Wednesday, 5 October 2016

शिउली की गमक : शरद ऋतु के आगमन की दस्तक

शिउली

सुबह सुबह टहल कर आते समय अगर कॉलोनी के गेट पर ही शिउली की मीठी मीठी सुगंध प्यार के साथ स्वागत करे तो समझ लो शरद ऋतु का आगमन हो गया.  इस ऋतु की सुबह की तरह यह शिउली का फूल भी सादगी और सुकून से भरा नजर आता है.  
देवी के आगमन  की नाद इस फूल से जमीन के सजने के बाद ही सुनाई पड़ती है.
गाढे हरे रंग की चमकदार किन्तु रुखड़ी पत्तियों वाले 10 से 12 मीटर ऊंचें पेड़ के क़दमों में खिलखिलाती हुई नन्ही सफ़ेद पंखुड़ियों वाली नाजुक चादर बरबस फूलों को अंजली में भरने के लिए उकसा देतीं हैं. मुझे याद है मेरी अम्मी कहा करती थी कि जमीन पर पड़े यह फूल इतने जीवन से भरे होते हैं कि भगवान भी इन्हें स्वीकार करते हैं. पता है न पूजा की थाल में जमीन से उठाये फूल को जगह नहीं मिलती है. लेकिन शिउली अनोखी है इसे तो जमीन से उठा कर ही ईश्वर को नमन किया जाता है. आखिर भगवान भी क्या करें इतने खूबसूरत रंग रूप और खुशबू वाले फूल सुबह सुबह अपनी टहनियों को छोड़ जमीन पर बिछ जाते हैं. अब इनका साथ पाने के लिए भगवान को भी अपने condition (नियम) को बदलना तो पडेगा ही.
इन नन्हें फूल की पंखुड़ियों में मुझे बर्फ की सफेदी नजर नहीं आती. इन चार, पांच या छ: खुली सफ़ेद  पंखुड़ियों ने जैसे अपने नन्हें गाढे नारंगी रंग की नली की आभा को भी खुद में समेट लिया है. इन फूलों को हाथ में लेने में सावधानी बरतनी पड़ती है लेकिन अगर ध्यान से इन पंखुड़ियों पर नजर डालो तो इनके हल्के मोटे होने का भान होगा. जैसे वह हमसे कह रहीं हों मुस्कुराने और नाजुक दिखने के लिए कमजोर होना जरूरी नहीं है.  
बंगालियों के लिए शिउली, जो पारिजात और हरश्रृंगार के नाम से भी जाना जाता है को हमारे मिथक प्राचीन कथाओं में स्थान न मिले यह कैसे हो सकता है. हमारी प्राचीन कथाएँ इसे समुद्र मंथन का परिणाम मानती हैं. भगवान इंद्र से जीत कर कृष्ण ने इसे अपने आँगन में लगाया. रानी रुक्मिणी के आँगन की शोभा था यह वृक्ष लेकिन इसके फूल महारानी सत्यभामा के आँगन की शोभा बढाते था. कृष्ण की लीला अपरमपार.
यह तो भगवान लोगों का मामला था. लेकिन एक दूसरी कहानी पारिजात के इस फूल की बात करती है. इस कहानी के अनुसार पारिजात एक खूबसूरत सी राजकुमारी थी जिसे सूर्य देवता पसंद आ गए. सूर्य देवता को भी पारिजात पसंद थी लेकिन साथ पाने के लिए पारिजात को सूर्य देवता से कुछ वायदा करना था. वह वायदा था कि वह सूर्य से कभी दूर नहीं जायेंगी. पारिजात ने अपनी सहमती दे दी. शरद ऋतू में दोनों की शादी हो गयी. शरद और वसंत ऋतू आई और चली गयीं. सूर्य और पारिजात को इसकी खबर नहीं हुई. किन्तु ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ सूर्य का रौद्र रूप सामने  आने लगा. पारिजात इसे बर्दास्त नहीं कर पा रही थीं, नतीजा वह सूर्य से दूर होने लगी. सूर्य को यह बात नागवार गुज़री और उनके क्रोध ने पारिजात को जला डाला. बाद में जब सूर्य को अपनी गलती का अहसास हुआ वह देवताओं से सहायता माँगने गए. देवताओं ने उन्हें सहायता प्रदान की, लेकिन उनकी भी शर्त थी. वह शर्त थी कि वह पारिजात को अपना रौद्र रूप नहीं दिखाएँगे. कहते हैं उसके बाद से पारिजात और सूर्य सिर्फ रात में मिलते हैं. इसलिए पारिजात के फूल रात के समय ही खिल कर अपनी खुशबू बिखेरती है और सुबह होते ही अपने पौधे से जुदा हो जाती है. इसके इस स्वभाव के कारण इसके पेड़ को दुखी पेड़ की उपाधी प्रदान कर दी गयी है. अब पेड़ को आप दुखी पेड़ कह डालो लेकिन यह यह फूल तो बंगला समुदाय (बंगालियों) के बीच उत्साह और रौनक का माहौल लाता है.  
शरद के आगमन की सूचना देने वाला यह फूल बंगालियों के प्रमुख त्यौहार दुर्गापूजा की शोभा है और इसीलिये बंगाल ने इसे अपना राज्य फूल भी घोषित कर रखा है. भारत का बंगाल हो या बंगलादेश वहां के निवासियों के लिए शिउली  फूल काफी ख़ास है. अब इसे रात का चमेली कहो या फिर हरश्रृंगार, पारिजात या फिर शिउली के नाम से पुकारो, हर नाम के साथ इस  नजाकत और मुस्कराहट नजर आती है. इसी मुसकुराहट, नजाकत और सादगी के कारण ही शायद मेरे बाबूजी ने अपनी पोती का नाम “शिउली” रखा.  







No comments:

Post a Comment