Thursday, 31 December 2015

जन्म भुट्टे का



भुट्टा का जन्म चिपेवा देश की कहानी
बहुत पहले की बात है विश्व के इस खूबसूरत प्रांत में एक व्यक्ति अपनी पत्नी और बच्चों के साथ रहता था.  बहुत मुश्किल से वह अपने परिवार के लिए खाना और दूसरे सामान जुटाया करता था. परन्तु उसका मन काफी दयावान था. वह हमेशा दूसरों की मदद के लिए तैयार रहता था. उसका बड़ा बेटा वुन्ज़ भी काफी दयावान और दूसरों का ख्याल रखने वाला था. किसी भी जरूरतमंद की मदद कर उसे खुशी मिलती थी. बहुत छोटी उम्र से ही लोंगों की मदद करना उसे खुशी देता था.
धीरे धीरे वह समय आ गया जब वुंज उस उम्र में पहुंच गया जब उसे अपने आने वाली जिन्दगी को एक दिशा देनी थी. अपने भविष्य की इस दिशा को निर्धारित करने के लिए एक दिशानिर्देशक की जरूरत होती है. अपने दिशानिर्देशक से मिलने के लिए वुंज की उम्र के बच्चे तपस्या करते थे. वुंज ने भी इस नियम का पालन किया. तपस्या करने के लिए उसे घर छोड़ना था. वुंज घर छोड़ कर बगल के जंगल में चला गया. जंगल में जाते समय उसने रास्ते में मिलने वाले पेड़, पौधों, फूलों को ध्यान से देखा. इस यात्रा में वह पौधों के बड़े होने फूल से फल बनने की प्रक्रिया से वाकिफ हो चुका था. प्रकृति के इन खूबसूरत नजारों से वाकिफ हो चुका था वुंज. इन पेड़ पौधों, फूल फलों को देख वुंज के मन में ख्याल आया , कितने खूबसूरत रचनाओं का निर्माण किया है प्रकृति ने. प्रकृति के पास सब कुछ है, फिर इसके पास कोई ऐसा उपाय तो होगा जिससे हम आसानी से अपने भोजन का इंतजाम कर सके. हमें मछ्ली, चिडिया या जानवरों की हत्या न करनी पड़े. मुझे उस तरीके की खोज करनी है.
वुन्ज़ ने जंगल में एक कुटिया बनाई. उस कुटिया में उसने अपनी तपस्या आरम्भ की.  एक दिन जब उसने आँख खोली उसके सामने सुनहरे –पीले चमकदार वस्त्र और अपने खुले सुनहरे बालों में सजा एक देवदूत नजर आया. देवदूत ने मुस्कुरा कर कहा मुझे प्रकृति ने तुम्हारे पास भेजा है. हमें पता है तुम खुद को बलवान या धनवान बनाने की इच्छा नहीं रखते बल्कि तुम्हारे अपनों के लिए कुछ करना चाहते हो. इसके लिए तुम्हें मुझसे द्वन्द करना पड़ेगा. जब तुम द्वन्द में मुझे पराजित कर दोगे तब मैं तुम्हारी मदद करूंगा. वुंज भूखे रहने के कारण कमजोर हो गया था फिर भी उसने द्वन्द करना स्वीकार कर लिया. पहले दिन के द्वन्द में वह जीत गया. देवदूत ने मुस्कुरा कर कहा मैं फिर आऊंगा. दूसरे और तीसरे दिन भी अपने कमजोर शरीर के बावजूद वुंज ने देवदूत को पछाड़ दिया. तीसरे दिन देवदूत ने मुस्कुरा कर कहा, कल हमारे बीच अंतिम  द्वन्द होगा. उसमें जब मैं हार जाऊं तुम मेरे वस्त्र और बाल ले लेना फिर इस जगह को साफ़ कर मेरे शरीर को यहाँ दफना देना. याद रखना यहाँ की मिट्टी गीली होनी चाहिए. फिर कुछ एक दिनों पर यहाँ आ कर यह पता कर लेना की मुझे फिर से जिन्दगी मिली या नहीं. हाँ बस बीच बीच में मेरे कब्र के ऊपर उगने वाले घास और बेकार पौधों को हटाते रहना. यह कह देवदूत चला गया. इतने में वुंज के पिता   आ गए उनहोंने वुंज को घर चलने कहा. मैं दो दिन बाद आपके साथ घर चलूँगा. वुंज ने मुस्कुरा कर पिता को विदा किया.
दूसरे दिन अपनी सारी शक्ति को जुटा कर वुंज ने देवदूत को हराया. इसके बाद उसने देवदूत के निर्देश का पालन कर उसके शरीर को दफना दिया. इतना काम करने के बाद अपने वह घर वापस चला गया.
हर तीसरे दिन उस जगह पर आ कर वुंज देवदूत के कब्र पर उगी घास और दूसरे पौधों को कब्र से हटाता था और कब्र की मिट्टी को गीला करता था. यह नियम कुछ दिनों तक चलता रहा. एक दिन अचानक उसकी नजर कब्र पर उग आये पौधे पर पडी. उस पौधे का तना हरी हरी पत्तियों से ढका था. इन पत्तियों के बीच से झाँक रहा था हरे , सुनहरे कपड़ों और रेशमी सुनहरे बालों और दूध से भरे दानों से सजी बालियाँ. इन बालियों को देख वुंज खुशी से उछल पड़ा, खुशी से उछलते हुए उसने अपने पिता को बुलाया, आओ मेरे दोस्त से मिलो. यह है भुट्टा अब हमें शिकार करने की जरूरत नहीं हम इन दूध भरे दानों से अपनी जरूरत पूरी कर सकते हैं. उसकी खुशी छलक रही थी.
पूरे परिवार ने अपने समुदाय के सदस्यों के साथ मिल कर भुट्टे के दानों का इस्तेमाल कर बड़े से भोज का आयोजन किया.



Monday, 28 September 2015

अंतर्मुखी बहिर्मुखी



अंतर्मुखी बहिर्मुखी

हेमा और सुनीधि की अच्छी दोस्ती थी। दोनों एक ही हॉस्टल में, लेकिन अलग अलग रूम में रहती थीं। । दोस्ती काफी अच्छी थी फिर भी दोनों को एक दूसरे की कुछ आदतों से बहुत परेशानी होती थी। हेमा जब भी सुनीधि के कमरे में जाती थी दरवाजे पर नौक कर परमिशन लेकर ही अन्दर जाती थी। यूं बार बार पूछना सुनीधि को नागवार गुजरता था, वहीं सुनीधि का फटाक से कमरे में घुस आना, धम से बिस्तर पर बैठ जाने वाली आदत से हेमा को उलझन होती थी । यह सब कुछ था, पर दोनों थीं बहुत अच्छी दोस्त ।
इस कहानी का यहाँ जिक्र क्यों हुआ?  दरअरसल मैं दो तरह के व्यक्तित्व की बात छेड़ना चाह रही हूँ: बहिर्मुखी और अंतर्मुखी । बहुत बार लोंगो से सुना है, वह बहुत introvert यानी अंतर्मुखी है, अपने मन की बात नहीं कहेगा/कहेगी।
हम अगर इन दोनों व्यक्तित्व को परिभाषित करना चाहें तो सी. जी. जंग के शब्दों में बहिर्मुखी और अंतर्मुखी व्यक्तित्व दरअसल व्यक्तियों द्वारा अपनी एनेर्जी इस्तेमाल करने के दो तरीके हैं:
अगर आप कहीं भी धड़ल्ले से खुद को अभिव्यक्त कर सकते /सकती हैं, लोंगों के बीच रहना पसंद करते/करती है,  लोंगों के बीच रहकर, बहुत तरह की गतिविधियों में शामिल होकर आपके  उत्साह में बढ़ोत्तरी होती है /एनर्जी मिलती है । आपकी दोस्ती का दायरा काफी बड़ा होता है । आप अपने विचार को तुरत व्यक्त कर देते हैं, निर्णय लेने में बहुत समय नहीं लगाते/लगातीं । किसी भी काम को तुरत शुरू कर देते/देती हैं । इसका मतलब आप एक बहिर्मुखी व्यक्तित्व हैं । इसका मतलब आप आराम से एक से अधिक काम को एक साथ संभाल सकते हैं । अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को इसी श्रेणी में रखा जाता है ।
         आप अपने मन में उठ रहे विचार, दिमाग में बन रही तस्वीर और अपनी प्रतिक्रियाओं के साथ रह कर, उस पर बार बार अकेले काम कर  उत्साहित होते/होती हैं । आप को अकेले रहना पसंद है । आप अधिक लोंगों के बीच उठाना बैठना पसंद नहीं करते/करतीं । अपने विचार का साझा करना पसंद नहीं करते या कर नहीं पाते । अपने मन में उठ रहे विचार को किसी को समझा पाना आपके लिए कठिन कार्य जैसा है । आपको निर्णय लेने में समय लगता है , यहाँ तक की कभी कभी आप अपने विचार को बाहरी दुनिया से जोड़ना भी भूल जाते/जातीं हैं । आपकी मित्र मंडली या तो नहीं है या आप बहुत ही छोटे दायरे में दोस्ती करना पसंद करते/करतीं हैं । इसका मतलब आप अंतर्मुखी है ।  इसका मतलब साधारण मान्यता के अनुसार आप अच्छे वैज्ञानिक या कलाकार या अध्यापक/अध्यापिका की जमात में शामिल हो सकते हैं ।
लेकिन क्या अधिकतर लोंगों में ऐसा साफ़ अंतर नजर आता है? हांलाकि आँकड़े कहते हैं कि दुनिया में बहिर्मुखी व्यक्तित्व बहुतायत में पाया जाता है ।  परन्तु जब हम ध्यान से अपने आस पास देखते हैं तो  हर व्यक्ति के व्यक्तित्व में यह दोनों पहलू विद्यमान नजर आते हैं ।
आगे बात बढाने से पहले एक बात स्पष्ट होना चाहिए आमतौर पर हम अंतर्मुखी व्यक्तित्व को शर्मिला करार देते है । पर ऐसा कुछ नहीं है, बहिर्मुखी व्यक्तित्व भी शर्मिला होता है । शर्मिलापन दरअसल दरअसल लोगों से अलग या दूर रहने की प्रवृति है जो किसी प्रकार के डर, नकारे जाने का भय आदि के कारण उतपन्न होती है जो सही माहौल मिलने पर दूर भी हो सकती है । जबकि यह दोनों व्यक्तित्व का जुड़ाव हमारे जींस (अनुवांशिकी) से है ।  इसलिए शिक्षकों, माता-पिता और मालिकों को इन व्यक्तित्व की पहचान अवश्य होनी चाहिए ताकि वह अपने बच्चों या कर्मचारियों को अधिक समझ सकें और उन्हें सही तरीके से संभाल सकें ।  
    इन दोंनो व्यक्तित्व के साथ काम करते समय हमें कुछ बिन्दुओं का ध्यान तो रखना पड़ता है क्योंकि दोनों के दिमाग के तार अलग अलग तरीके से जुड़े होते हैं, यानी एक ही उद्दीपन दोनों पर अलग अलग तरीके से असर डालता है ।
1960 में हंस ऑयसेंक (HANS EYESENCK) नामक मनोवैज्ञानिक के अनुसार बहिर्मुखी व्यक्तित्व को सजग और उत्साहित या ऊर्जावान करने के लिए अधिक उद्दीपन (stimulus) की जरूरत होती है जबकि अंतर्मुखी बहुत जल्दी सजग और ऊर्जावान हो जाते हैं, उन्हें अपनी ऊर्जा को कम और संगृहीत करने के लिए एकांत की जरूरत पड़ती है । हंस के इस विचार ने वैज्ञानिकों के लिए इन व्यक्तित्व को समझने का एक रास्ता खोल दिया ।
शोध के अनुसार इन दोंनो व्यक्तित्व के व्यवहार के लिए डोपामाइन (डोपामाइन) तंत्र  जिम्मेदार है । हमारे दिमाग के  दो भाग एमीगडल (amygdala) और न्यूक्लियस एकुम्बेंस (Nucleus Accumbens) इस तंत्र के भाग है । एमीगडल (amygdala) भावनात्मक उद्दीपन, जिसके कारण बह्रिमुखी व्यक्तित्व को उत्साह और रोमांच से भर देता है, के लिए जिम्मेदार है जबकि  न्यूक्लियस एकुम्बेंस (Nucleus Accumbens) हमारे सीखने की प्रक्रिया और ख़ास कर रिवार्ड की खोज से जुडी प्रक्रिया से जुडा होता है ।  इन दोनों हिस्सों ने दोनों व्यक्तित्व में एक स्थिति में दो तरह का व्यवहार दिखाया ।  बहिर्मुखी व्यक्तित्व किसी भी प्रकार के रिवार्ड से जल्दी प्रभावित और उत्साहित होता है इसलिए यह संभव है कि वह साहसिक/रोमांचक कार्य, सामाजिक बदलाव और इससे जुड़े रिस्क लेने के लिए अधिक उत्साह से आगे आएंगे ।
दोनों व्यक्तित्व में ये उद्दीपन (रिवार्ड)  अलग अलग राह अपनाते हैं । बहिर्मुखी व्यक्तित्व में यह राह बहुत छोटी है, यह दृष्टि, श्रवण, स्वाद आदि जैसे उद्दीपन की रह अपनाता है ।  जबकि अंतर्मुखी व्यक्तित्व इसे एक लम्बे और उलझे हुए रास्ता पर घुमाता है । यहाँ इसे याददास्त, योजना बनाने वाले और मुश्किलों को सुलझाने वाले हिस्से से हो कर गुजरना पड़ता है । 2012 में हारवार्ड विश्विद्यालय के रैंडी बकनर (Randy Buckner) के  शोध ने इस गुत्थी को थोड़ा और आसान किया । इस शोध के अनुसार अंतर्मुखी व्यक्तित्व के दिमाग के प्री - फ्रंटल (pre frontal) भाग में ग्रे मैटर (grey matter) कुछ अधिक मात्रा में पाया जाता है । मस्तिष्क का यह भाग सोचने समझने, निर्णय लेने की क्षमता से जुडा है । बहिर्मुखी व्यक्ति में यहाँ ग्रे मैटर थोड़ा कम होता है यानी निर्णय लेने में अधिक समय जाया नहीं होता, वो उस क्षण में जी लेते हैं । जबकि अंतर्मुखी सोचते रहते हैं । इसीलिये शायद अंतर्मुखी व्यक्तित्व हमारे लिए पहेली बना रहता है ।
अनुपमा झा

Friday, 29 May 2015

सैर की सैर



सैर की सैर
सैर को अपनी रूटीन में शामिल कर लो. इस तरह की हिदायद हम सबको मिलती रहती है. बहुत बार तो फोन पर भी बात- चीत के दौरान भी हमारे अपने पूछ डालते हैं, सैर करना बंद तो नहीं किया. आखिर क्यों न हो यह चिंता! हमारी lifestyle और अभी के मौसम के बदलते मिजाज ने हमें अनेक तरह के चहरदीवारों में कैद कर रखा है. वह घर की हो या आफिस की या फिर कार की या मेट्रो की हम दिन भर अन्दर ही तो रहते हैं.  अपनी सीट पर बैठ कर ही तो हम दिन गुजारते हैं; चाहे वह आफिस की सीट हो या घर की कुर्सी या कार, बस मेट्रो की सीट.  हाँ कभी कभी खड़े भी रहना होता है. 
काम नहीं होता या हम काम नहीं करते ऐसा तो नहीं है, काम तो शायद पहले के लोंगो से अधिक करते हैं, लेकिन काम का स्वभाव जो बदल गया है. इसलिए अपने पैरों को चलाने के लिए और यह याद रखने के लिए की मनुष्य अपने पैरों पर चलता भी है सैर अत्यावश्यक है.
बड़े शहर हों या छोटे सुबह सुबह या फिर शाम को सड़कों पर या पार्क में भागते हुए लोग मिल जायेंगे. बड़े शहरों में तो उन स्पाट पर जहां सैर किया जाता है आपको सुबह सुबह या शाम को कार की भीड़ नजर आ जायेगी. सैर करना है इसका मतलब यह तो नहीं कि हम घर से ही चल कर आयें. सड़क पर जगह घेरेंगे नहीं तो पता कैसे चलेगा सैर हो रहा है. 
खैर, मैं भी इस सैर वाले तबके में शामिल हूँ. मुझे सुबह सुबह यह काम कर लेना अच्छा लगता है. अभी दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस में हूँ तो विश्वविद्यालय का गार्डेन चुना है. ऐसे काफी लोग रिज भी जाते हैं. सुबह पांच बजे वहां उतनी भीड़ नहीं होती, 15-20 लोग टहलते नजर आते हैं. धीरे धीरे यह संख्या पांच से छ गुनी बढ़ जाती है.
अब सैर करते समय आँख और दिमाग तो खुला ही होता है, इसलिए आस पास नजर जाती रहती है. गार्डेन में काफी जगह है. सुबह पांच बजे ही गार्डेन के एक लान पर वरिष्ठ नागरिकों का एक दल आ जाता है, योगा क्लास करने. सिखाने वाले भी वरिष्ठ नागरिक ही हैं. फिर धीरे धीरे शुरू होता है उनका तरह तरह का आसन. मैं अपने प्रत्येक चक्कर में उनके अलग अलग आसन देखती हूँ. कभी सब पीठ के बल लेटे पैरों को ऊपर कर स्थिर करने की कोशिश में नजर आते हैं, कुछ कर भी लेते हैं, तो कभी पेट के बल लेट कर खुद को पर्वतासन में लाने की कोशिश में लगे रहते हैं. कभी अपने कधों, बांहों आदि को घुमाते नजर आते हैं, तो कभी आसन बाँध कर (कुछ के पैर खुले होते हैं) अनुलोम-विलोम करने की मुद्रा में. थोड़ा मुश्किल तो होता होगा इनके लिए लेकिन 15-20 लोंगो की उपस्थिति रोज ही दर्ज हो जाती है.
लान की दूसरी तरफ अलग अलग समूह नजर आते हैं, कोई दो के समूह में होता है, तो कोई तीन या चार तो कोई अकेला होता है. बहुत से लोग बस घास पर चलते नजर आते हैं आपस में बात करते हुए आ फिर अकेले ही. कुछ  कमर को घुमा कर अपनी waist-line सही करते नजर आते हैं. कुछ खुद से योगा के अलग अलग आसन करते और एक दूसरे को सिखाते नजर आ जाते है. 
बगीचे की तरफ जाने पर 5.45 के आस पास एक दूसरा सीनियर सिटिजन का समूह नजर आता है जो लान के बगल में बने चबूतरे पर बैठ पहले गायत्री मन्त्र और फिर तरह तरह के भजन का पाठ करता नजर आता है. इसे पाठ करना ही कहेंगें, क्योंकि लय  में बंध पाना हम सब के लिए थोड़ा कठिन तो होता ही है, और फिर यह तो सुबह की कोशिश है, एक सही शुरूआत की कोशिश. 
फिर अलग अलग छोटे छोटे पत्थर पर अलग अलग उम्र के पुरुष महिलायें किसी न किसी क्रिया में मगन नजर आते हैं. हाँ घास पर नंगे पाँव चलने वालों की संख्या भी कम नहीं है.
एक प्रमुख क्रिया की चर्चा नहीं हुई अभी तक, वह है शुद्ध सैर करने वाले जमात की. यह सबसे बड़ी जमात है, लेकिन विश्विद्यालय गार्डेन के इस छोटे से इकोसिस्टम के इस जमात में भी काफी विविधता है. एक बड़ा ग्रुप नजर आता है जो देश के हालात सरकार और नेताओं की खास्ता हालत से दुखी और निराश नाराज आता है. समस्याओं की गंभीरता के हिसाब से उनकी चाल भी बदलती है. दूसरा समूह व्यापार के उतार चढ़ाव की बातों में मशगूल होता है उसे किसी चीज की जल्दी नजर नहीं आती न तो चर्चा ख़त्म करने की न ही दूरी को जल्दी जल्दी तय करने. 
कुछ छोटे छोटे समूह भी होते हैं जिनके बीच भी चर्चा चलाती रहती है, लेकिन वो थोड़े गंभीर नजर आते हैं और अपनी गति को बनाए रखने पर भी ध्यान देते हैं. उनका मुख्य उद्देश्य सैर होता है इसलिए अगर उसपर असर आता है तो वह समूह छोड़ना पसंद करते हैं. कई पति, पत्नी, भाई-बहन, दोस्त आदि भी आते हैं. समूह में शामिल सदस्य की संख्या घटती बढ़ती रहती है. महिलाओं के भी अलग अलग तरह के समूह होते हैं और उनके बीच चल रही चर्चा का विषय भी विविध है. 25-30 वर्ष के बीच की महिलायें अक्सर बच्चों, उनके स्कूल, पढाई को लेकर चिंतित नजर आती और एक दूसरे को टिप्स देती-लेती नजर आती हैं. वहीं कुछ बच्चों के विषय और करियर के चुनाव पर विचार-विमर्श करती नजर आती हैं. टी वी सीरियल और बढ़ती मंहगाई भी उनकी चर्चा का मुख्य मुद्दा होता है. 
हर किसी के चलने यानी इस सैर की प्रक्रिया को अंजाम देने का अंदाज भी जुदा होता है. एक लड़के और लड़की की चाल को देख ऐसा महसूस होता है कि उन्हें सेना में होना चाहिए, सीधी पीठ और लम्बे लम्बे डग, चाल में काफी तेजी और तय लक्ष्य. उनकी टी-शर्ट पर ‘सेना’ लिखा हुआ भी है. तो कुछ होते हैं ठीक उल्टे ट्रैक पर कानों में इयर फोन चाल में मस्ती. कुछ मेरी तरह होते हैं अपनी गति को बढाने की कोशिश में लगे हुए. कुछ थोड़ी दूर चल कर बैठ कर अपनी बातों को नए गियर में डालते हैं और फिर चलने की सोचते हैं, तो कुछ चाल की गियर को बदल बातों से दूर चले जाते हैं. किसी को चलते चलते हर किसी का अभिवादन करना पसंद है तो कोई अपनी आँखें को खुद पर जमाए रखता है. वहीं कुछ चलते चलते चिड़ियों के लिए दाना भी फैला जाते हैं, और बाकी उन चिड़ियों से बच  कर निकल जाते हैं.  और ऐसे ही चलती रहती है इस  सैर की सैर.  

Sunday, 17 May 2015

कीड़े मकौड़े की नींद कितनी जरूरी




चुपके से आ जा री अँखियन में निंदिया आ जा री आ जा
हर समय घूमते –फिरते, उड़ते, लड़ते-भिड़ते, खाते-पीते, काटते रहने वाले ये कीड़े मकौड़े कभी आराम भी करते हैं? आखिर ये खुद को हमारी तरह रिचार्ज करते हैं या नहीं? इन्हें नींद की जरूरत होती है? क्या ये सोते भी हैं? क्या इनकी माँ इनके लिए बिस्तर तैयार करती है? इनके सोते रहने पर डांटती हैं?”
शायद बहुत मुश्किल है यह कह पाना. थोड़ा छोटा सा दिमाग है इनका, अभी तक बहुत अच्छे से उसके व्यवहार को पढ़ा नहीं गया है. फिर हमारे आस पास, दूर-दराज में इतने सारे, इतनी तरह के कीड़े मकौड़े भी तो हैं. इसलिए बहुत आसानी से तो इस प्रश्न का ज़बाब ‘हाँ’ में तो नहीं दे सकते. पर शोध इतना जरूर बताते हैं कि इनमें से अधिकतर किसी न किसी समय में खुद को समेट कर इस शोर भरी दुनिया से दूर करते हुए झपकी ले ही लेते हैं. वैज्ञानिक शब्दों में कहें तो वो ऐसा समय निकाल लेते हैं जब उनकी जीवन संबधी प्रक्रिया धीमी पड़ती है, वो अपने शरीर और मांसपेशियों को ढीला छोड़ते हैं. ठीक वैसा ही जैसा हमारा शरीर हमारे निद्रा देवी के गोद में जाने के बाद करता है. इन कीड़े मकौडों के पास पलकें तो हैं नहीं जिससे उनकी आँखे बंद दिखें.
अब थोड़ा ध्यान से अपने आस पास वाले कीड़ों को देखते हैं, मक्खियाँ प्रत्येक शाम अपने जबड़ों से किसी डंठल को जकड लेतीं है. अपने पैरों को मोड़ कर पंखों के पीछे/नीचे छुपा देती हैं. और फिर वहीं सिकुड़ कर पड जाती हैं सुबह होने तक. पूरे रात की नींद लेती हैं.
मोनार्च तितलियाँ (Monarch butterfly) अकेले नहीं सोतीं. पूरा समूह पेड़ों की पत्तियों के बीच खुद को  छुपा कर अपने पंखों को बंद कर पडा रहता है. उन दौरान यह पहचानना मुश्किल होता है कि कौन सी तितली है और कौन पत्ता. पूरी रात आराम करती हैं ताकि दिन भर बिना थके अपनी ड्यूटी कर सकें. बहुत सारे कीड़े सोते वक्त खुद को अपने आस पास के वातावरण से इस तरह मिला लेते हैं कि आपके लिए यह पहचान पाना मुश्किल होता है कि वह कीड़ा है या पेड़ की छाल या लकड़ी या कुछ और.
बहुत सारे कीड़े जैसे pill bug खुद को बचाने के लिए सो जाते हैं. ख़तरा भांपते ही खुद को गेंद की तरह बना लेते हैं और जीवन संबंधी सारी प्रक्रिया धीमी कर लेते हैं. और इस तरह खतरे को उस जीवन का भान नहीं होता और वह बच जाते हैं. (ऐसा वो सोचते हैं शायद).
अब न्यूजीलैंड में ऊंचाईयों पर पाए जाने वाले झिंगुर की समझदारी का क्या कहना, प्रत्येक रात को वह सोने के लिए बर्फ बन जाता है (freezes solid) और सुबह देख झटक कर निकल आता है अपने उस रूप से.
बहुत सारे कीड़े जिसमें हड्डा, लेडी बग, फत्तिंगे, भृंग आदि शामिल है  पेड़ों के में लम्बे समय के लिए गहरी नींद सोते हैं जिसे वैज्ञानिक डायपौज़ (diapause) कहते हैं.  
वैज्ञानिकों का कहना है कि इनके लिए भी नींद उतनी ही जरूरी है जितनी हमारे लिए. तेलचट्टा, फलों पर मंडराने वाली मक्खियाँ, बिच्छू को ठीक हमारे तरह अपनी जवानी में अधिक नींद आती है.  इनके भी दिमाग में बनने वाले रसायन इनकी नींद की जरूरत को नियंत्रित करते हैं. यह वही रसायन है जो हमारी नींद की जरूरत को नियंत्रित करता है. नींद नहीं पूरी होने पर ये भी हमारी तरह गलतियां करते हैं. आमतौर पर मधुमक्खियाँ खाने की जगह की दूरी बताने के लिए एक ख़ास तरह का नृत्य करती हैं, जिसे हम वैगल डांस कहते हैं. नींद न पूरी होने पर मधुमक्खियाँ इस नृत्य को सही ढंग से नहीं कर पातीं.
इतनी समानता है इसीलिये हमारी नींद के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने के लिए शोधकर्ता फलों पर मंडराने वाली मक्खियों का इस्तेमाल करते है. जी हाँ ये नींद लाने वाली दवाईयों और कॉफ़ी आदि के प्रति वही रवैया रखते हैं जो हम मनुष्य. यानी हमारी नींद के बारे में पता करने के लिए हमें तंग नहीं किया जाता है तंग होती हैं ये बेचारी मक्खियाँ. चलो इन्हें लोरी सुनाते हैं इनका सोना जरूरी है.
चुपके से आ जी री अँखियन में निंदिया आ जा री आ जा.