दरबार में बडे से पेट के साथ गधे पर सवार हो एक लड़का आया. पहरेदार ने उसे भगाने की कोशिश की.परन्तु बड़े पेट वाले लडके ने पूरे विश्वास के साथ यह दावा किया कि वह फूलकुमारी को हंसा सकता है. उसके विश्वास को देख राजा ने लडके को बुला लिया. लडके ने फूलकुमारी के चारो तरफ चक्कर लगाना शुरू कर दिया. फूलकुमारी के दांये झुका, बाएं झुका पर फूलकुमारी को हंसी नहीं आई. बड़े पेट के साथ लड़का घूम गया और उसने गधे पर चढने की कोशिश की, यह क्या इस कोशिश में उसका पेट गिर पडा. बड़ा अजीब नजारा था और ---- अचानक ही हा, हा, ही, ही की झडी लग गई, हाँ फूलकुमारी हँस पडी थी वह हंसी से लोट पोट हो रही थी. फूलकुमारी को हँसते देख फूल खिल पड़े, चिड़ियों ने चह्कना शुरू कर दिया, झरने कल कल बहने लगे, राजा खुश, रानी खुश, मंत्री और प्रजा भी खुश हो पडी, ऐसा लगा जैसे जीवन लौट आया.
यह कहानी हमारे कक्षा तीन की हिन्दी पाठ्यपुस्तक का हिस्सा था. आज इस कहानी को दुहराते समय यही महसूस हुआ वाकई हंसी हमें अच्छा महसूस कराती है, हमारी हंसी के साथ भी फूल, आस पास का वातावरण हँस पड़ता है. लेकिन ज़रा सोचते हैं हम कब हँस पडतें हैं, चुटकुले सुन कर, कुछ मजेदार देख कर या सुन कर, बहुत खुश होने पर, गुदगुदाहट के कारण, कभी कभी तो विचित्र स्थिति पर जहां  हँसना हमारे संवेदहीन होने का संकेत दे सकती है जैसे किसी के गिर जाने पर (गिरने वाला भी हँसता है) या किसी या खुद के विचित्र स्थिति में फंसने पर, हम झेंपने पर भी हँसते हैं, अपनी शर्मिन्दगी को छुपाने के लिए भी तो हँस पड़ते हैं. कभी कभी सामने वाले की बातों को नकारने के लिए भी हंसी हमारा हथियार बनती है. बहुत बार एक वक्ता अपनी बात में वजन बढाने के लिए हँसता है तो बहुत बार श्रोता वक्ता को मंच से हटाने के लिए हँस पड़ते हैं. पर यह हंसी होती क्या ऐसा तो कभी महसूस नहीं हुआ कि हमने सोच समझ कर हँसना शुरू किया हो, यह तो बस फूट पड़ती है अब हा, हा, हा हो या ही ही या फिर गुर्राने जैसी बस निकल ही जाती है. और एक चीज मजेदार है न हम हिन्दी भाषी हों, या तमिल या फिर अंगरेजी या फ्रेंच हँसते एक ही तरह हैं. हा, हां, हा........., अरे भाई  भाषा (बोलना) सीखने से पहले हम हँसना जो शुरू कर देते हैं. हाँ इतना जरूर है बच्चे बड़ों से अधिक मजा ले पाते हैं इस क्रिया का. दरअसल किसी बाहरी या अन्दुरूनी प्रेरक के उकसाने पर डायफ्राम और श्वसन तंत्र के अन्य भाग की हलचल (सिकुडन) से यह आवाज पैदा होती है. इन प्रेरक के कारण चेहेरे की मांसपेशियों को भी फ़ैलने और जबड़ों को फैलाने का हुक्म मिलता है और कुल मिला कर बन जाती है, खी, खी, खी या ही, ही, ही या हा, हा, हा.  लेकिन यह ही, ही, खी, खी हमारे दिमाग के किस भाग से नियंत्रित होता है यह अभी तक रहस्य है. परन्तु हम संभावना तलाशते रहते हैं और ऐसा मानते हैं कि हमारे फ्रंटल ब्रेन के साथ लिम्बिक सिस्टम (limbic system) इस कारनामे को अंजाम देता होगा. हमारा लिम्बिक सिस्टम हमारे भावनात्मक पहलुओं से जुडा होता है. यह सिस्टम सेरेब्रल कार्टेक्स के नीचे स्थित होता है. यह मस्तिष्क का ऐसा हिस्सा है जो मनुष्य को उसके जीवन से जुडी आवश्यकताओं जैसे खाने की खोज करना, अपना बचाव करना आदि का निर्देश देता है. वैज्ञानिक दिमाग में हंसी के केंद्र को खोजने की कोशिश में लगे हुए हैं. हाल में मिरगी रोग से ग्रस्त एक लड़की के दिमाग के कार्टेक्स द्वारा किये गए बिजली के तरंग के बहाव की तेजी को बढ़ा घटा कर उसके असर को जांचा गया. ऐसा पाया गया कि जब बिजली का प्रवाह तेज होता था लड़की जोर से हँस पड़ती थी उसे अपने आस पास सफ़ेद कोट में खड़े डाक्टर भी मजेदार नजर आते थे और बिजली के तीव्रता की कमी उसकी हंसी की तीव्रता में भी कमी लाती थी. अपने इस प्रयोग के कारण वैज्ञानिक फ्रंट ब्रेन कार्टेक्स की भूमिका भी हंसी पैदा करने में देखते हैं. वैज्ञानिकों का यह मानना है कि हंसी का दिमाग के भावनात्मक, संज्ञानात्मक और मोटर पहलुओं से सबन्ध है. बोली (भाषा) और हंसी में भी गहरा रिश्ता है.  हंसी की मदद से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का काम पहले शुरू होता है, बोलना तो हम बाद में शुरू करते हैं. हाँ हँसना तो हमें सीखना नहीं पड़ता, छींक और हिचकी की तरह यह खुद ब खुद फूट पड़ने वाली प्रक्रिया है.  हंसी एक ऐसी प्रक्रिया है जो यह दर्शाती है कि आप अपने वातावरण में आस पास के लोंगो के साथ जुड़े हुए हैं.
 ‘सामाजिक दिमाग अवधारणा’  के अनुसार मस्तिषक का विकास वातावरण की जरूरतों जैसे शिकार करना, खाना बनाना सीखने के लिए नहीं हुआ था यह विकास बड़े समूह में जीने की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ. इस प्रक्रिया में सबसे अधिक मददगार उपकरण था सम्प्रेषण या बात-चीत. हंसी भी इन्हीं  तरीके की एक लड़ी है. यह एक ऐसा जरिया है जो सीधे तौर पर आपको बड़े समूह से जोड़ता है और यह खुद ब खुद झलक पड़ता है हमें इसकी शिक्षा नहीं लेनी पड़ती. सामाजिक वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि दिमाग के बोली (भाषा) वाले भाग का अत्यधिक उत्तेजित होना भी हंसी को जन्म देता है.
थोड़ा आश्चर्य होता है न गली चौबारे, कक्षा, मीटिंग स्थल घरों में कहीं भी घटित होने वाली इस प्रक्रिया के बारे में इतना कम शोध हुआ है. साथ ही बड़ी आसानी से होने वाली इस प्रक्रिया को समझना इतना मुश्किल. सोचा समझा कारनामा नहीं होता है यह शायद इसी लिए इतना मुश्किल है इसे समझना. हाँ यह तो सच है  कि , हैं, हैं कर नकली हंसी को बाहर लाना कितना मुश्किल है. किसी के कमांड या डिमांड पर हँसना या हंसी को रोकना मुश्किल तो है पर बहुत बार आफिस और घरों में बॉस या मालिक  की हंसी ही निर्धारित करती है कर्मचारियों या मातहत का हँसना. जी हाँ हंसी के भी कई प्रकार हैं, वर्चस्व वाली हंसी, मातहत की हंसी, झेंपी हंसी, आजाद हंसी. पर सच्ची हंसी तो आजाद हंसी ही है. अकेले में शायद ही हँसते हैं, हंसी तो हमेशा समूह में ही झलकती है. जी हाँ यह हमें साथ रहने कहती है. और हाँ यह फैलती भी है. यानी एक की हंसी दूसरे को भी अपने चंगुल में ले सकती है, इसीलिये शायद लाफ्टर चैनेल वाले बैग्रांड में हंसी का रिकार्ड बजाते रहते हैं. बोलते बोलते भी हम हँस पड़ते हैं पर यह हंसी हमेशा वाक्य के शुरूआत या अंत में आती है. कहते हैं कि लड़कियां लड़कों से अधिक हँसती हैं, ऐसा होगा भी न लड़कों को तो धीर गम्भीर रहने का लाइसेंस प्राप्त है.
पर लड़का हो या लड़की गुदगुदी का अहसास ही हंसी से दोहरा कर देता है, पर खुद द्वारा की गई गुदगुदी हंसी को आस पास भी नहीं लाती, शायद हमारा दिमाग सचेत होता है.
“हंसी सबसे अच्छी दवा है,’ इस मान्यता के साथ बहुत सारे लाफ्टर क्लब काम करते हैं. सुबह सुबह पार्क में हां हां कर हँसते समूह का उपस्थित होना आम हो गया है. ऐसा मानना है कि यह ह्रदय की गति, रक्त के बहाव, फेफेड़े की क्षमता आदि को सुचारू करने में सहायक होता है. ह्रदय को फेफड़े को हो रहे फायदे के बारे में तो हम निश्चित नहीं हैं पर मन को होने वाले फायदे से हम सब अवगत है. हंसी डर और तनाव को दूर करने में बहुत सहायक होती है यह तो तय है. अगर हम किसी की बात से सहमत नहीं हो पा रहे हैं तो ऐसे में हंसी का इस्तेमाल एक अच्छे और मजबूत ढाल के रूप में किया जा सकता है. चलो हँस लेते हैं परन्तु किसी का मजाक उड़ाने, लज्जित करने नहीं, अच्छा महसूस करने हँसते हैं.