Saturday, 9 January 2016

फूलों की मुस्कान



फूलों की मुस्कान

आज सुबह सुबह बगीचे में लाल मुस्कुराते गुह्हल के फूल पर नजर पडी. उसे मुस्कुराता देख मेरे चहरे पर भी मुस्कराहट आ गयी. बगल में ही अपनी तीन पत्तियों और कांटे के साथ खिलखिलाता गुलाब खुशियाँ बिखेर रहा था. दीवाल के पास लगे कनेल के पौधे पर सजे पीले कनेल ने सुबह की लाली में अपने अपना पीलापन मिला जैसे सुबह को सुनहरा कर दिया था. जमीन पर बिछे हरश्रृंगार अपनी नाजुक मोहक अदाओं से मन को लुभा रहे थे. एक तरफ कतार में खड़े गुलहाजरा की गाढी हरी पत्तियों पर गुलाबी, बैंगनी फूलों की आभा हमारे आँखों को तृप्त कर रही थी. मुझे 9 O-clock के फूलों के खिलने का भी इन्तजार था जो बगीचे की जमीन को बैंगनी, गुलाबी रंगों से सजा देंगे. इन सब रंगों के साथ दरवाजे पर शंकू आकार के धतूरा अपनी सफ़ेद पंखुड़ियों खोले अपनी अहमियत बताने से नहीं चूकता. इनके विविध रंग और खिला खिला अंदाज  पूरे दिन इस बगीचे के माहौल  को खुशनुमा रखेगा यह सोच कर मैं बगीचे से बाहर आने लगी. इतने में एक पुकार ने मेरा ध्यान भंग किया. जल्दी से बगीचे से फूल तोड़ लो नहीं तो एक भी फूल पूजा करने के लिए नहीं मिलेगा. फिर मेरे देखते देखते बगीचे की रंगीनी और खुशनुमा माहौल जैसे अलोपित हो गया. अपने भगवान को खुश करने के लिए फूल तोड़ते हाथ हर फूल को अपनी डलिया में हर भगवान् के हिसाब से फूल को सजाते हुए अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे. महादेव के लिए सफ़ेद धतूरा, देवी दुर्गा और भगवती काली को लाल गुडहल भाएगा, दूर्बा विघ्नहर्ता को खुश करेगा प्रत्येक देवता के लिए एक ख़ास प्रकार का फूल है.  देखते देखते पौधों और टहनियों पर इथालाने वाले फूल पूजा की डलिया की शोभा बढाने लगे. डलिया सुन्दर हो गयी.  कुछ क्षण पहले बगीचे में बिखरे रंग और मुस्कराहट छोटी सी डलिया में सिमट गयी. बगीचे में अपने हरे-पीले, छोटे-बड़े, लम्बे-चौड़े लहराते पत्तों के साथ मुस्कुराने की कोशिश करते पौधे नजर आ रहे थे. एक क्षण में ही मुझे लगा जैसे मैं किसी दूसरे माहौल में आ गयी. एक ऐसी जगह जहां पहले जिन्दगी हंस रही थी वहां अभी जिन्दगी तो है पर उसमें रवानगी नहीं है, उम्मीद है तो भरोसा नहीं है.
खैर बगीचे से निकलने के बाद डलिया में सजे मुस्कुराते फूलों को देखना अच्छा तो लग रहा था. अब मेरी उत्सुकता फूलों से सजने के बाद हर देवी-देवता की खूबसूरती और प्रसन्नता को देखने की उत्सुकता मुझे फूलों से भरी डलिया के साथ मंदिर ले आई. यह एक छोटे शहर का छोटा मंदिर था जहां अपनी डाल से फूलों को अलग करने वाले हाथ ने बड़े करीने से उन फूलों को देवी देवता की मूर्तियों या फोटो के चरणों या सर पर अर्पित किया. कहीं गुच्छे में फूल रखे गए तो कहीं फूलों से पंखुड़ियों को अलग कर उन्हें बिखेर दिया. कुल मिला उन फूलों के रंग तो बाकी रह गए पर उन रंगों की मुस्कराहट नजर से ओझल हो गयी. परन्तु यह क्या यह रंग भी गायब हो गए. एक दूसरी डलिया आई. उस डलिया को भी ताजे फूल और पत्तियों से सजाया गया था. उस डलिया के लाने वाले हाथों ने मेरे बगीचे से आये फूल को समेट कर यूं किनारे कर दिया जैसे उनका कोई अस्तित्व ही नहीं. देखते देखते पाँच मिनट के अन्दर वह जीवन से भरे, आशा और खुशी के प्रतीक बेजान, उदास कचरे में बदल गए. मैं हर भगवान् की मूर्ती और फोटो को निहारते हुए यह जानने  की कोशिश कर रही थी की मेरे बगीचे के फूलों के चढ़ावे से आखिर उन्हें कितनी खुशी मिली. उन्हें खुश होना पडेगा उनकी पसंद के फूलों से उन्हें सजाया गया था. उन्हें प्रसन्न करने के लिए इन फूलों उस भूमिका से भी शायद वंचित किया गया था जिस काम के लिए प्रकृति ने इन्हें मनभावन रंग, गंध और रूप से सुसज्जित किया है.  अब मैं थोड़ी या सच कहूं तो पूरी तरह से असमंजस में थी कि प्रकृति का यह नियम कब बना जिसके तहत हम प्रकृति के इन खूबसूरत संतान को उसकी (प्रकृति) की जरूरत पूरी किये बिना ही प्रकृति के नाम पर ही उसके घर से अलग कर दिया जाता है. उनकी मुस्कराहट को बिखरने से पहले कुचल दिया जाता है. प्रकृति अपने ही खजाने को लुटा कैसे खुश हो सकती है?

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