हमारी रिकार्डेड आवाज नहीं लगती हमें अच्छी पर वही तो है सच्ची
“नहीं सुनना हमें अपनी
रिकार्डेड आवाज/मुझे अपनी रिकार्डेड आवाज बहुत गंदी लगती है. कारण हमारी आवाज में एक गहराई
है, गंभीरता है, इस रिकार्डेड आवाज
में वह सब नहीं है, बिलकुल अलग है यह. तुम्हारी आवाज के साथ तो ऐसा नहीं होता है
उसका स्वभाव तो नहीं बदलता.” हम सब इस खीज से गुजरते हैं, बहुत अटपटी और अनजानी
लगती है अपनी रिकार्डेड आवाज. कितना भी अच्छा रिकार्डर क्यों न हो स्वभाव बदल ही
जाता है.
ऐसा आखिरकार होता क्यों है,
वजह तो तलाश करनी ही पड़ेगी. ध्वनि कम्पन से पैदा होती है, यह तो हम बचपन से सुनते
आ रहे हैं. आवाज वह हमारी हो या किसी
वास्तु से पैदा हो हवा के कणों में कम्पन पैदा करती है, परिणामस्वरूप ध्वनि तरंग
पैदा होती हैं यह तरंग हवा से होती हुई हमारे बाहरी कान तक पहुंचती है फिर वहां से
कान के परेड से टकराती है,. अब कान के परदे की कम्पन हमारे अन्दुरूनी कान के
द्वारा ग्रहण की जाती है. यहाँ से इनका और स्नायु तंत्र का साथ शुरू होता है.
स्नायु तंत्र के फैले हुए जाल के द्वारा इन्हें दिमाग तक पहुंचा दिया जाता है और
फिर हमारी समझ में आता है कि आखिरकार यह आवाज क्या और कैसी है. लेकिन हमारी खुद की
आवाज हमारे दिमाग तक दो रास्तों से होकर पहूँचती है. बाहरी दुनिया के संपर्क में आने के बाद आम रास्ता तय करती है यानी तरंग के
रूप में बाहरी कान से, कान के परदे तक फिर स्नायुतंत्र द्वारा दिमाग तक साथ ही यह
आवाज अन्दर ही अन्दर एक दूसरे रास्ते से भी दिमाग तक पहुंचती है. हमारी खोपड़ी की
हड्डियों से टकरा कर यह तरंग स्नायुतंत्र का सहारा ले कर दिमाग तक पहुंच जाती है.
दो रास्ते तय किये जाते हैं इन तरंग के द्वारा इसलिए जब ये मिलती हैं तो इनका
स्वभाव भी बदल जाता है और यह अधिक गहरी और गंभीर लगने लगती हैं. हमारी रिकार्डेड
आवाज बस एक रास्ता ही तय कर हमारे दिमाग तक पहुंचती है, इसलिए अपनी आवाज में हम यह
अंतर पाते हैं. तो हमारी रिकार्डेड आवाज ही वह है जो अन्य लोंगों तक पहुंचती है,
यानी हमारी पहचान, इसलिए इसे नापसंद कर हम इसे नकार नहीं सकते.
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