शिक्षक दिवस के अवसर पर
5 सितम्बर बस आ चला है. 5 सितम्बर यानी शिक्षक
दिवस. 80 के दशक तक या 90 दशक के शुरूआती दौर में इस दिन हर बच्चा और शिक्षक एक
छोटा सा झंडा अपने शर्ट या कुरते पर लगाए
नजर आते थे. इस झंडे के बदले उनसे एक छोटी सी राशि 50 पैसे, या 1-2 रूपये लिया
जाता था. जमा की गयी यह राशि जरूरत मंद शिक्षकों के लिए होती थी.
उन दिनों बच्चे
प्रार्थना सभा में इस दिन के महत्व की बात करते थे, शिक्षकों को अपनी इच्छा अनुसार
छोटा-मोटा तोहफा देते थे और मेरे जैसे बच्चे यह तय करते थे आज शिक्षक/शिक्षिका की
सारी बात सुनेंगे, किसी बात से न हम दुखी होंगे न ही उन्हें दुखी करेंगे (हाँ उन
दिनों भी बच्चों को टीचर्स की बहुत बात नागवार गुजरती थी).
फिर तरीका बदला. अब उस दिन बच्चे शिक्षक के
रोल में रहते है उस दिन, फिर अपने शिक्षकों के लिए छोटी सी पार्टी का इंतजाम करते
हैं. कहीं कहीं स्कूल प्रबंधन भी टीचर्स के लिए कुछ ख़ास करता है.
इन दोनों तरीको में सर्वपल्ली राधा कृष्णन
शिक्षा के प्रति उनका नजरिया गौण होता नजर आता था. पर आज भी अलग अलग स्रोत
द्वारा बच्चे अपने शिक्षक/शिक्षिका को याद करते नजर तो आते ही हैं.
ऐसे एक बात जरूर ध्यान
में आती है, हमारे शिक्षकों से या बतौर
शिक्षक हमने यही सीखा था कि अगर हमें अपनी
बात लोंगों को पहुँचानी है तो हमारी पहली कोशिश होनी चाहिए खुद को इस लायक बनाना
कि लोगों को हमारी बातें सुनने लायक लगें. बच्चों या किसी भी समुदाय पर सख्ती कर
उन्हें बात सुनाने का कोई तुक नहीं होता. अगर बच्चा कक्षा में चल रही गतिविधियों
में खुद को जोड़ नहीं पा रहा तो वह निरर्थक हो जाती है, फिर आज हमारी शिक्षा
व्यवस्था बच्चों के चुनाव और उनके द्वारा की गयी पहल को अहमियत देता है. ठीक ऐसे
समय में सी बी एस सी जैसी उच्च शिक्षा
संस्थान और दिल्ली के शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालयों को यह दिशा निर्देश दिया
जाता है कि 5 सितम्बर 2014 को प्रधान-
मंत्री द्वारा बच्चों को संबोधन को स्कूल के कक्षा I – XII तक के हर विद्यार्थी तक पहुंचाने की व्यवस्था
हो. इसके लिए विद्यालय के निश्चित कार्यक्रम में बदलाव लाया जाय और बच्चों को
निश्चित स्कूल समय के बाद भी स्कूल में रोका जाए. यहाँ तक की समुचित सामान
(टी.वी., सेट आफ बाक्स आदि) की व्यवस्था के लिए एक बड़ी राशि भी विद्यालय को
मिलेगी. (क्या विद्यालय में होने वाली गतिविधियों के लिए इस तरह की राशि प्रदान की
जाती है). है, न ये हैरत करने वाली बात? इसका परिणाम होगा स्कूल में एटेंडेंस के
लिए बच्चों पर किसी न किसी तरह का दबाब डाला जाएगा. शिक्षकों और बच्चों के लिए यह
ख़ास दिन ख़ास नहीं रह पायेगा. बच्चों के मन में हो सकता है शिक्षकों की एक
नकारात्मक छवि भी बन सकती है. क्या हमारी शिक्षा संस्थाओं ने यह देखना बंद कर दिया
है कि हमारे लिए क्या सही है ?