Friday, 24 April 2015

Earth Day



पिछले दो दिनों से दिल्ली विश्विद्यालय के मौरिस नगर में अवस्थित एम सी डी विद्यालय के बच्चे कॉलनी की सडकों पर धरती “हमारी माता है, इसे स्वच्छ, स्वस्थ रखना हमारी जिम्मेदारी है.” आदि जैसे नारे लगाते चक्कर काट रहे हैं. दो दिनों से सुबह सुबह विद्यालय की प्रार्थना सभा में कोई न कोई शिक्षिका उन्हें बिजली बचाने, कक्षा और विद्यालय को साफ़ रखने की नसीहतें देतीं नजर आतीं हैं. आज की प्रार्थना सभा इन बच्चों को; जो या तो पैदल या बस या फिर साझा कैब से विद्यालय आते हैं को नसीहत दी गई कि हमें कार आदि जैसे वाहन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, बच्चे कॉलनी में यह नारा लगाते घूम गए, “ कार छोडो सायकिल चलाओ”. यह नारा लगाते बच्चे आपस में ठिठोली करते भी नजर आ रहे थे, शायद उन्हें भी बहुत अजीब सा लग रहा था यह नारा लगाना. हर साल अप्रैल के महीने में इस विद्यालय के शिक्षिक/शिक्षिका/प्राचार्या जाग्रत होतीं हैं, 22 अप्रैल यानी ‘अर्थ डे’ साल में एक ही दिन आता है, इस दिन को चुना गया था धरती, पर्यावरण और धरती की शांती को बनाए रखने की बात और कुछ प्रयास करने के लिए, फिर विद्यालय भी बच्चों को इस दिशा में उनकी जिम्मेदारियों को इस दिन निभा डालते हैं.
विद्यालय ही नहीं बड़ी बड़ी संस्थाएं, विद्वान आदि भी इस दिन अपनी हर तरह की जिम्मेदारियों की बात करते हैं, नियम भी बनाते हैं.  इन वार्ताओं, बैठक आदि में हमें इन विपदाओं के कारण और उनसे निजात पाने के तरीके आदि बताये जाते हैं. इन कार्यक्रम के खत्म होने के बाद इन कार्यक्रम के भागीदार अपनी ऐ सी गाड़ियों में सवार हो अपने ऐ सी कमरे की तरफ चल पड़ते हैं, अप्रैल का महीना काफी गर्म होता है. टी वी, अखबार, इन्टरनेट पर असामयिक आने वाली बारिश तूफ़ान और दूसरी प्राकृतिक विपदा आदि की खबरे सुनते हैं और फिर से चिंचित हो वार्ता में डूब जाते हैं.    

Tuesday, 21 April 2015

रिकार्डेड आवाज बदली क्यों




हमारी रिकार्डेड आवाज नहीं लगती हमें अच्छी पर वही तो है सच्ची 


“नहीं सुनना हमें अपनी रिकार्डेड आवाज/मुझे अपनी रिकार्डेड आवाज बहुत गंदी लगती है. कारण हमारी आवाज  में एक गहराई  है, गंभीरता  है, इस रिकार्डेड आवाज में वह सब नहीं है, बिलकुल अलग है यह. तुम्हारी आवाज के साथ तो ऐसा नहीं होता है उसका स्वभाव तो नहीं बदलता.” हम सब इस खीज से गुजरते हैं, बहुत अटपटी और अनजानी लगती है अपनी रिकार्डेड आवाज. कितना भी अच्छा रिकार्डर क्यों न हो स्वभाव बदल ही जाता है. 

ऐसा आखिरकार होता क्यों है, वजह तो तलाश करनी ही पड़ेगी. ध्वनि कम्पन से पैदा होती है, यह तो हम बचपन से सुनते आ रहे हैं.  आवाज वह हमारी हो या किसी वास्तु से पैदा हो हवा के कणों में कम्पन पैदा करती है, परिणामस्वरूप ध्वनि तरंग पैदा होती हैं यह तरंग हवा से होती हुई हमारे बाहरी कान तक पहुंचती है फिर वहां से कान के परेड से टकराती है,. अब कान के परदे की कम्पन हमारे अन्दुरूनी कान के द्वारा ग्रहण की जाती है. यहाँ से इनका और स्नायु तंत्र का साथ शुरू होता है. स्नायु तंत्र के फैले हुए जाल के द्वारा इन्हें दिमाग तक पहुंचा दिया जाता है और फिर हमारी समझ में आता है कि आखिरकार यह आवाज क्या और कैसी है. लेकिन हमारी खुद की आवाज हमारे दिमाग तक दो रास्तों से होकर पहूँचती है. बाहरी दुनिया के संपर्क में  आने के बाद आम रास्ता तय करती है यानी तरंग के रूप में बाहरी कान से, कान के परदे तक फिर स्नायुतंत्र द्वारा दिमाग तक साथ ही यह आवाज अन्दर ही अन्दर एक दूसरे रास्ते से भी दिमाग तक पहुंचती है. हमारी खोपड़ी की हड्डियों से टकरा कर यह तरंग स्नायुतंत्र का सहारा ले कर दिमाग तक पहुंच जाती है. दो रास्ते तय किये जाते हैं इन तरंग के द्वारा इसलिए जब ये मिलती हैं तो इनका स्वभाव भी बदल जाता है और यह अधिक गहरी और गंभीर लगने लगती हैं. हमारी रिकार्डेड आवाज बस एक रास्ता ही तय कर हमारे दिमाग तक पहुंचती है, इसलिए अपनी आवाज में हम यह अंतर पाते हैं. तो हमारी रिकार्डेड आवाज ही वह है जो अन्य लोंगों तक पहुंचती है, यानी हमारी पहचान, इसलिए इसे नापसंद कर हम इसे नकार नहीं सकते.

Monday, 20 April 2015

रासायनिक बंधन: मनुष्य और कुत्तों के बीच



रासायनिक बंधन: मनुष्य और कुत्तों के बीच

बहुत बार देखा है पालतू कुत्ते यहाँ तक की गली में घूमने वाले कुत्ते भी अपने दो पैरों को समेट कर बैठ जाते हैं और फिर सामने बैठे अपने मालिक या जानने वालों को घूरते रहते हैं. पर कभी सोचा नहीं की आखिरकार इसके पीछे कुछ कारण भी हो सकता है. ये हमारे काफी करीब पाए जाने वाले जानवर गीदड़ (जिनसे आज भी हमारी प्रजाति थोड़ा परहेज ही रखती है) जाति के ही हैं. जी हाँ कुछ गीदड़ हमारे करीब आये उनके स्वभाव और शारीरिक बदलाव में भी थोड़ा बहुत बदलाव आया और बन गए हमारे साथी. यह सोचने की जरूरत तो है हमें डराने वाले जानवर हमारे इतने करीबी और प्यार बाटने वाले कैसे बन गए. 
जापान के अजाबू विश्विद्यालय  के मिहो नागासावा के पास इसका जबाब है. कुत्तों और हमारे बीच बने सम्बन्ध, प्यार मोहब्बत के लिए कुछ रसायन को हम जिम्मेदार ठहरा सकते हैं. आक्सीटोसिन नामक हारमोन जिसका स्त्राव स्तनधारियों में होता और इसे हम सामाजिक सम्बन्ध  स्थापित करने के लिए आवश्यक रसायन के रूप में जानते हैं. कुत्तों के घूरने के कारण उसके मालिक में इसी आक्सीटोसिन का स्त्राव होने लगता है और उनके अपने पालतू के प्रति  प्रेम छलक छलक कर बाहर आता है. यही प्रक्रिया इन प्यारे प्यारे पालतू में ही होती है, मालिक की प्यार भरी नजर उनके अन्दर भी इस रसायन के स्त्राव को बढाती है और फिर उनकी तरफ से भी शुरू होता है प्यार का इजहार. इवान मैकलियन लिखते हैं एक दूसरे को घूरने के प्रक्रिया से हम और हमारे पालतू एक दूसरे का दिल जीत लेते हैं यह रसायनिक गठबंधन हमें करीब ले आता है. 
नागासावा ने 25 कुत्तों के साथ एक शोध किया था. उन्होंने इन कुत्तों और उनके मालिकों को एक दूसरे को घूरने छोड़ दिया था, कुछ घंटों बाद उन्होंने दोंनों के पेशाब के सैम्पल इकठ्ठा किया और इसकी जांच की, साथ ही उनके व्यवहार को भी नोट किया. उनहोंने  पाया कि जिन मालिकों को उनके कुत्तों ने ज्यादा देर तक घूरा वह अपने पालतू के साथ अधिक देर तक प्यार जताते रहे. साथ ही सभी के पेशाब के सैम्पल में आक्सीटोसिन की बढी हुई मात्रा मिली.