Friday, 15 January 2016

मकर संक्रांति



आज मकर-संक्रान्ती है. आम तौर पर 14 जनवरी इस पर्व की तय तिथी है, कभी कभी 15 जनवरी को भी हम इस पर्व को मनाते हैं. सीवान में हम इस पर्व को खिचडी कहते थे. मुझे याद है जनवरी की ठंढी रात में जब अम्मी हरिचरन की नानी के साथ मिलाकर तिल, चावल गुड आदि के लड्डू बांधा करती थी. रसोईघर में चूल्हे की आंच पर उबलता हुआ गुड, कडाही में गुड के बुल-बुले और गर्म गर्म गुड की चासनी को चावल या तिल के भूंजे में डाल कर उस गर्म गर्म मिश्रण से लड्डू तैयार होते थे. गर्म गर्म लादू को जल्दी जल्दी ठंढा भी करना होता था ताकि गुड चावल या तिल के दानों को अपने पाश में जकड ले. इसलिए दगरे में उन लड्डूओं को डाल कर हिलाया जाता था. यह काम मुझे मिलता था कभी कभी उतने ठंढ में भी उन्हें पंखे की मदद से ठंढा किया जाता था. गुड की चासनी के मिजाज को भी बहुत हिसाब से तैयार किया जाता था. एक ख़ास गाढापन चाहिए गुड की चासनी में. अगर चासनी पतली तो गयी तो रोते रह जाओगे लड्डू नहीं बंधने वाला. अगर चासीन का मिजाज थोड़ा अधिक गाढा हो गया तो  दूसरी मुसीबत तोड़ते रह जाओगे दांतों से लड्डू टूटेंगे नहीं. इसलिए हमेशा एक दक्ष हाथ की जरूरत होती थी. हमारे यहाँ हरिचन की नानी थी वह दक्ष हाथ.
इस तरह तैयारी शुरू होती थी इस पर्व की. हांलाकि तैयारी का यह अंतिम चरण होता था. इस पर्व की तैयारी दो-तीन पहले से ही शुरू होती थी. काला या सफ़ेद तिल की खरीददारी से. काला टिल साफ़ करना भी एक बड़ा टास्क हुआ करता था. मुझे याद है काले तिल से चुन चुन कर गंदगियों को अलग करना कितना कठिन होता था. फिर ढेर सारे पानी में टिल को धोना, बोरा पर रगड़ रगड कर उसके रुखडे छल को इन महीन दानों के शरीर से अलग करना, फिर पानी की मदद से इन छाल को विदा करना. इस तरह साफ़ किये गए तिल सुखा कर इस्तेमाल के लिए तैयार करना. तिल को मान घर में भुन लेती थी. भूनते समय भी इसके कुरकुरेपन का ध्यान रखना होता था.  तैयारी का दूसरा चरण होता था दूध वाले को अधिक दूध मुहैया करने की ताकीद. वह तागीद कभी गुजारिश होती थी तो कभी धमकी. इस उपलक्ष्य पर दूध वाले पानी का उपयोग दिल खोल कर किया करते थे. उनका कहना भी तर्क संगत था, प्रकृति ने ऐसी कोइ व्यवस्था नहीं की है जिससे संक्रांति के अवसर पर गाय या भैस दूध की मात्रा बढा सकती. खैर दूध का इंतजाम होने के बाद दूध को दही में बदलने की जद्दोजेहद शुरू होती थी. उतना ठंढा मौसम दही बनाने की कोशिश कठिनाइयों से भरी होती थी. न जाने कितने ओढ़ने बिझौने की जरूरत होती थी. जितना अच्छा दही होगा पर्व का मजा उतना ही बढेगा, इसलिए दही के रंग रूप और स्वाद को जायकेदार बनाने की पूरी कोशिश होती थी. तीसरे पादान पर होता है चावल, चूड़े और तिल के लड्डू को तैयार करने का आयोजन. आयोजन ही होता था. कितनी महिलायें एक साथ जमा होती थी, हर की अपनी रेसिपी और अपने लॉजिक होते थे खस्ता और मजेदार लड्डू तैयार करने का.
14/15 की ठंढ की कंपकपाती सुबह. लेकिन आज से सूर्य उत्तरायण हो रहे हैं इसलिए नहाना तो पड़ेगा ही. नहा धो कर तरह तरह के लड्डू का नास्ता और फिर दही-चूडा का भोजन. फिर कांपते हुए भाग कर धुप की तलाश में जाना. बस एक चीज अच्छी थी की दिन भर सिर्फ चाय बनाने के लिए रसोई में जाना पड़ता था. आहा एक दिन तो माँ को फुर्सत मिली.
शाम को मूंगफली फोड़ना और फिर रात में गोभी, मटर डाल कर गर्म गर्म खिचडी. भाप छोड़ती खिचडी को थाल में देख आकर ही ‘खिचडी-पर्व’ का असल मजा समझ में आता था. यह था हमारे बचपन का मकर संक्रांत.
अब इस पर्व के पहले चरण की तैयारी शुरू होते है whatsApp के मैसेज से हैप्पी लोहरी, मकरसंक्रांति, पोंगल की शुभकामनाओं in advance के साथ.  तिल, गुड, चूडा और चावल के लड्डू की वह खुशबू तो नहीं मिलती परन्तु तिल गुड से बने डिजाइनदार डाल, टोकरी, सूप और न जाने क्या क्या नजर आते हैं. अब न तो बोरा है जिसपर तिल को रगडा जाए और न ही आँगन की धूप जहां तिल सूखेगा. न ही हरिचरन की नानी है और न ही गुड की सही पाक तैयार करने का दंभ. अब तो बाजार में एक से एक मिठाई मिलती है तिल और खोवे से बनी मिठाई, रेवड़ी, तरह तरह के तिलकुट, चूडा, मूंगफली, मक्के के दाने और गुड के बने लड्डू और न जाने क्या क्या.
14 जनवरी का यह दिन एक ऐसा दिन है जिस दिन को हमारे देश के सभी प्रात अपने अपने तरीके से  ख़ास बनाते हैं. बिहारी के लिए यह खिचडी है उत्तर-प्रदेश के नागरिक इसे मकर-संक्राति के नाम से जानते हैं. तिलवा और पतंग का उड़ना इस दिन की शोभा है.
दिल्ली और हरयाणा आज के दिन चूरमा, हलवा, खीर के अलावा के साथ शुरू होता है. दिन को ख़ास बनाते हैं वह उपहार जो भाई अपनी बहन को देता और महिलायें अपने ससुराल के अपनों को देती है. आन्द्रा प्रदेश में यह पर्व चार दिन तक फैला होता है. यहाँ पर्व की शुरूआत होती है बेकार और पुरानी  चीजों को हटाने से. इन चीजं में कपडे, फर्नीचर से लेकर आदतें, बुरे सम्बन्ध तक होते हैं. फिर नए कपडे से लेकर नयी आदतों तक को धारण किया जाता है, नए संबंधों का सम्मान करते हैं और घरों को रंगोली से सजाते हैं. गुड और चावल के आतें से बना पकवान उस दिन का ख़ास होता है. तीसरे दिन जानवरों के लिए ख़ास होता है, लडकियां गाय को खिलाती हैं. चौथे दिन मिट्टी, पानी और धुप की पूजा होती है. रंग बिरंगे पतंगों से भरता है आसमान. रंगीन कपड़ों और मन के साथ उल्लास प्रकट करते लोगों से गलियाँ भर जाती हैं. गोवा और महाराष्ट्र की महिलायें दही-कुमकुम की मदद से इस दिन को ख़ास बनाती हैं. गुजरात के आकाश  में हल्के कागज और बांस की सहायता से बने पतंगों से भरा होता है. पंजाबियों की रेवड़ी-मूंगफली से भरी लोहरी और मकर के दिन बनी खिचडी और गुड का संगम वाकई आज के दिन उडाये जाने वाले रंगीन पतंग की तरह रंगीन और विविध तरीकों से मनाया आजाता है यह पर्व.


Monday, 11 January 2016

प्याज प्याज तुम कडवे क्यों हुए



प्याज की कडवाहट 

हमारी सब्जी की टोकरी में सजा प्याज हमेशा चर्चा में रहने के साथ अनेक कारणों से हमारी आँखों से आंसू भी निकालता रहता है. रोटी या सत्तू के साथ कच्चा प्याज खा कर अपना पेट और मन भरने वाला आर्थिक रूप से कमजोर तबका बाजार में इसकी बड़ी हुई कीमत के कारण आंसू बहाता है. रसोई में बन रहे पकवान के स्वाद में चार चाँद लगाने के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले प्याज को काटते समय आँखों से आंसू निकलते हैं. तो कभी सलाद में लिए गए कच्चे प्याज की गंध से आंसू बह जाते हैं. बेचारा प्याज अपने गुलाबी, लाल आवरण में छुपा घर, होटल हर जगह की रसोई का अभिन्न अंग है, लेकिन उसे हम याद करते हैं उसे काटते ही नाक तक पहुँचने वाले तेज गंध से या फिर आँखों से निकलते आंसू से. बेचारा प्याज सबको पसंद आता है, सबकी रसोई का आवश्यक अंग है लेकिन इसे याद करते हैं इसके बुरे गुणों के कारण. अपने इन गुणों का जिम्मेदार वह खुद नहीं होता है. उसके इस गुण का जिम्मेदार है उसकी परवरिश और उसके जीन (genes).
प्याज की फसल की खेती अधिकतर ऐसे जमीन में होती है जहां सल्फर नाम का खनिज पाया जाता है. अब पौधे तो मिट्टी से पानी और खनिज लेते ही हैं. प्याज भी मिट्टी से पानी और खनिज लेता है उसे भी बढ़ना है. मिट्टी में मौजूद सल्फर प्याज की कोशिकाओं में आकर इसके प्रोटीन का हिस्सा बन जाता है. यह तो जानी हुई बात है हमें जो मिलेगा उसी वस्तु की मदद से ही हम इमारत तैयार करेंगे. प्याज के मामले में इस प्रक्रिया को जरूरी भी माना जाता है. हमारे महारथी रसोईयों का कहना है सल्फर वाले प्रोटीन के निर्माण से इसके ख़ास स्वाद की शुरूआत होती है. सही वातावरण में यह रसायन अपने ख़ास अंदाज में हमें लुभाता है.
अपने ख़ास अंदाज का नुमाइस करने का मौक़ा इन्हें मिलता है जब इन्हें काटा जाता है. इनके ऊपर चाकू, दांत या किसी और तीखी चीज का प्रहार होते ही  इनकी कोशिकाएं फटती हैं. इन कोशिकाओं के फटते ही सल्फर युक्त प्रोटीन और एंजाइम एलिनेज़ (allinase) का मिलन होता है. यह एलिनेज़ भी कोशिकाओं के अन्दर छोटी छोटी थैलियाँ में मौजूद होता है. ये थैलियाँ चाकू लगने से फटती हैं. इन दोनों का मिलन पैदा करता है वह तीखी गंध जिसके कारण प्याज को हम दूर से पहचानते हैं. इस मिलन से पैदा हुई सल्फर युक्त गैस हमारे आँखों तक पहुँचती है और हमारे नाक, आँख की नमी चुरा कर बहुत कमजोर सल्फ्यूरिक अम्ल का निर्माण करती है. यह सल्फ्यूरिक अम्ल हमारी आँख और नाक में खुजली और पानी से भर देता है.
हमारा अनुभव कहता है की कुछ प्याज काफी तीखी गंध और आंसू देते हैं वहीं कुछ इस मामले में कमजोर होते हैं. यह सब परवरिश का मामला है. अगर इन्हें ऐसी मिट्टी मिली जिसमें सल्फर कम है तो यह आंसू भी कम देंगें, लेकिन अगर इन्हें भरपूर सल्फर प्रदान किया तो आंसू बहाने तैयार रहिये. प्याज काटते समय आंसू पोछने की कोशिश मत कीजिएगा क्योंकि आपके हाथ में भी प्याज का सल्फरयुक्त प्रोटीन कुण्डली जमा कर बैठ चुका है. हाँ अगर आप प्याज को काटने के पहले अपने रेफ्रीजरेटर की ठंढक का आनंद लेने देंगे तो वह आपको अधिक तंग नहीं करेगा. इसका कारण यह है की कम तापमान पर एंजाइम उतना क्रियाशील नहीं रह पाता. तेज पानी के धार से धुला प्याज भी थोड़ा रहम करता है.
खैर हमने वैज्ञानिकों की बात मान ली कि सल्फर बना देता है प्याज को तीखा. पर इसके तीखेपन और कड़वेपन की वजह इसका स्वार्थी स्वभाव है. हाँ यह मुझे तरबूजे से पता चला. चलिए आपको भी बताती हूँ.
काफी पहले की बात है तरबूजा और प्याज पड़ोसी थे. एक ही खेत में साथ साथ रहा करते थे. उन दिनों प्याज तरबूज जैसा बड़ा, मीठा और गोल मटोल था और तरबूज प्याज जैसा छोटा और स्वाद रहित. प्याज जमीन के ऊपर भी पाया जाता था. प्याज चुपचाप पड़े पड़े बोर हो रहा था. उसकी नजर बगल में उग रहे घास पर पडी. इस घास को अक्सर माली अपने खुरपी की मदद से अलग कर देता था लेकिन वह ढीठ की तरह फिर उग आता था. प्याज को उसका मजा लेने की सूझी. उसने पूछा तुम्हें माली बार बार दूर फेंक देता है फिर तुम वापस क्यों आ जाते हो, यह हिम्मत तुममें  आती कहाँ से है. घास ने हंस कर कहा यह विपरीत परिस्थियां मुझे हौसला देती है. जितनी बार माली मुझे अलग करता है उतनी बार मुझमें फिर से लहराने की हिम्मत आ जाती है, माली की यह कार्यवाही मुझे हौसला देती है. अच्छा बहुत हिम्मत है तुममें. प्याज ने मुंह बनाया
हाँ हम बहुत आराम से जमीन से पानी लेकर फल फूल सकते हैं. मुझे अपने लिए कुछ ख़ास नहीं चाहिए. थोड़ी सी जरूरत है मेरी जो बहुत खर्चीली नहीं है, इसलिए मैं आराम से खुद को बार बार हर विपरीत परिस्थिति में भी खडा कर लेता हूँ.
घास की बात सुनते सुनते प्याज की नजर घास के बच्चों पर पडी जिसकी देख भाल घास कर रही थी.
उन बच्चो को देख प्याज डर गया. यह तो हमारा सारा पानी, खाना चट कर जाएगा. इसे हटाना होगा नहीं तो हम भूखे रह जायेंगे. उसने तरबूजे से कहा “हमें इस घास और उसके बच्चों को हटाना होगा, खुरपी को आवाज दो.”
तरबूजे ने कहा, “अरे रहने दो. मिल बाँट कर रह लेंगे, क्यों परेशान हो रहे हो.”
प्याज ने उसकी बात नहीं सुनी उसने खुरपी को आवाज दे डाली. खुरपी ने घास को काट डाला. कटती हुई घास ने दर्द के साथ कहा, प्याज तूने जैसा कडवा काम किया है तू कडवा हो जाएगा. लोग तुझे तेरी अच्छाई से नहीं पहचानेंगे बल्कि तेरी कड़वाहट, बुरा स्वभाव तेरी पहचान बनेगा. तुझे पानी चाहिए न आज से धरती के नीचे ही रहना. और तरबूज अपनी अच्छी सोच के कारण तू मीठा, ठंढा और सुकून देने वाला बनेगा.”
उस दिन के बाद से प्याज छोटा और कडवा हो गया और साथ ही जमीन के नीचे धंस गया. जबकि तरबूज मीठा, बड़ा और सुकून देने वाला फल बन इठलाने लगा.
यह तो थी कहानी. पर तय कर लो प्याज के कडवे होने का कौन सा कारण आपको भाता है  प्याज को जमीन से मिले सल्फर की कडवाहट या फिर घास की बददुआ.


Saturday, 9 January 2016

फूलों की मुस्कान



फूलों की मुस्कान

आज सुबह सुबह बगीचे में लाल मुस्कुराते गुह्हल के फूल पर नजर पडी. उसे मुस्कुराता देख मेरे चहरे पर भी मुस्कराहट आ गयी. बगल में ही अपनी तीन पत्तियों और कांटे के साथ खिलखिलाता गुलाब खुशियाँ बिखेर रहा था. दीवाल के पास लगे कनेल के पौधे पर सजे पीले कनेल ने सुबह की लाली में अपने अपना पीलापन मिला जैसे सुबह को सुनहरा कर दिया था. जमीन पर बिछे हरश्रृंगार अपनी नाजुक मोहक अदाओं से मन को लुभा रहे थे. एक तरफ कतार में खड़े गुलहाजरा की गाढी हरी पत्तियों पर गुलाबी, बैंगनी फूलों की आभा हमारे आँखों को तृप्त कर रही थी. मुझे 9 O-clock के फूलों के खिलने का भी इन्तजार था जो बगीचे की जमीन को बैंगनी, गुलाबी रंगों से सजा देंगे. इन सब रंगों के साथ दरवाजे पर शंकू आकार के धतूरा अपनी सफ़ेद पंखुड़ियों खोले अपनी अहमियत बताने से नहीं चूकता. इनके विविध रंग और खिला खिला अंदाज  पूरे दिन इस बगीचे के माहौल  को खुशनुमा रखेगा यह सोच कर मैं बगीचे से बाहर आने लगी. इतने में एक पुकार ने मेरा ध्यान भंग किया. जल्दी से बगीचे से फूल तोड़ लो नहीं तो एक भी फूल पूजा करने के लिए नहीं मिलेगा. फिर मेरे देखते देखते बगीचे की रंगीनी और खुशनुमा माहौल जैसे अलोपित हो गया. अपने भगवान को खुश करने के लिए फूल तोड़ते हाथ हर फूल को अपनी डलिया में हर भगवान् के हिसाब से फूल को सजाते हुए अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे. महादेव के लिए सफ़ेद धतूरा, देवी दुर्गा और भगवती काली को लाल गुडहल भाएगा, दूर्बा विघ्नहर्ता को खुश करेगा प्रत्येक देवता के लिए एक ख़ास प्रकार का फूल है.  देखते देखते पौधों और टहनियों पर इथालाने वाले फूल पूजा की डलिया की शोभा बढाने लगे. डलिया सुन्दर हो गयी.  कुछ क्षण पहले बगीचे में बिखरे रंग और मुस्कराहट छोटी सी डलिया में सिमट गयी. बगीचे में अपने हरे-पीले, छोटे-बड़े, लम्बे-चौड़े लहराते पत्तों के साथ मुस्कुराने की कोशिश करते पौधे नजर आ रहे थे. एक क्षण में ही मुझे लगा जैसे मैं किसी दूसरे माहौल में आ गयी. एक ऐसी जगह जहां पहले जिन्दगी हंस रही थी वहां अभी जिन्दगी तो है पर उसमें रवानगी नहीं है, उम्मीद है तो भरोसा नहीं है.
खैर बगीचे से निकलने के बाद डलिया में सजे मुस्कुराते फूलों को देखना अच्छा तो लग रहा था. अब मेरी उत्सुकता फूलों से सजने के बाद हर देवी-देवता की खूबसूरती और प्रसन्नता को देखने की उत्सुकता मुझे फूलों से भरी डलिया के साथ मंदिर ले आई. यह एक छोटे शहर का छोटा मंदिर था जहां अपनी डाल से फूलों को अलग करने वाले हाथ ने बड़े करीने से उन फूलों को देवी देवता की मूर्तियों या फोटो के चरणों या सर पर अर्पित किया. कहीं गुच्छे में फूल रखे गए तो कहीं फूलों से पंखुड़ियों को अलग कर उन्हें बिखेर दिया. कुल मिला उन फूलों के रंग तो बाकी रह गए पर उन रंगों की मुस्कराहट नजर से ओझल हो गयी. परन्तु यह क्या यह रंग भी गायब हो गए. एक दूसरी डलिया आई. उस डलिया को भी ताजे फूल और पत्तियों से सजाया गया था. उस डलिया के लाने वाले हाथों ने मेरे बगीचे से आये फूल को समेट कर यूं किनारे कर दिया जैसे उनका कोई अस्तित्व ही नहीं. देखते देखते पाँच मिनट के अन्दर वह जीवन से भरे, आशा और खुशी के प्रतीक बेजान, उदास कचरे में बदल गए. मैं हर भगवान् की मूर्ती और फोटो को निहारते हुए यह जानने  की कोशिश कर रही थी की मेरे बगीचे के फूलों के चढ़ावे से आखिर उन्हें कितनी खुशी मिली. उन्हें खुश होना पडेगा उनकी पसंद के फूलों से उन्हें सजाया गया था. उन्हें प्रसन्न करने के लिए इन फूलों उस भूमिका से भी शायद वंचित किया गया था जिस काम के लिए प्रकृति ने इन्हें मनभावन रंग, गंध और रूप से सुसज्जित किया है.  अब मैं थोड़ी या सच कहूं तो पूरी तरह से असमंजस में थी कि प्रकृति का यह नियम कब बना जिसके तहत हम प्रकृति के इन खूबसूरत संतान को उसकी (प्रकृति) की जरूरत पूरी किये बिना ही प्रकृति के नाम पर ही उसके घर से अलग कर दिया जाता है. उनकी मुस्कराहट को बिखरने से पहले कुचल दिया जाता है. प्रकृति अपने ही खजाने को लुटा कैसे खुश हो सकती है?