बाल पॉइंट पेन की कहानी
आज भी जब मैं पेन (जो अमूमन
ball point pen होती हैं) को हाथ में थामती हूँ तो वह दिन याद आ जाते हैं जब स्कूल
जाने से पहले निब वाली पेन में स्याही भरनी पड़ती थी. रोज सुबह माँ की हिदायत होती
थी पेन में स्याही जांच लेने की. शायद ही कभी ऐसा होता था कि इस प्रक्रिया में
मेरे हाथ या कपडे न रंगते हों. मैं ही नहीं अधिकतर बच्चे-बड़े परेशान रहते थे. अब
देखो इतनी मेहनत से लिख लिख कर पन्ने भरे परन्तु यदि पन्ने की तबियत थोड़ी नासाज हो
तो सारे अक्षर फ़ैल जायेंगें, इतना ही नहीं स्वस्थ्य पन्नों में बहुत मेहनत से लिखे
मोती जैसे अक्षर भी पानी की दो बूँद का
साथ पाते ही अपनी नाराजगी दिखाते फ़ैल जाते हैं. फिर जब मर्जी हो पेन से स्याही बाहर
और पेन्सिल बाक्स, या स्कूल बैग या फिर शर्ट की पाकेट हो अपना रंगीन मिजाज दर्शा
कर हमारा मिज़ाज बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी. ऐसे में ball point pen एक
वरदान ही था. हर लिखने वालों का चहेता. यह बात अलग है कि बड़े खुद तो इसका इस्तेमाल
धडल्ले से करते थे पर हम बच्चों को अपनी लिखाई बनाये रखने की हिदायत दे कर इससे
दूर रखा करते थे. खैर यह तो पुरानी बातें हो गयीं अब तो हर किसी के हाथ में बाल
पॉइंट पेन ही नजर आती है. अब इस पेन को हाथ में लेते हुए इसका इजाद करने वाले को तहे
दिल से शुक्रिया कहने को मन मचल उठता है.
कल गूगल डूडल को इस पेन के अन्वेषणकर्ता ‘Ladislao José Biro’ को याद करता देख इसकी कहानी दोहराने का लालच रोक नही पाई.
इसके इतिहास को देखने से
साफ़ पता चलता है कि स्याही वाले पेन से दुखी रहने वालों की कतार में अनेक लोग
शामिल थे. जब मन दुखी होगा तो उसके विकल्प की तलाश तो होगी ही. ऐसे में Ladislao
José Biro’ जो पेशे से पत्रकार थे और
छापेखाने में काम किया करते थे को कुछ सूझ गया. यह विचार उनके मन में छापेखाने में
इस्तेमाल होने वाली स्याही को देख कर आया. यह स्याही कागज़ के ऊपर रोलर के घूमते ही
सूख जाया करती थी यानी स्याही के फ़ैलने का डर छू-मंतर. लेकिन यहाँ एक परेशानी थी रोलर की मदद
से अक्षर बना पाना संभव नहीं था. रोलर तो सिर्फ आगे पीछे घूमता है जबकि अक्षर
बनाने के लिए चारो तरफ घूमना जरूरी है. लेकिन खोजी दिमाग कब रुकता है Ladislao
José Biro को बच्चों के खेल ने
रास्ता दिखाया. Biro ने बच्चों को कंचे खेलते देखा. कंचे इधर इधर लुढ़क रहे थे. एक
कंचा उनके सामने से घूमता हुआ गुजरा और उसने फर्श पर पानी की लकीर खींच दी. इस
लकीर ने महाशय Biro के मन में छोटे से
ball का इस्तेमाल कर पेन बनाने का विचार रोप दिया. फिर क्या था एक छपाई की स्याही
से भरे एक पतले सी नली के ऊपर एक ball को लगाया गया. इस ball और नली को एक छोटा सा
socket जोड़ रहा था. socket की मदद से ball आसानी से चारो तरफ घूम सकता था. Biro का
सोचना था कि हल्के से दवाब से नली की स्याही ball पर आ जायेगी और कागज़ पर जैसे
जैसे ball घूमेगी स्याही अपना कमाल दिखायेगी यानी अक्षर बनायेगी. विचार तो काफी
अच्छा था परन्तु छपाई वाली स्याही अधिक गाढ़ी साबित हो गयी. अब क्या करें. ऐसे में
biro की सहायता की उनके भाई ने जो एक रसायनशास्त्री थे. दोनों भाईयों ने मिलकर सही
गाढापन वाली स्याही तैयार की और पेन में इस्तेमाल किया बस फिर क्या था; socket पर
लगा ball घूम घूम कर अक्षर बनाने लगा और पेन चल पडी. अब यह किस तरह चल पडी इसका
अंदाज आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि सन 1945 में जब यह पेन बाजार में आई, उनकी
ऊंचीं कीमत (आज के 150 डॉलर) के बावजूद उसे खरीदने वालों की लम्बी कतार लग गयी थी.
हवा में उड़ने वाले यानी विमान चालाक तो इसे किसी भी कीमत पर खरीदने तैयार थे
आखिरकार किसी भी ऊँचाई पर बिना स्याही फेंके यह पेन काम करती थी. यानी दोनों
भाईयों ने तो पेन के बाजार पर अपना कब्जा जमा लिया. इस पेन ने दोनों भाईयों को
सिर्फ शोहरत ही नहीं दी बल्कि दूसरे विश्वयुद्ध के समय उनकी यह खोज उनका बड़ा सहारा
बन कर सामने आयी. दूसरे विश्वयुद्ध के समय हंगरी नाजी जर्मन के साथ था, इस कारण
हंगरी यहूदियों के रहने के लिए सही जगह नहीं थी. Biro यहूदी थे. परिस्थिति के कारण
उन्हें अपनी जगह छोड़नी पडी. खुद को क्रिस्तान बता कर दोनों भाई अर्जेंटीना पहुंचे
वहां उनहोंने अपनी खोज का इस्तेमाल करना
शुरू किया. एक पेन बनानी वाली कंपनी की शुरूआत हुई. यहाँ ball point पेन तैयार
होती थी जो देखते ही देखते बाज़ार में छा गयी. इस तरह दोनों भाईयों ने अपने परिवार
को नाजियों के कहर से बचा लिया.
लेकिन लेकिन लेकिन यहाँ एक
बात और साफ़ कर दूं इन दोनों भाईयों से पहले भी कोई था जिसकी सोच बिलकुल ऐसी ही थी.
1888 में जॉन लाउड नामक अमेरिकी वकील ने भी इस तरह की पेन को बनाया था. उनकी पेन
कपडे और चमड़े पर तो चलती थी पर कागज़ से दोस्ती नहीं कर पाई. इसकारण उनका आविष्कार
सामने नहीं आ पाया.
खैर ! महाशय जॉन लाउड के
साथ हमारी हमदर्दी तो है पर इतना जरूर मानेंगे कि इन तीनों के कारण हमारे हाथ ऐसी
चीज जरूर लगी जिसने हमारी अनेक परेशानी से एक ही झटके में छुटकारा दिला दिया. अब ना
तो स्याही की बोतल ढोने का झंझट है और न
ही हाथ और कपडे के गंदे होने का यहाँ तक कि पानी के पड़ने पर भी स्याही नही फैलेगी.
हाँलाकि इस पेन के कारण हमारी लिखावट थोड़ी खराब जरूर हो गयी है. इससे अलग अलग
अक्षर लिखना तो आसान है लेकिन अक्षरों को मिलाकर (Cursive) लिखना आसान नहीं होता
है. फिर बहुत बार इस पेन के अधिक इस्तेमाल से उंगलियाँ भी दुखती हैं. अब हमें यह
तो समझना ही पड़ेगा कि इस पेन के काम करने का तरीका थोड़ा अलग है. यह सही से चले
इसके लिए हमें हल्का दबाव बनाना पड़ता है.
लेकिन जो भी हो यह एक कमाल
की खोज है.
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