आज मकर-संक्रान्ती है. आम तौर पर 14 जनवरी इस पर्व की तय तिथी है, कभी कभी 15 जनवरी
को भी हम इस पर्व को मनाते हैं. सीवान में हम इस पर्व को खिचडी कहते थे. मुझे याद
है जनवरी की ठंढी रात में जब अम्मी हरिचरन की नानी के साथ मिलाकर तिल, चावल गुड आदि
के लड्डू बांधा करती थी. रसोईघर में चूल्हे की आंच पर उबलता हुआ गुड, कडाही में
गुड के बुल-बुले और गर्म गर्म गुड की चासनी को चावल या तिल के भूंजे में डाल कर उस
गर्म गर्म मिश्रण से लड्डू तैयार होते थे. गर्म गर्म लादू को जल्दी जल्दी ठंढा भी
करना होता था ताकि गुड चावल या तिल के दानों को अपने पाश में जकड ले. इसलिए दगरे
में उन लड्डूओं को डाल कर हिलाया जाता था. यह काम मुझे मिलता था कभी कभी उतने ठंढ
में भी उन्हें पंखे की मदद से ठंढा किया जाता था. गुड की चासनी के मिजाज को भी
बहुत हिसाब से तैयार किया जाता था. एक ख़ास गाढापन चाहिए गुड की चासनी में. अगर
चासनी पतली तो गयी तो रोते रह जाओगे लड्डू नहीं बंधने वाला. अगर चासीन का मिजाज
थोड़ा अधिक गाढा हो गया तो दूसरी मुसीबत तोड़ते
रह जाओगे दांतों से लड्डू टूटेंगे नहीं. इसलिए हमेशा एक दक्ष हाथ की जरूरत होती
थी. हमारे यहाँ हरिचन की नानी थी वह दक्ष हाथ.
इस तरह तैयारी शुरू होती थी इस पर्व की. हांलाकि तैयारी का यह अंतिम चरण होता
था. इस पर्व की तैयारी दो-तीन पहले से ही शुरू होती थी. काला या सफ़ेद तिल की
खरीददारी से. काला टिल साफ़ करना भी एक बड़ा टास्क हुआ करता था. मुझे याद है काले
तिल से चुन चुन कर गंदगियों को अलग करना कितना कठिन होता था. फिर ढेर सारे पानी में
टिल को धोना, बोरा पर रगड़ रगड कर उसके रुखडे छल को इन महीन दानों के शरीर से अलग करना,
फिर पानी की मदद से इन छाल को विदा करना. इस तरह साफ़ किये गए तिल सुखा कर इस्तेमाल
के लिए तैयार करना. तिल को मान घर में भुन लेती थी. भूनते समय भी इसके कुरकुरेपन
का ध्यान रखना होता था. तैयारी का दूसरा
चरण होता था दूध वाले को अधिक दूध मुहैया करने की ताकीद. वह तागीद कभी गुजारिश
होती थी तो कभी धमकी. इस उपलक्ष्य पर दूध वाले पानी का उपयोग दिल खोल कर किया करते
थे. उनका कहना भी तर्क संगत था, प्रकृति ने ऐसी कोइ व्यवस्था नहीं की है जिससे संक्रांति
के अवसर पर गाय या भैस दूध की मात्रा बढा सकती. खैर दूध का इंतजाम होने के बाद दूध
को दही में बदलने की जद्दोजेहद शुरू होती थी. उतना ठंढा मौसम दही बनाने की कोशिश
कठिनाइयों से भरी होती थी. न जाने कितने ओढ़ने बिझौने की जरूरत होती थी. जितना
अच्छा दही होगा पर्व का मजा उतना ही बढेगा, इसलिए दही के रंग रूप और स्वाद को
जायकेदार बनाने की पूरी कोशिश होती थी. तीसरे पादान पर होता है चावल, चूड़े और तिल
के लड्डू को तैयार करने का आयोजन. आयोजन ही होता था. कितनी महिलायें एक साथ जमा
होती थी, हर की अपनी रेसिपी और अपने लॉजिक होते थे खस्ता और मजेदार लड्डू तैयार
करने का.
14/15 की ठंढ की कंपकपाती सुबह. लेकिन आज से सूर्य उत्तरायण हो रहे हैं इसलिए
नहाना तो पड़ेगा ही. नहा धो कर तरह तरह के लड्डू का नास्ता और फिर दही-चूडा का
भोजन. फिर कांपते हुए भाग कर धुप की तलाश में जाना. बस एक चीज अच्छी थी की दिन भर
सिर्फ चाय बनाने के लिए रसोई में जाना पड़ता था. आहा एक दिन तो माँ को फुर्सत मिली.
शाम को मूंगफली फोड़ना और फिर रात में गोभी, मटर डाल कर गर्म गर्म खिचडी. भाप
छोड़ती खिचडी को थाल में देख आकर ही ‘खिचडी-पर्व’ का असल मजा समझ में आता था. यह था
हमारे बचपन का मकर संक्रांत.
अब इस पर्व के पहले चरण की तैयारी शुरू होते है whatsApp के मैसेज से हैप्पी
लोहरी, मकरसंक्रांति, पोंगल की शुभकामनाओं in advance के साथ. तिल, गुड, चूडा और चावल के लड्डू की वह खुशबू तो
नहीं मिलती परन्तु तिल गुड से बने डिजाइनदार डाल, टोकरी, सूप और न जाने क्या क्या
नजर आते हैं. अब न तो बोरा है जिसपर तिल को रगडा जाए और न ही आँगन की धूप जहां तिल
सूखेगा. न ही हरिचरन की नानी है और न ही गुड की सही पाक तैयार करने का दंभ. अब तो
बाजार में एक से एक मिठाई मिलती है तिल और खोवे से बनी मिठाई, रेवड़ी, तरह तरह के
तिलकुट, चूडा, मूंगफली, मक्के के दाने और गुड के बने लड्डू और न जाने क्या क्या.
14 जनवरी का यह दिन एक ऐसा दिन है जिस दिन को हमारे देश के सभी प्रात अपने अपने
तरीके से ख़ास बनाते हैं. बिहारी के लिए यह
खिचडी है उत्तर-प्रदेश के नागरिक इसे मकर-संक्राति के नाम से जानते हैं. तिलवा और
पतंग का उड़ना इस दिन की शोभा है.
दिल्ली और हरयाणा आज के दिन चूरमा, हलवा, खीर के अलावा के साथ शुरू होता है.
दिन को ख़ास बनाते हैं वह उपहार जो भाई अपनी बहन को देता और महिलायें अपने ससुराल
के अपनों को देती है. आन्द्रा प्रदेश में यह पर्व चार दिन तक फैला होता है. यहाँ
पर्व की शुरूआत होती है बेकार और पुरानी
चीजों को हटाने से. इन चीजं में कपडे, फर्नीचर से लेकर आदतें, बुरे सम्बन्ध
तक होते हैं. फिर नए कपडे से लेकर नयी आदतों तक को धारण किया जाता है, नए संबंधों
का सम्मान करते हैं और घरों को रंगोली से सजाते हैं. गुड और चावल के आतें से बना
पकवान उस दिन का ख़ास होता है. तीसरे दिन जानवरों के लिए ख़ास होता है, लडकियां गाय
को खिलाती हैं. चौथे दिन मिट्टी, पानी और धुप की पूजा होती है. रंग बिरंगे पतंगों
से भरता है आसमान. रंगीन कपड़ों और मन के साथ उल्लास प्रकट करते लोगों से गलियाँ भर
जाती हैं. गोवा और महाराष्ट्र की महिलायें दही-कुमकुम की मदद से इस दिन को ख़ास
बनाती हैं. गुजरात के आकाश में हल्के कागज
और बांस की सहायता से बने पतंगों से भरा होता है. पंजाबियों की रेवड़ी-मूंगफली से
भरी लोहरी और मकर के दिन बनी खिचडी और गुड का संगम वाकई आज के दिन उडाये जाने वाले
रंगीन पतंग की तरह रंगीन और विविध तरीकों से मनाया आजाता है यह पर्व.