Sunday, 31 August 2014

शिक्षक दिवस के अवसर पर



शिक्षक दिवस के अवसर पर
 5 सितम्बर बस आ चला है. 5 सितम्बर यानी शिक्षक दिवस. 80 के दशक तक या 90 दशक के शुरूआती दौर में इस दिन हर बच्चा और शिक्षक एक छोटा  सा झंडा अपने शर्ट या कुरते पर लगाए नजर आते थे. इस झंडे के बदले उनसे एक छोटी सी राशि 50 पैसे, या 1-2 रूपये लिया जाता था. जमा की गयी यह राशि जरूरत मंद शिक्षकों के लिए होती थी. 

उन दिनों बच्चे प्रार्थना सभा में इस दिन के महत्व की बात करते थे, शिक्षकों को अपनी इच्छा अनुसार छोटा-मोटा तोहफा देते थे और मेरे जैसे बच्चे यह तय करते थे आज शिक्षक/शिक्षिका की सारी बात सुनेंगे, किसी बात से न हम दुखी होंगे न ही उन्हें दुखी करेंगे (हाँ उन दिनों भी बच्चों को टीचर्स की बहुत बात नागवार गुजरती थी). 

   फिर तरीका बदला. अब उस दिन बच्चे शिक्षक के रोल में रहते है उस दिन, फिर अपने शिक्षकों के लिए छोटी सी पार्टी का इंतजाम करते हैं. कहीं कहीं स्कूल प्रबंधन भी टीचर्स के लिए कुछ ख़ास करता है. 

     इन दोनों तरीको में सर्वपल्ली राधा कृष्णन शिक्षा के प्रति उनका नजरिया गौण होता  नजर आता था. पर आज भी अलग अलग स्रोत द्वारा बच्चे अपने शिक्षक/शिक्षिका को याद करते  नजर तो आते ही हैं. 

ऐसे एक बात जरूर ध्यान में आती है,  हमारे शिक्षकों से या बतौर शिक्षक हमने यही  सीखा था कि अगर हमें अपनी बात लोंगों को पहुँचानी है तो हमारी पहली कोशिश होनी चाहिए खुद को इस लायक बनाना कि लोगों को हमारी बातें सुनने लायक लगें. बच्चों या किसी भी समुदाय पर सख्ती कर उन्हें बात सुनाने का कोई तुक नहीं होता. अगर बच्चा कक्षा में चल रही गतिविधियों में खुद को जोड़ नहीं पा रहा तो वह निरर्थक हो जाती है, फिर आज हमारी शिक्षा व्यवस्था बच्चों के चुनाव और उनके द्वारा की गयी पहल को अहमियत देता है. ठीक ऐसे समय में  सी बी एस सी जैसी उच्च शिक्षा संस्थान और दिल्ली के शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालयों को यह दिशा निर्देश दिया जाता है कि 5 सितम्बर 2014 को  प्रधान- मंत्री द्वारा बच्चों को संबोधन को स्कूल के कक्षा I – XII  तक के हर विद्यार्थी तक पहुंचाने की व्यवस्था हो. इसके लिए विद्यालय के निश्चित कार्यक्रम में बदलाव लाया जाय और बच्चों को निश्चित स्कूल समय के बाद भी स्कूल में रोका जाए. यहाँ तक की समुचित सामान (टी.वी., सेट आफ बाक्स आदि) की व्यवस्था के लिए एक बड़ी राशि भी विद्यालय को मिलेगी. (क्या विद्यालय में होने वाली गतिविधियों के लिए इस तरह की राशि प्रदान की जाती है).  है, न ये हैरत करने वाली बात? इसका परिणाम होगा स्कूल में एटेंडेंस के लिए बच्चों पर किसी न किसी तरह का दबाब डाला जाएगा. शिक्षकों और बच्चों के लिए यह ख़ास दिन ख़ास नहीं रह पायेगा. बच्चों के मन में हो सकता है शिक्षकों की एक नकारात्मक छवि भी बन सकती है. क्या हमारी शिक्षा संस्थाओं ने यह देखना बंद कर दिया है कि हमारे लिए क्या सही है ?

Saturday, 30 August 2014

सहज होने दो



आओ सहज हो जाएँ 

अखबार,  टी वी, पत्रिकाए, पार्क, ड्राइंगरूम यहाँ तक की बेडरूम में भी लव-जेहाद जैसी घटनाओं और  हिन्दू,  मुस्लिम, क्रिस्चियन, दलित  इन सब बीच के अंतर और पनप रही या पनपा देने वाली हिंसा और घृणा की ही चर्चा होती रहती है. लेकिन ये सारी चर्चाएँ कुछ ठीक करती नजर नहीं आतीं. हम सब के बीच की दूरियां हमारे शिक्षित होने के साथ शायद और भी बढ़ती जा रहीं है. आखिर क्या है जो इसे कम कर पायेगा, ये दलीलें, संवाद तो उस समूह के लिए हैं जिसके पास अपने विचार को सुदृढ़ करने के लिए अपनी दलीलें हैं.

ऐसे में कभी कभी सोचती हूँ मेरे कुछ लोग तो हैं जो इन सब मुद्दों में शिरकत नहीं करते, न ही उस तरह का कोई राजनीतिक ओरिएंटेशन है फिर भी हमें ये अलग अलग जाति, वर्ग के लोग अलग क्यों नहीं लगते. जबकि ऐसा माना जाता है, न अगर आपकी राजनैतिक समझ नहीं है तो आप इस दूरी को बनाए रखेंगे.

      मुझे अपना बचपन याद है, जब हम तीनों भाई- बहन हर बच्चे की तरह शायद इस अंतर को न तो जानते थे और न ही मानते थे. बाबूजी के दोस्तों और स्टूडेंट्स में शुक्ल चाचा या रेहान चाचा, किश्वर बाजी हो या रेनू दीदी हमें कभी फर्क न लगा, न ही उनके व्यवहार में न ही हमारे घर के वातावरण में. भाइयों के दोस्तों में जैसे कृष्ण मोहन भैया वैसे ही अच्छे मियाँ (बड़ा भाई किसी को अन्दर नहीं लाता), वहीं छोटे भैया के दोस्त राजू हो या फारुक घर में आ कर खाए पिए बिना जायेंगे नहीं. मेरी दोस्तों में सुधा हो या अंजुम किसी को भी आने से मनाही नहीं थी. स्कूल में भी नरगिस, फातिमा, कैसर पुष्पा,अनुपमा सब साथ गोल गप्पे और झाल मुढी खाते थे और आपस में गुट बंदी भी करते पर गुट बनाने में सिर्फ एक चीज का ध्यान रखा जाता था, कौन एक जैसी गतिविधियों में साथ रहता है. घर पर हरिचरन (कुम्हार) की नानी या राधिका की माँ (सुनार) (ये दोनों मेरे घर में काम करती थीं) के चाय पीने के लिए अलग प्याली नहीं होती थी. अम्मी को किसी काम करने वाली से कही हिकारत वाले शब्दों में बात करते नहीं सुना. हमें हरिचरन, सुधा किसी के साथ खेलने से न तो रोका गया न ही यह बताया गया कि उनके गरीब या दूसरी जाति, वर्ग के होने के कारण उनसे हमें भेद भाव नहीं करना चाहिए. इसलिए शायद हम जैसों के नजरिये में वह अंतर पनप  ही नहीं सका, बहुत सहज रहे हम. हमारे अपनी माँ को अम्मी बुलाने के पीछे 'मुस्लिम-समुदाय का कोई असर नहीं था बल्कि माँ और मम्मी शब्द के बीच का संबोधन था वह

आज भी बस एक ही ख्याल आता क्या हम सीख सकते हैं इस सहजता से जीना जहां सजग होने के नाते हम भेद भाव नही करने का दावा करते न पाए जाएँ, बल्कि भेद भाव करना चाहिए या नहीं इसके बारे में हमने कभी सोचा ही न हो.