Saturday, 30 August 2014

सहज होने दो



आओ सहज हो जाएँ 

अखबार,  टी वी, पत्रिकाए, पार्क, ड्राइंगरूम यहाँ तक की बेडरूम में भी लव-जेहाद जैसी घटनाओं और  हिन्दू,  मुस्लिम, क्रिस्चियन, दलित  इन सब बीच के अंतर और पनप रही या पनपा देने वाली हिंसा और घृणा की ही चर्चा होती रहती है. लेकिन ये सारी चर्चाएँ कुछ ठीक करती नजर नहीं आतीं. हम सब के बीच की दूरियां हमारे शिक्षित होने के साथ शायद और भी बढ़ती जा रहीं है. आखिर क्या है जो इसे कम कर पायेगा, ये दलीलें, संवाद तो उस समूह के लिए हैं जिसके पास अपने विचार को सुदृढ़ करने के लिए अपनी दलीलें हैं.

ऐसे में कभी कभी सोचती हूँ मेरे कुछ लोग तो हैं जो इन सब मुद्दों में शिरकत नहीं करते, न ही उस तरह का कोई राजनीतिक ओरिएंटेशन है फिर भी हमें ये अलग अलग जाति, वर्ग के लोग अलग क्यों नहीं लगते. जबकि ऐसा माना जाता है, न अगर आपकी राजनैतिक समझ नहीं है तो आप इस दूरी को बनाए रखेंगे.

      मुझे अपना बचपन याद है, जब हम तीनों भाई- बहन हर बच्चे की तरह शायद इस अंतर को न तो जानते थे और न ही मानते थे. बाबूजी के दोस्तों और स्टूडेंट्स में शुक्ल चाचा या रेहान चाचा, किश्वर बाजी हो या रेनू दीदी हमें कभी फर्क न लगा, न ही उनके व्यवहार में न ही हमारे घर के वातावरण में. भाइयों के दोस्तों में जैसे कृष्ण मोहन भैया वैसे ही अच्छे मियाँ (बड़ा भाई किसी को अन्दर नहीं लाता), वहीं छोटे भैया के दोस्त राजू हो या फारुक घर में आ कर खाए पिए बिना जायेंगे नहीं. मेरी दोस्तों में सुधा हो या अंजुम किसी को भी आने से मनाही नहीं थी. स्कूल में भी नरगिस, फातिमा, कैसर पुष्पा,अनुपमा सब साथ गोल गप्पे और झाल मुढी खाते थे और आपस में गुट बंदी भी करते पर गुट बनाने में सिर्फ एक चीज का ध्यान रखा जाता था, कौन एक जैसी गतिविधियों में साथ रहता है. घर पर हरिचरन (कुम्हार) की नानी या राधिका की माँ (सुनार) (ये दोनों मेरे घर में काम करती थीं) के चाय पीने के लिए अलग प्याली नहीं होती थी. अम्मी को किसी काम करने वाली से कही हिकारत वाले शब्दों में बात करते नहीं सुना. हमें हरिचरन, सुधा किसी के साथ खेलने से न तो रोका गया न ही यह बताया गया कि उनके गरीब या दूसरी जाति, वर्ग के होने के कारण उनसे हमें भेद भाव नहीं करना चाहिए. इसलिए शायद हम जैसों के नजरिये में वह अंतर पनप  ही नहीं सका, बहुत सहज रहे हम. हमारे अपनी माँ को अम्मी बुलाने के पीछे 'मुस्लिम-समुदाय का कोई असर नहीं था बल्कि माँ और मम्मी शब्द के बीच का संबोधन था वह

आज भी बस एक ही ख्याल आता क्या हम सीख सकते हैं इस सहजता से जीना जहां सजग होने के नाते हम भेद भाव नही करने का दावा करते न पाए जाएँ, बल्कि भेद भाव करना चाहिए या नहीं इसके बारे में हमने कभी सोचा ही न हो. 

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