Friday, 30 September 2016

ball point पेन की कहानी

बाल पॉइंट पेन की कहानी
आज भी जब मैं पेन (जो अमूमन ball point pen होती हैं) को हाथ में थामती हूँ तो वह दिन याद आ जाते हैं जब स्कूल जाने से पहले निब वाली पेन में स्याही भरनी पड़ती थी. रोज सुबह माँ की हिदायत होती थी पेन में स्याही जांच लेने की. शायद ही कभी ऐसा होता था कि इस प्रक्रिया में मेरे हाथ या कपडे न रंगते हों. मैं ही नहीं अधिकतर बच्चे-बड़े परेशान रहते थे. अब देखो इतनी मेहनत से लिख लिख कर पन्ने भरे परन्तु यदि पन्ने की तबियत थोड़ी नासाज हो तो सारे अक्षर फ़ैल जायेंगें, इतना ही नहीं स्वस्थ्य पन्नों में बहुत मेहनत से लिखे मोती  जैसे अक्षर भी पानी की दो बूँद का साथ पाते ही अपनी नाराजगी दिखाते फ़ैल जाते हैं. फिर जब मर्जी हो पेन से स्याही बाहर और पेन्सिल बाक्स, या स्कूल बैग या फिर शर्ट की पाकेट हो अपना रंगीन मिजाज दर्शा कर हमारा मिज़ाज बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी. ऐसे में ball point pen एक वरदान ही था. हर लिखने वालों का चहेता. यह बात अलग है कि बड़े खुद तो इसका इस्तेमाल धडल्ले से करते थे पर हम बच्चों को अपनी लिखाई बनाये रखने की हिदायत दे कर इससे दूर रखा करते थे. खैर यह तो पुरानी बातें हो गयीं अब तो हर किसी के हाथ में बाल पॉइंट पेन ही नजर आती है. अब इस पेन को हाथ में लेते हुए इसका इजाद करने वाले को तहे  दिल से शुक्रिया कहने को मन मचल उठता है. कल गूगल डूडल को इस पेन के अन्वेषणकर्ता ‘Ladislao José Biro’ को याद करता देख इसकी कहानी दोहराने का लालच रोक नही पाई.
इसके इतिहास को देखने से साफ़ पता चलता है कि स्याही वाले पेन से दुखी रहने वालों की कतार में अनेक लोग शामिल थे. जब मन दुखी होगा तो उसके विकल्प की तलाश तो होगी ही. ऐसे में Ladislao José Biro’ जो पेशे से पत्रकार थे और छापेखाने में काम किया करते थे को कुछ सूझ गया. यह विचार उनके मन में छापेखाने में इस्तेमाल होने वाली स्याही को देख कर आया. यह स्याही कागज़ के ऊपर रोलर के घूमते ही सूख जाया करती थी यानी स्याही के फ़ैलने का डर छू-मंतर. लेकिन यहाँ एक परेशानी थी रोलर की मदद से अक्षर बना पाना संभव नहीं था. रोलर तो सिर्फ आगे पीछे घूमता है जबकि अक्षर बनाने के लिए चारो तरफ घूमना जरूरी है. लेकिन खोजी दिमाग कब रुकता है Ladislao José Biro को बच्चों के खेल ने रास्ता दिखाया. Biro ने बच्चों को कंचे खेलते देखा. कंचे इधर इधर लुढ़क रहे थे. एक कंचा उनके सामने से घूमता हुआ गुजरा और उसने फर्श पर पानी की लकीर खींच दी. इस लकीर ने महाशय Biro के मन में  छोटे से ball का इस्तेमाल कर पेन बनाने का विचार रोप दिया. फिर क्या था एक छपाई की स्याही से भरे एक पतले सी नली के ऊपर एक ball को लगाया गया. इस ball और नली को एक छोटा सा socket जोड़ रहा था. socket की मदद से ball आसानी से चारो तरफ घूम सकता था. Biro का सोचना था कि हल्के से दवाब से नली की स्याही ball पर आ जायेगी और कागज़ पर जैसे जैसे ball घूमेगी स्याही अपना कमाल दिखायेगी यानी अक्षर बनायेगी. विचार तो काफी अच्छा था परन्तु छपाई वाली स्याही अधिक गाढ़ी साबित हो गयी. अब क्या करें. ऐसे में biro की सहायता की उनके भाई ने जो एक रसायनशास्त्री थे. दोनों भाईयों ने मिलकर सही गाढापन वाली स्याही तैयार की और पेन में इस्तेमाल किया बस फिर क्या था; socket पर लगा ball घूम घूम कर अक्षर बनाने लगा और पेन चल पडी. अब यह किस तरह चल पडी इसका अंदाज आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि सन 1945 में जब यह पेन बाजार में आई, उनकी ऊंचीं कीमत (आज के 150 डॉलर) के बावजूद उसे खरीदने वालों की लम्बी कतार लग गयी थी. हवा में उड़ने वाले यानी विमान चालाक तो इसे किसी भी कीमत पर खरीदने तैयार थे आखिरकार किसी भी ऊँचाई पर बिना स्याही फेंके यह पेन काम करती थी. यानी दोनों भाईयों ने तो पेन के बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया. इस पेन ने दोनों भाईयों को सिर्फ शोहरत ही नहीं दी बल्कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय उनकी यह खोज उनका बड़ा सहारा बन कर सामने आयी. दूसरे विश्वयुद्ध के समय हंगरी नाजी जर्मन के साथ था, इस कारण हंगरी यहूदियों के रहने के लिए सही जगह नहीं थी. Biro यहूदी थे. परिस्थिति के कारण उन्हें अपनी जगह छोड़नी पडी. खुद को क्रिस्तान बता कर दोनों भाई अर्जेंटीना पहुंचे वहां उनहोंने  अपनी खोज का इस्तेमाल करना शुरू किया. एक पेन बनानी वाली कंपनी की शुरूआत हुई. यहाँ ball point पेन तैयार होती थी जो देखते ही देखते बाज़ार में छा गयी. इस तरह दोनों भाईयों ने अपने परिवार को  नाजियों के कहर से बचा लिया.
लेकिन लेकिन लेकिन यहाँ एक बात और साफ़ कर दूं इन दोनों भाईयों से पहले भी कोई था जिसकी सोच बिलकुल ऐसी ही थी. 1888 में जॉन लाउड नामक अमेरिकी वकील ने भी इस तरह की पेन को बनाया था. उनकी पेन कपडे और चमड़े पर तो चलती थी पर कागज़ से दोस्ती नहीं कर पाई. इसकारण उनका आविष्कार सामने नहीं आ पाया.
खैर ! महाशय जॉन लाउड के साथ हमारी हमदर्दी तो है पर इतना जरूर मानेंगे कि इन तीनों के कारण हमारे हाथ ऐसी चीज जरूर लगी जिसने हमारी अनेक परेशानी से एक ही झटके में छुटकारा दिला दिया. अब ना तो  स्याही की बोतल ढोने का झंझट है और न ही हाथ और कपडे के गंदे होने का यहाँ तक कि पानी के पड़ने पर भी स्याही नही फैलेगी. हाँलाकि इस पेन के कारण हमारी लिखावट थोड़ी खराब जरूर हो गयी है. इससे अलग अलग अक्षर लिखना तो आसान है लेकिन अक्षरों को मिलाकर (Cursive) लिखना आसान नहीं होता है. फिर बहुत बार इस पेन के अधिक इस्तेमाल से उंगलियाँ भी दुखती हैं. अब हमें यह तो समझना ही पड़ेगा कि इस पेन के काम करने का तरीका थोड़ा अलग है. यह सही से चले इसके लिए हमें हल्का दबाव बनाना पड़ता है.
लेकिन जो भी हो यह एक कमाल की खोज है.


Thursday, 29 September 2016

बच्चों की धारणाएं

बादल में पानी आया कहां से
पिछले छ: दिन से हम और बहराइच जिले के बेगमपुर में अवस्थित  कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की लडकियां रोज तकरीबन 5 घंटा साथ गुजार रहे थे. इतने दिन काफी हैं एक दूसरे को जानने के लिए.  यह हमारा छठा दिन था और यहाँ सुबह से बारिश हो रही थी. किसी तरह हम विद्यालय पहुंचे. बारिश तेज थी इसलिए मैं सामने वाली कक्षा में चली गयी. यूं हम आम तौर पर विद्यालय के पिछले भाग में अवस्थित पुस्तकालय में मिलते थे. बारिश हो रही थी बच्चों का ध्यान बारिश की टिपिर टिपिर की तरफ था, साथ ही शायद यह उत्सुकता भी थी कि आखिर आज किस विषय की चर्चा होगी. मैंने कक्षा पर नजर  दौडाई यह कक्षा 8 थी. मेरी नजर आसमान पर गयी. आसमान काले काले बादलों से भरा था, बारिश रुकने का लक्षण नजर नहीं आ रहा था. “आखिर इन बादल में पानी कहां से आता है?” मेरे मुँह से अचानक यह प्रश्न निकल गया.

कक्षा में कुछ देर तक शाति फ़ैल गयी. मैंने बच्चों को आपस में चर्चा करने उकसाया. उनके सामने दूसरा प्रश्न रखा “बादल आते कहां से हैं क्या यह हमेशा आसमान में रहते हैं?”

एक दबी सी आवाज आई,” हाँ, आसमान में रहते हैं.” मैंने सर घुमाया तो कक्षा में उपस्थित सारे सर हामी में हौले हौले हिल तो रहे थे लेकिन उनकी आँखों में असमंजस भी नजर आ रहा था. 

“अच्छा! यानी आसमान में उनका घर होगा.”

“हाँ, वहीं रहते हैं तो घर होगा ही.” जवाब आया.

अब बहुमत था तो सहमत तो होना ही था.  लेकिन यह अभी तक समझ में नहीं आया कि आखिरकार इनमें पानी कहां से आता है. धरती पर तो नदियों, तालाब, समुद्र, हैण्ड पम्प आदि में पानी होता है हम वहां से पानी लेते हैं. फिर यह बादल पानी कहां से लाता है, आसमान में तो कोई नदी या तालाब नजर नहीं आता?

बच्चे सोच में पड़ चुके थे. मैंने इस चुप्पी की अपेक्षा नहीं की थी. मेरा विचार था आठवीं के बच्चों को जल चक्र की जानकारी होनी चाहिए. खैर बात आगे बढ़ी बच्चियों के सर आपस में जुड़ गए.

अचानक संध्या उठी, “नदी या समुद्र का पानी भाप में बदलता है और उसे बादल ले जाता है.”
“अच्छा! कैसे ले जाता है क्या बादल नीचे आता है और भाप को समेट लेता है?” मैंने बच्चों को परेशान करना तय कर रखा था.

“फिर चुप्पी”

“दरअसल इन्द्रधनुष बादल से समुद्र तक सीढ़ी बनाता है और पानी या भाप उस सीढ़ी से होकर बादल तक पहुँच जाता है.” सकुचाती हुई दीप्ति बोल पडी. 

"मुझे भी बचपन में सूनी कहानी याद आ गयी जिसमें एक बच्ची इन्द्रधनुष पर चढ़ आसमान तक पहुंचती थी. 

“यानी समुद्र या नदी का पानी भाप बनता है फिर इन्द्रधनुष की सीढ़ी से होकर बादल तक पहुंचता है. लेकिन अभी भी एक प्रश्न बचता है.  बादल तक भाप पहुंचा लेकिन बादल से जो नीचे गिरता है वह तो पानी है. अब यह पानी कहां से आया?”

बच्चे फिर मुश्किल में पड़े. वाकई भाप की जगह पानी क्यों नीचे आता है?

थोड़ी देर बाद बहुत सोचने समझने के बाद शहनाज ने कहा, “ आसमान में बर्फ होता है उससे भाप पानी में बदल जाता है और वह पानी बरसा देता है.”

यह रहस्य भी सुलझ गया और इतने देर में यह आश्वासन मिल गया कि बच्चों को यह पता है कि पानी गर्म होकर भाप बनता है और भाप को पानी में बदलने के लिए ठंढक चाहिए.

इसके बाद मैंने सोचा कि चलो परियों के खेल खेल में बादल बनाने वाली कहानी सुना कर हम बादल का बनना, गरजना और बिजली का चमकना आदि सारी बातें एक साथ कर लेंगें.
इस कहानी में परियां सूर्य की मदद से समुद्र के पानी का बादल बनाती हैं उन्हें आसमान में लाकर बिखेर देती हैं. उन्हें इस काम में इतना मजा आता है कि वह ढेर सारा बादल बनाने लगती हैं और नतीजा होता है बादलों का भारी होना, भाप का पानी में बदलना, बादलों का टकराना. इन सारी प्रक्रियाओं के कारण बादल गरजने लगे, बिजली चमकने लगी और बादल पानी में बदल धरती पर वापस आ गए. इस तरह आसमान से फिर बादल गायब हो गए. परियां उदास हो गयीं लेकिन हिम्मत नहीं हारी और फिर से सूरज की मदद से बादल बनाने लगीं. अब परियों को इस काम में बहुत मजा आने लगा और बादल के बार बार पानी के रूप में धरती पर लौटने के बावजूद वह यह काम करती रहती हैं.
कहानी ने बादल बनने की धारणा को थोड़ी स्पष्टता तो प्रदान की. लेकिन एक बार फिर यह पूछे जाने पर की बादल कैसे बनता है. कुछ बच्चियों ने तो सही जवाब दे दिया लेकिन एक ने हल्के से कहा, ”परियां बनाती हैं बादल.”