अंतर्मुखी बहिर्मुखी
हेमा और सुनीधि की अच्छी दोस्ती थी।
दोनों एक ही हॉस्टल में, लेकिन अलग अलग रूम में रहती थीं। । दोस्ती काफी अच्छी थी
फिर भी दोनों को एक दूसरे की कुछ आदतों से बहुत परेशानी होती थी। हेमा जब भी सुनीधि
के कमरे में जाती थी दरवाजे पर नौक कर परमिशन लेकर ही अन्दर जाती थी। यूं बार बार
पूछना सुनीधि को नागवार गुजरता था, वहीं सुनीधि का फटाक से कमरे में घुस आना, धम
से बिस्तर पर बैठ जाने वाली आदत से हेमा को उलझन होती थी । यह सब कुछ था, पर दोनों
थीं बहुत अच्छी दोस्त ।
इस कहानी का यहाँ जिक्र क्यों हुआ? दरअरसल मैं दो तरह के व्यक्तित्व की बात छेड़ना चाह रही हूँ: बहिर्मुखी और
अंतर्मुखी । बहुत बार लोंगो से सुना है, “वह बहुत introvert यानी अंतर्मुखी है, अपने मन की बात नहीं कहेगा/कहेगी।“
हम अगर इन दोनों व्यक्तित्व को परिभाषित करना चाहें
तो सी. जी. जंग के शब्दों में बहिर्मुखी और अंतर्मुखी व्यक्तित्व दरअसल व्यक्तियों
द्वारा अपनी एनेर्जी इस्तेमाल करने के दो तरीके हैं:
अगर
आप कहीं भी धड़ल्ले से खुद को अभिव्यक्त कर सकते /सकती हैं, लोंगों के बीच रहना
पसंद करते/करती है, लोंगों के बीच रहकर,
बहुत तरह की गतिविधियों में शामिल होकर आपके उत्साह में बढ़ोत्तरी होती है /एनर्जी मिलती है ।
आपकी दोस्ती का दायरा काफी बड़ा होता है । आप अपने विचार को तुरत व्यक्त कर देते
हैं, निर्णय लेने में बहुत समय नहीं लगाते/लगातीं । किसी भी काम को तुरत शुरू कर
देते/देती हैं । इसका मतलब आप एक बहिर्मुखी व्यक्तित्व हैं । इसका मतलब आप आराम से
एक से अधिक काम को एक साथ संभाल सकते हैं । अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा को
इसी श्रेणी में रखा जाता है ।
आप अपने मन में उठ रहे विचार, दिमाग में बन रही तस्वीर और
अपनी प्रतिक्रियाओं के साथ रह कर, उस पर बार बार अकेले काम कर उत्साहित होते/होती हैं । आप को अकेले रहना
पसंद है । आप अधिक लोंगों के बीच उठाना बैठना पसंद नहीं करते/करतीं । अपने विचार
का साझा करना पसंद नहीं करते या कर नहीं पाते । अपने मन में उठ रहे विचार को किसी
को समझा पाना आपके लिए कठिन कार्य जैसा है । आपको निर्णय लेने में समय लगता है ,
यहाँ तक की कभी कभी आप अपने विचार को बाहरी दुनिया से जोड़ना भी भूल जाते/जातीं हैं
। आपकी मित्र मंडली या तो नहीं है या आप बहुत ही छोटे दायरे में दोस्ती करना पसंद
करते/करतीं हैं । इसका मतलब आप अंतर्मुखी है ।
इसका मतलब साधारण मान्यता के अनुसार आप अच्छे वैज्ञानिक या कलाकार या
अध्यापक/अध्यापिका की जमात में शामिल हो सकते हैं ।
लेकिन क्या अधिकतर लोंगों में ऐसा साफ़ अंतर नजर आता
है? हांलाकि आँकड़े कहते हैं कि दुनिया में बहिर्मुखी व्यक्तित्व बहुतायत में पाया
जाता है । परन्तु
जब हम ध्यान से अपने आस पास देखते हैं तो हर व्यक्ति के व्यक्तित्व में यह दोनों पहलू विद्यमान
नजर आते हैं ।
आगे बात बढाने से पहले एक बात स्पष्ट होना चाहिए
आमतौर पर हम अंतर्मुखी व्यक्तित्व को शर्मिला करार देते है । पर ऐसा कुछ नहीं है,
बहिर्मुखी व्यक्तित्व भी शर्मिला होता है । शर्मिलापन दरअसल दरअसल लोगों से अलग या
दूर रहने की प्रवृति है जो किसी प्रकार के डर, नकारे जाने का भय आदि के कारण उतपन्न
होती है जो सही माहौल मिलने पर दूर भी हो सकती है । जबकि यह दोनों व्यक्तित्व का
जुड़ाव हमारे जींस (अनुवांशिकी) से है ।
इसलिए शिक्षकों, माता-पिता और मालिकों को इन व्यक्तित्व की पहचान अवश्य
होनी चाहिए ताकि वह अपने बच्चों या कर्मचारियों को अधिक समझ सकें और उन्हें सही
तरीके से संभाल सकें ।
इन
दोंनो व्यक्तित्व के साथ काम करते समय हमें कुछ बिन्दुओं का ध्यान तो रखना पड़ता है
क्योंकि दोनों के दिमाग के तार अलग अलग तरीके से जुड़े होते हैं, यानी एक ही
उद्दीपन दोनों पर अलग अलग तरीके से असर डालता है ।
1960 में हंस ऑयसेंक (HANS EYESENCK) नामक
मनोवैज्ञानिक के अनुसार बहिर्मुखी व्यक्तित्व को सजग और उत्साहित या ऊर्जावान करने
के लिए अधिक उद्दीपन (stimulus) की जरूरत होती है जबकि अंतर्मुखी बहुत जल्दी सजग
और ऊर्जावान हो जाते हैं, उन्हें अपनी ऊर्जा को कम और संगृहीत करने के लिए एकांत
की जरूरत पड़ती है । हंस के इस विचार ने वैज्ञानिकों के लिए इन व्यक्तित्व को समझने
का एक रास्ता खोल दिया ।
शोध के अनुसार इन दोंनो व्यक्तित्व के व्यवहार के
लिए डोपामाइन (डोपामाइन) तंत्र जिम्मेदार
है । हमारे दिमाग के दो भाग एमीगडल
(amygdala) और न्यूक्लियस एकुम्बेंस (Nucleus Accumbens) इस तंत्र के भाग है । एमीगडल
(amygdala) भावनात्मक उद्दीपन, जिसके कारण बह्रिमुखी व्यक्तित्व को उत्साह और
रोमांच से भर देता है, के लिए जिम्मेदार है जबकि न्यूक्लियस एकुम्बेंस (Nucleus Accumbens) हमारे
सीखने की प्रक्रिया और ख़ास कर रिवार्ड की खोज से जुडी प्रक्रिया से जुडा होता है । इन दोनों हिस्सों ने दोनों व्यक्तित्व में एक
स्थिति में दो तरह का व्यवहार दिखाया । बहिर्मुखी व्यक्तित्व किसी भी प्रकार के रिवार्ड
से जल्दी प्रभावित और उत्साहित होता है इसलिए यह संभव है कि वह साहसिक/रोमांचक
कार्य, सामाजिक बदलाव और इससे जुड़े रिस्क लेने के लिए अधिक उत्साह से आगे आएंगे ।
दोनों व्यक्तित्व में ये उद्दीपन (रिवार्ड) अलग अलग राह अपनाते हैं । बहिर्मुखी व्यक्तित्व
में यह राह बहुत छोटी है, यह दृष्टि, श्रवण, स्वाद आदि जैसे उद्दीपन की रह अपनाता
है । जबकि अंतर्मुखी व्यक्तित्व इसे एक
लम्बे और उलझे हुए रास्ता पर घुमाता है । यहाँ इसे याददास्त, योजना बनाने वाले और
मुश्किलों को सुलझाने वाले हिस्से से हो कर गुजरना पड़ता है । 2012 में हारवार्ड विश्विद्यालय
के रैंडी बकनर (Randy Buckner) के शोध ने इस गुत्थी को थोड़ा और आसान किया । इस
शोध के अनुसार अंतर्मुखी व्यक्तित्व के दिमाग के प्री - फ्रंटल (pre frontal) भाग
में ग्रे मैटर (grey matter) कुछ अधिक मात्रा में पाया जाता है । मस्तिष्क का यह
भाग सोचने समझने, निर्णय लेने की क्षमता से जुडा है । बहिर्मुखी व्यक्ति में यहाँ
ग्रे मैटर थोड़ा कम होता है यानी निर्णय लेने में अधिक समय जाया नहीं होता, वो उस
क्षण में जी लेते हैं । जबकि अंतर्मुखी सोचते रहते हैं । इसीलिये शायद अंतर्मुखी
व्यक्तित्व हमारे लिए पहेली बना रहता है ।
अनुपमा झा