Friday, 21 October 2016

जड़ों के साझेदार


जड़ का संसार
आज अपने छत पर मुस्कुराते फूल पौधों को देख तृप्ति तृप्त हो रही है. छोटी छोटी  पत्तियों वाले दूधी  से लेकर, झाड़ियों के रूप में फैलने वाले  गुलाब, कचनार, बोगैनविलिया, और चम्पा, मीठा नीम,  और अच्छी खासी ऊँचाई को प्राप्त करने वाले नागफनी उसके छत की ख़ूबसूरती को बढ़ा रहे थे. अरे उधर कोने में देखो मनी प्लांट की लता के बगल में बांस कैसे अपनी पीठ सीधी रख इठला रहां है.
“कौन इठला रहा है यह सीधा खडा बांस का तना. इठलाएगा ही उसे कौन सा अंतर पडा है फर्क तो हम पर पडा है.
अरे! आवाज कहां से आ रही है तृप्ति ने गर्दन घुमा कर चारो तरफ देखा. कोई नजर नहीं आ रहा बस पूरे छत पर इन पौधों के अलावा दो मोढ़े और दो मैना नजर आ रहे हैं. लगता है मुझे “भ्रम हुआ है तृप्ती ने अपना कान खुजाते हुए सोचा.
“उफ़ कितना दम घोंटू है.” फिर से आवाज आई, इस बार तृप्ती बुरी तरह चौंक गयी, यह धोखा नहीं हो सकता है, कुछ तो आस पास में है जो कुछ कहना चाह रहा है. अचानक उसकी नजर चम्पा के गमले पर पडी कुछ हलचल है वहां. वह डरते डरते दबे पाँव गमले तक पहुंची. क्या है यहाँ, उसका दिल जोर जोर से धड़क रहा था, उसने धीरे धीरे चम्पा के गमले ली मिट्टी को छुआ वहीं कुछ हिल रहा था. “तुम क्यों घबरा रही हो, तुम्हें पसीना क्यों आ रहा है. तुम्हें तो हवा, धूप  अच्छे बुरे मित्र, रिश्तेदार सभी का साथ मिलता रहता है.” इस बार आवाज तेज थी.
“त त तुम कौन हो और मुझे डरा क्यों रहे हो. सामने आओ,  
“हा हा मैं सामने ही तो नही आ सकता और आना भी नहीं चाहता. तुम्हें और इस तना और टहनियों को ही मुबारक हो यह रोशनी भरी दुनिया. मुझे यह रोशनी से भरी दुनिया कभी भी नही भाती है. मेरी दुनिया तो जमीन के अन्दर की दुनिया है, शांत, बहुत अंधेरी किन्तु जीवन से भरपूर.”
“तुम जमीन के अन्दर हो क्या वाकई कोई भूत हो.” तृप्ती अब वाकई परेशान हो उठी.
“ जमीन के अन्दर रहने कहां दिया है तुमने मुझे यहाँ लाकर गमले की मिट्टी में डाल दिया है. एक बार भी मेरे बारे में नही सोचा. बस खुद के संतोष और दिखावे का ख्याल रखा.”
“गमले के मिट्टी में?” अब तह तृप्ती पसीने में नहा चुकी थी.
“तो पेड़ पौधे की जड़ के बिना तुम्हारे पौधे, फूल मुस्कुरा सकते हैं क्या.”
“ओह तो यह जड़ की आवाज है. लेकिन मैंने तुम्हारे साथ क्या ज्यादती की है पौधे के अनुसार गमले हैं. देखो छोटे पौधे तो छोटे गमलों में हैं लेकिन बढ्दो को हमने बड़े बड़े गमले में डाला है. फिर नियमित रूप से पानी और खाद देते रहते हैं.” फिर तुम क्यों दुखी हो जड़ की बातों ने तृप्ती को परेशान किया.
“हाँ बड़ा गमला दे दिया, एक दो दिन में पानी डाल दिया और हो गयी हमारी जरूरत पूरी. ऐसे ही सोचते हो तुम मनुष्य. देखो उस जमीन को जिसके अन्दर हम फैलते हैं, जितनी मर्जी अपनी बाँहें फैलाते हैं. तुमने कभी सोचा है आजादी मिलने पर हम धरती माँ के वक्ष तक पहुंचने की काबिलियत रहते हैं.  हमारी बाँहें दूर दूर तक फ़ैल कर जमीन के अन्दर की दुनिया से अपना सम्बन्ध बनाती हैं. तुम्हें पता है दुबला पतला नजर आने वाले राई के पौधे की जड़ यानी हम लगभग 5 किलोमीटर प्रति दिन के हिसाब से बढ़ती हैं. मक्का, कपास आदि जैसे पौधों की जड़ें भी इन पौधों से बड़ी होती हैं. इनके पास तकरीबन 14 लाख शाखाएं होती हैं. जमीन के अन्दर हमारी बाँहें दूर दूर फ़ैल कर हमारा दायरा बढाती हैं. कितने तरह के दोस्त बनाती हैं. हमारी बांहों से निकलने वाले नन्हे नन्हे रेशे जमीन के अन्दर पाए जाने वाले मिट्टी के मासूम कणों, उनके बीच पाए जाने वाले पानी की बूंदों से एक प्यारा सा सम्बन्ध बनाते हैं, उनके बीच की खींचा तानी, लेन-देन हमारी जिन्दगी का आधार बनती है.”
“तुम्हें किसने मना किया है गमले की मिट्टी को हम इसीलिये तो गीला रखते हैं, ताकि तुम्हारे और पानी के बीच वह रिश्ता स्थापित हो. साथ ही हम मिट्टी में वह सब कुछ मिलाते हैं जिसकी तुम्हें जरूरत होती है ” तृप्ती को दोषी बनना मंजूर नहीं था.
“हाँ, पानी तो तुम दे देती हो, इतना ही नहीं हमारी जरूरतों का भी काफी  ख्याल रखती हो. मजबूरी है तुम्हारी हंसती खिलखिलाती पत्तियाँ, रंगीनियाँ बिखेरने वाले फूल सब हमारे और पानी के इस रिश्ते पर आधारित जो ठहरे. देखो मैं तुम्हें दोष नहीं दे रहा बस अपने मन की बात कह रहा हूँ. उन दिनों को याद कर रहा हूँ जब मैं जिसे तुम शायद मूल जड़ कहते हो बीज में छुपे मूलांकुर के रूप में बाहर आया था. रोशनी मुझे अच्छी नहीं लगी थी, मैंने चुपचाप अपना मुँह मिट्टी के अन्दर घुसा लिया था. मिट्टी की नमी उसके अन्दर की गमक सब कुछ कितनी मनोहारी थी मैं तुम्हें नहीं बता सकता. धरती की मिट्टी से बहुत प्यार से मुझे अपने आगोश में लिया था. फिर मिट्टी के एक एक कण इनके बीच छिप कर बैठी पानी की बूँदें, छोटे छोटे कीड़े, जीवाणु,हवा यहाँ तक की पहले से अपनी जगह बना चुकी दूसरे पौधों की जड़ें सबने मेरा स्वागत किया. इस गर्माहट ने जमीन के अन्दर की दुनिया से जल्दी से परिचित होने की मेरी चाहत बढ़ा दी. फिर क्या था मैंने तेजी से नीचे उतरना शुरू किया साथ ही चारो तरफ अपनी बाहें फैला कर अपनी जान पहचान बढानी शुरू कर दी. तुम्हें पता है यह जो रूखी सूखी मिट्टी नजर आती है तुम्हें दरअसल खजाना है खजाना. इसके अन्दर उतर कर इससे दोस्ती करने पर पता चलता है. अनेक तरह के लवण भरे हैं. खट्टे, मीठे, कडवे. अरे आँखें मत फैलाओ मुझे स्वाद का पता नहीं है मैं तो बस यूं ही कह रहा था. स्वाद नहीं है हमारे पास किन्तु हम इतना समझ जाते हैं कि इनमें से हमें कौन भाएगा. फिर क्या हमारे रेशे और पानी की बूंदों के बीच होने वाली खींचा तानी का फ़ायदा उठा हम इन लवण का आनंद लेते हैं. बहुत आनद मिलता है उस नोक झोंक में. तुम्हें पता है जमीन के अन्दर की जो हमारी दुनिया है वहां भी लेन-देन, लड़ाई-झगड़ा, कहा-सुनी, रूठना-मनाना सब चलता रहता है. यहाँ हमारे किरायदार, पड़ोसी, दुकानदार-खरीददार  सब होते हैं. तुम्हें अजीब लग रही हैं मेरी बातें. चलो मैं तुम्हारी उलझन सुलझाने की कोशिश करता हूँ. अब इस राइजोबियम जीवाणु को रहने के लिए घर चाहिए. उसके और हमारे दाल परिवार के सदस्यों के बीच में डील हो गयी है. अब दाल परिवार के पौधों की जड़ें उन्हें कमरा दे देती हैं, किराए के तौर पर उन्हें नाइट्रेट या नाइट्राईट मिल जाता है. मजेदार बात यह है कि इस किराए का लाभ सिर्फ इन मकानमालिकों को ही नहीं मिलता.  इन पौधों के पड़ोसी, यहाँ तक कि उस जमीन पर कुछ दिन बाद बसेरा बनाने वाले भी उस किराए से लाभान्वित होते हैं. है न अनोखी डील. तुम्हारी तरह हमेशा हम एक जैसा किराया नहीं लेते हैं.  यह सब कुछ मकानमालिक और किरायदार के स्वभाव और रिश्ते पर निर्भर करता है. हमारा दूसरा किरायदार एक फफूंद है. इसे हमारे घर के अन्दर जाना पसंद नहीं, हमसे लिपटा बाहर ही पडा रहता है. इसे हमारी पत्तियों द्वारा बनाया गया खाना बहुत पसंद है. सच कहा पेइंग गेस्ट है. बदले में यह जमीन से पानी और उसमें घुले लवण हमें देता है. इस तरह हमारा काम आसान होता है.
अब यह मत सोचना यहाँ सारे हमारे दोस्त ही हैं. कई दुश्मन भी मौजूद हैं यहाँ, जो कभी हमारा पानी चूसते हैं, हमें बीमार बनाते हैं, यहाँ तक कि काट भी डालते हैं. इन दुशमनों से भी निपटने का उपाय हम सोचते रहते हैं तरह तरह के हथियार ढूँढते है इस नमी भरी अंधेरी दुनिया में. इन सब को तो छोड़ दो.   हम जड़ें भी एक दूसरे की जड़ काटने में लगी रहती हैं. हम सब भी जमीन के खजाने को लूटने में लगे रहते हैं. जिसके हाथ जो लग जाए. ऐसे में अधिकतर ऐसा होता है बलशाली बाजी मार ले जाता है. कमजोर या तो हथियार डालता है या खुद की आदतों को बदल बलशालियों के मुँह पर तमाचा जमाता है.
इस लड़ाई-झगड़े, दोस्ती-मनुहार में भी कई चीजें सीखते हैं, कभी कुछ नया कर जाते हैं जिसपर हम ही नहीं पूरी प्रकृति नाज करती है. तुम्हें पता है जमीन के अन्दर रहने वाले कीड़े-मकौड़े और दूसरे जानवर हमारा नुक्सान करते हैं लेकिन वह अनजाने में हमारे मदद भी कर देते हैं. वह मिट्टी को चबा चबा कर ढीला करते हैं. मिट्टी के ढीला होते ही हवा को इसके अन्दर आने का मौक़ा मिलता है और हम जड़ चैन की सांस लेते हैं. यानी खुल कर सांस लेते हैं. तुम सोच रहे होगे कि मैंने दूसरे जीव जंतुओं से अपनी दोस्ती की बात तो कर ली लेकिन अपने समुदाय से सिर्फ अपने लड़ाई झगड़े की बात की. अरे यह लड़ाई-झगडा ही तो हमें करीब लाता है देखा है न तुमने कई बार मजबूत और बलशाली बिरादर अपने कमजोर साथी को अपने ऊपर आसरा दे देते हैं. तुम ध्यान देना बहुत बार तुम हमें आपस में गलबहियां डाले एक दूसरा का साथ देते भी पाओगे. आखिर का जमीन को काटने से हम सब मिल जुल कर ही तो रोकते हैं.
अब मेरी बातों को दिल पर मत लेना मैंने तो यूं ही बक बक कर ली. अपनी उस साझेदारी की दुनिया को मिस कर रहा था इसलिए. ऐसे आज जब जमीन पर जगह कम है तुमने हमें गमले में जगह दी यह भी काफी है मेरे लिए. बाय.



                                                                

Monday, 17 October 2016

सुरसती एक आकर्षण

सुरसती

कस्तूरबा बालिका विद्यालय, बेगमपुर में यह मेरी पहली कार्यशाला थी. कार्यशाला शुरू करने के दूसरे दिन एक चेहरे पर मेरी नजर अटक गयी. छोटा सा सांवला चेहरा, जिसके बाल उलझे थे, ओंठ यूं बंद थे जैसे कोई उसे खुलवा न ले. जिस चीज ने मेरा ध्यान खींचा था वह था उसका भावना शून्य चेहरा और खाली आँखें. छठी कक्षा की सुरसती के चहरे पर मासूमियत तो है लेकिन बचपन की चमक और बेपरवाही नजर नहीं आ रही थी. पूछने पर पता चला कि सुरसती बिलकुल अकेले रहना पसंद करती है, वह किसी से बात नहीं करती. उसकी बहन धूपा भी उसकी कक्षा की छात्रा है लेकिन वह धूपा का साथ भी पसंद नहीं करती है. उसे सिर्फ यह कहते सुना गया है कि उसकी तबियत खराब है इसलिए वह कक्षा या खेल के मैदान में नहीं जायेगी. वह शायद ही किसी गतिविधि में शामिल होती है. लाख बुलाने पर भी वह कहीं जाना पसंद नहीं करती है. प्रीति जो विद्यालय की खेल शिक्षिका हैं  भी उसे खेल के मैदान में लाने में असमर्थ रहती थीं.

बहराइच के चितौरा ब्लाक में एक किसान परिवार की लडकी है सुरसती. पांच भाई बहन के परिवार में एक है सुरसती. आर्थिक तंगी से रु ब रु होता रहता है इनका परिवार. धूपा और सुरसती इस साल कस्तूरबा बालिका विद्यालय, बेगमपुर में पढ़ने आ गयी हैं. बड़ी बहन की शादी हो चुकी है उसने पढाई नही की है. दो छोटे भाई हैं.

मेरी कार्यशाला के पहले चरण में बच्चों को अपने आस पास बिखरी आकृतियों को पहचान उन्हें अपने हिसाब से सजाना था. सभी बच्चों के काम पर मेरी नजर थी. सुरसती के हाथ में पकडे गए पन्ने पर टेढ़ी मेढ़ी लकीरों में घिरी विभिन्न आकृतियाँ नजर आ रही थीं जिन्हें काले रंग से रंगा गया था. मैंने ध्यान से सुरसती के चेहरे को देखा उसकी आँखें उठती नहीं थीं. मैंने कुछ सवाल भी पूछे जवाब नहीं मिला. मैंने दूसरा काम शुरू किया इसबार बच्चों को विभिन्न आकृतियों और रंगों का इस्तेमाल कर कुछ पैटर्न बनाने थे. मेरा मकसद था कि बच्चे विभिन्न रंगों के इस्तेमाल के कारण आकृतियों के स्वरूप में आये बदलाव को पहचान पाते हैं या नहीं, साथ ही उनके रंगों के चयन और उसके इस्तेमाल करने के तरीके को भी मैं देखना चाह रही थी. इस बार सुरसती ने काफी गाढे रंग चुने साथ ही स्केच पेन को काफी रगडा गया था ऊपर से उन्हें अनेक डॉट से भर दिया गया था. कुल मिलाकर वह काफी उलझन से भरा नजर आ रहा था. मैंने मुस्कुरा कर बस एक बार उसके पन्ने पर सीधी लकीर के साथ आकृति बना दी. पहली बार वह मुस्कुराई. उसके बाद तीसरी गतिविधि शुरू हुई. सारी बच्चियां मेरे द्वारा बताये गए आकृतियों के साथ व्यस्त थी, लेकिन सुरसती जैसे किसी अलग दुनिया में थी. बिलकुल गोल गोल रिंग बन रहे थे उन्हें बहुत प्यारे रंगों से भरा जा रहा था. मैंने उसे टोका नहीं इस बार लकीरें बिलकुल सही थी.

दूसरे दिन हम बच्चों के साथ पूरा, आधा और एक चौथाई को समझने की कोशिश कर रहे थे. बच्चों को एक लाइन में खडा कर मैंने सुरसती को उन्हें 1/2 में बांटने कहा. पहली बार उसने मुझे देखा थोड़ी देर तक खडी रही और अचानक एक लाइन में खडी लड़कियों के बीच से निकल गयी. थोड़ी देर तक मुझे और मेरी टीम को समझ में नही आया कि क्या हुआ. पर अचानक मेरी समझ में आया कि उसने लड़कियों की लकीर को आधे में बाँट दिया है. मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला अरे वाह. लेकिन सुरसती बस चुप चाप खडी थी. उसके बाद हुए खेल में भी उसने अच्छे से भाग लिया लेकिन कम से कम शब्दों का इस्तेमाल होता था.
अभी मैं एक महीने बाद फिर बेगपुर कास्तूराबा बालिका विद्यालय आई हूँ अपने कार्यक्रम के दूसरे phase के लिए. विद्यालय की शिक्षिकाओं से बस मैंने जानने की कोशिश की कि हमारे काम का कोई असर बच्चियों पर पड़ा है या नहीं. दो तीन शिक्षिकाओं ने अचानक कहा आपने सुरसती को बोलना सिखा दिया अब इससे ज्यादा क्या होगा. सुश्री प्रीति ने बताया कि अब वह उनकी बात का जवाब देती है. कक्षा में भी नियमित है साथ ही गतिविधियों में भी भाग लेती है. अब सुरसती अपनी जरूरत का सामान भी माँगने लगी है. हाँ, लेकिन अभी भी वह बस पूछे हुए प्रशन का जवाब देती है उससे ज्यादा कुछ नहीं.



Tuesday, 11 October 2016

जवा फूल की लालिमा



लाल जवा फूल
अपनी भाभी के बगीचे में बैंगनी जवा फूल को देख मेरे मन संदिग्ध हो गया. मेरा मन जो इस फूल की सांस्कृतिक इस्तेमाल से जुड़ा है इसे ज़वा फूल मानने तैयार नहीं हो रहा. आखिर माँ काली का प्रिय जवा फूल बैंगनी या सफ़ेद कैसे हो सकता है. नही हो सकता है न आप सब मुझसे सहमत होंगे मुझे पूरा विश्वास है. बचपन से अम्मी की पूजा में लाल जवा को शामिल होते देखा है. ससुराल गयी वहाँ भी बड़ी जिठानी/गोतनी की पूजा की थाल का अभिन्न सदस्य होता है लाल उड़हुल. इसका स्वरूप और रंग देवी को बहुत पसंद है यह सभी कहते हैं. एक दल का जवा हो या फिर अपना विस्तार करता दो या अधिक दल वाला या फिर खुद में सिमटता मिरचैया उडहुल उसका लाल रंग ही मन को लुभाता है. गुड़हल, उड्हुल या फिर जवा फूल की बात होने पर गाढे हरे  रंग की अंडाकार कटावदार किनारे वाली पत्तियों वाले छोटे पेड़ या झाड़ियों के बीच हमारी नजरें इन लाल फूल को ही तो खोजती हैं. इसकी लाली भी अद्भुत है. इसकी लाली मुझे कभी भी खतरे या बहते खून का प्रतीक नहीं लगती यह तो मुस्कुराते ओंठ और जिन्दगी से भरे गर्म खून की चमक है. 

अपने बच्चों को फूल की संरचना पढाने के लिए भी हाथ में हमेशा लाल जवा ही पकड़ा है जिसकी लाल पंखुड़ियां पौधे से ही नहीं एक दूसरे से अलग हो कर भी मुरझाई नजर नहीं आतीं. हाँ पूजा की जगह पर भी देखा है इस फूल की लालिमा इसे धूमिल नहीं होने देती, जैसे भगवान से कह रही हो देखो तुम्हारे भग्तों ने हमारे आसरे से तो हमें अलग कर दिया पर हमारी चमक का वो क्या करेंगे.
जीवविज्ञान की शिक्षिका होने के नाते भी शायद इस फूल यानी Hibiscus rosa-sinensis से मेरी गहरी प्रीति है. हाँलाकि सच कहूं तो फूलों के अंगों का साक्षात्कार कराने के लिए मुझे यह कभी उपयुक्त जान नहीं पडा लेकिन इसकी लाल पंखुड़ियां मुझे बहुत भाती थीं (मैंने कभी भी एक से अधिक फूल का इस्तेमाल नहीं किया है). गाढे हरे पांच बाह्य्दल के कवच में लिपटी अपने शंकू के ऊपरी हिस्से में जाकर खुद को पूरी तरह फैलाती लाल पंखुड़ियां तो जादू बिखेरती नजर आते ही हैं, लेकिन इन पंखुड़ियों के जादू को बढाते हैं इस शंकू के बीच में मौजूद  एक जगह इकठ्ठा पुंकेसर का गुच्छा और उसके झूमते लहराते नन्हे नन्हे परागकोष. इनकी माया को और बढाने में सहायक होते हैं उस कीप से निकलते पांच फवारे यानी स्टिग्मा. सच कहा भिन्डी और कपास के फूल भी बहुत कुछ इसकी ही तरह नजर आते हैं. आखिर भाई बंधू जो ठहरे मेरा मतलब तीनों Malvaceae परिवार के सदस्य हैं इसलिए समानता तो नजर आयेगी ही. लेकिन इन पौधों के पीले या सफ़ेद, बैंगनी फूल इस लाल जवा की बराबरी नहीं कर पाते. ठीक इसी तरह जवा के इस बैगनी, पीले या सफेद स्वरूप को लाल जवा के आस पास रखने की इच्छा ही नही हो रही. हाँलाकि जवा Hibiscus rosa-sinensis या चाइना रोज के नाम से जाना जाता है (अब यह मत पूछना कि क्या यह चीन से आया है. इसके चीन से connection के बारे में कोई जानकारी नहीं है, हाँ इतना पता है कि इसकी लालिमा से अभिभूत मलेशिया के निवासियों ने इसे अपना राष्ट्रीय फूल का दर्जा दे रखा है. ), जबकि दूसरे Hibiscus की दूसरी जाति के सदस्य हो सकते हैं. 

एक मजेदार बात फिलिपाईन्स में इसकी पंखुड़ियों और पत्तियों को पीस कर लाल रंग निकाल लिया जाता है. इस लाल रंग के बुलबुले बच्चों का प्रिय खेल होते हैं. पपीते की खोखली डंठल इनके पाइप बनते हैं जिन्हें इन लाल रस में डुबा डुबा  कर बुलबुला बनाना एक मजेदार खेल होता है. 

मेरा लाल जवा लाजवाब है खेल तो छोड़ दो क्या तुमने इसकी चाय पी है. यह कोई मजाक नहीं है, विश्व के अनेक देश के निवासी इस चाय का आनंद लेते हैं. कहीं गर्म चाय तो कहीं ठंढी चाय. सबसे मजेदार बात है हर देश में इसे अलग अलग नाम से जाना जाता है. पश्चिम अफ्रीका में यह बिस्सप (Bissap) तो मिश्र में कारकादे (Karkade) है. चाय तैयार होती है इन लाल पंखुड़ियों को पानी में तब तक उबाला जाता है जब तक कि इसका लाल रंग पानी का रंग न बदल दे. अब इस भूरे या लाल पानी में नीम्बू मिलाते हैं और फिर मिलता है एक खुशनुमा, दिलअजीज चमकता लाल रंग. अब इस लाल रंग के घोल में शक्कर, ठंढा पानी और बर्फ मिला कर कंबोडिया के निवासी ठंढे पेय के रूप में इसका आनद लेते हैं. कहते हैं कि यह चाय रक्त चाप को उच्च से निम्न कर सकते हैं. पर ऐसा माना जाता है, डॉक्टर नही कहते. इन लाल पंखुड़ियों से बने लेप अपनी लालिमा देने के साथ हमारी त्वचा को सूर्य की खतरनाक किरणों से भी बचा सकते हैं. खैर यह सब तो अभी भी शोध का विषय है इन लाल पंखुड़ियों को कागज़ पर रगड़ कागज़ को रंगीन बनाने के साथ कर अम्ल और क्षार की पहचान तो कर ही सकते हैं. यानी इस लालिमा के जादू का इस्तेमाल करना भले ही हमारी फिदरत हो लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि हम उड्हुल, गुडहल, चाइना रोज और जवा फूल को इसकी लालिमा के साथ ही देख पाते हैं.  सुन्दर चमकती लालिमा के साथ जो सूर्य की सुबह और शाम के सूरज की लालिमा की बराबरी करती नजर आती है.   


  

Saturday, 8 October 2016

दुर्गा पूजा के बदलते स्वरूप



माँ दुर्गा के बदलते रूप
आज सप्तमी है माँ घर आ चुकी हैं. बिहार, बंगाल ढ़ोल, ढ़ाक की थाप पर झूम रहा होगा. देश के दूसरे क्षेत्र दुर्गा में रामलीला का आयोजन हो रहा होगा. पूजा के अवसर पर इससे जुडी सारी कहानियाँ जैसे आस पास घूमने लगती हैं. कहीं यह नवरात्री है तो कहीं दुर्गा पूजा. नौ दिन पूजा करने के ढंग भी अलग अलग. कहीं दशमी के दिन रावण को जलाने का महत्व है तो कहीं उमा की विदाई का समारोह. हम यह जानते हैं कि क्षेत्रीय विविधता त्यौहार के भी अनेक रूप और उनसे जुडी कहानियों के भी विविध रंग का कारण होते हैं. इस त्यौहार के आयोजन का ढंग भी अलहदा ओता है. दुर्गापूजा बंगाल का मुख्य त्यौहार है और यहाँ इस त्यौहार के आगमन का मतलब  है उल्लास और मिलन का आगमन. बंगाल और बंगालियों में यह  उल्लास हर रूप में नजर आता है, कपडे, घर की सजावट यहाँ तक की खान-पान में. मांसाहार तो इस पर्व के श्रृंगार का अभिन्न हिस्सा होता है. परन्तु खिचडी प्रसाद जिसे मौसम की हर नई सब्जी से सजाया जाता है का स्वाद साल भर याद रहता है. इसके इस रंग  रूप को देख इस त्यौहार से कुछ अधिक नजदीक जाने की चाहत काफी दिनों से मन में थी. पर हर  बार  जुडी कहानियों मुझे खुद में बाँध लेती हैं. दुर्गा माँ के अनेक रूप, दुर्गा पूजा के हर दिन में माँ के अलग अलग रूप की कहानियाँ इतनी रोचक हैं कि उस मोहक जाल से मन संतुष्ट हो जाता है.
कल इंडियन एक्सप्रेस के एक आलेख पर नजर पड़ी और शायद मुझे वह मिला जिसे मैं ढूंढ रही थी. वहां से मुझे वह सुराग मिला. द्य्र्गा के अनेक रूप जैसे मुस्कुरा कर अपना परिचय देने लगे.
अगर हम पलट कर देखें तो इस त्यौहार का जुड़ाव हमारी कबिलाई जिन्दगी से मिलता है जिसके तार अभी तक बंगाल की नसों में दौड़ रहा रहे हैं. यह वह समय था जब हम पूरी तरह प्रकृति पर आश्रित थे, इसके अद्भुत रूप और प्रक्रिया से अचंभित होते रहते थे. उन्हीं दिनों भगवती का आभिर्भाव भी प्रकृति की विविधता और ख़ूबसूरती बढाने  और अनजाने –अबूझे डर से बचाने के लिए हुआ था. दुर्गा पूजा के दौरान शुभ पूजा कि जगह शुभ शारदीया इस्तेमाल करना इस बात का संकेत है कि यह उत्सव दरअसल शरद ऋतु के आगमन का उल्लास है. पूजा के दौरान “नव पर्ण” (नौ पौधों के पत्ते) का इस्तेमाल भी इस बात का गवाह हैं. मूर्ति पूजा शुरू होने से पहले भी अच्छी फसल की कामना के साथ नवपत्रिका पूजा होती थी. धान, केला, जयन्ती, बेल, ओल, अनार, अशोक, हल्दी और कंद नौ देवियाँ के रूप में स्थापित हुआ करती थी.
जिसे पाना कठिन हो वह है दुर्गा. मांस और शराब पान करने वाले देवी चण्डिका या दुर्गा मातृसत्ता की छात्र छाया में पलने बढ़ने वाले हिमालय और विन्द्या पर्वत के कबीलों की देवी के रूप में हमारे बीच आई. विद्वासिनी, तारा और चंडिका जैसे  नाम से भी पुकारा गया था दुर्गा को. फिर समय और सभ्यता के विकास के साथ साथ माँ का भी रूप बदला काली, आदि शक्ति, स्कंदमाता का भी आविर्भाव हुआ. धीरे धारे पितृसत्ता के आगमन के साथ देवी दुर्गा, महिसासुर मर्दिनी या शक्ति स्वरूपा का जन्म पुरुष देवताओं के तेज के मिलने से हुआ. और वह उमा या गौरी जो हिमालय की बेटी हैं, शक्ति या पार्वती जो शिव की पत्नी हैं और अन्नपूर्णा और महामाया जो स्त्रीत्व, मातृत्व से ओत प्रोत हैं के रूप में स्थापित हो गयीं.
वाकई माँ तेरे अनेक रूप मनमोहक होने के साथ साथ आज भी हमें अचम्भे में डालते हैं इसलिए ही शायद ढाक और ढोल की थाप दिल के गहरे उतरती है, आरती के दौरान उठने वाला धुंआ आँखों को धुंधला तो करता है पर साथ ही खुले रखने का उत्साह भी प्रदान करता है. जय माँ!


Wednesday, 5 October 2016

शिउली की गमक : शरद ऋतु के आगमन की दस्तक

शिउली

सुबह सुबह टहल कर आते समय अगर कॉलोनी के गेट पर ही शिउली की मीठी मीठी सुगंध प्यार के साथ स्वागत करे तो समझ लो शरद ऋतु का आगमन हो गया.  इस ऋतु की सुबह की तरह यह शिउली का फूल भी सादगी और सुकून से भरा नजर आता है.  
देवी के आगमन  की नाद इस फूल से जमीन के सजने के बाद ही सुनाई पड़ती है.
गाढे हरे रंग की चमकदार किन्तु रुखड़ी पत्तियों वाले 10 से 12 मीटर ऊंचें पेड़ के क़दमों में खिलखिलाती हुई नन्ही सफ़ेद पंखुड़ियों वाली नाजुक चादर बरबस फूलों को अंजली में भरने के लिए उकसा देतीं हैं. मुझे याद है मेरी अम्मी कहा करती थी कि जमीन पर पड़े यह फूल इतने जीवन से भरे होते हैं कि भगवान भी इन्हें स्वीकार करते हैं. पता है न पूजा की थाल में जमीन से उठाये फूल को जगह नहीं मिलती है. लेकिन शिउली अनोखी है इसे तो जमीन से उठा कर ही ईश्वर को नमन किया जाता है. आखिर भगवान भी क्या करें इतने खूबसूरत रंग रूप और खुशबू वाले फूल सुबह सुबह अपनी टहनियों को छोड़ जमीन पर बिछ जाते हैं. अब इनका साथ पाने के लिए भगवान को भी अपने condition (नियम) को बदलना तो पडेगा ही.
इन नन्हें फूल की पंखुड़ियों में मुझे बर्फ की सफेदी नजर नहीं आती. इन चार, पांच या छ: खुली सफ़ेद  पंखुड़ियों ने जैसे अपने नन्हें गाढे नारंगी रंग की नली की आभा को भी खुद में समेट लिया है. इन फूलों को हाथ में लेने में सावधानी बरतनी पड़ती है लेकिन अगर ध्यान से इन पंखुड़ियों पर नजर डालो तो इनके हल्के मोटे होने का भान होगा. जैसे वह हमसे कह रहीं हों मुस्कुराने और नाजुक दिखने के लिए कमजोर होना जरूरी नहीं है.  
बंगालियों के लिए शिउली, जो पारिजात और हरश्रृंगार के नाम से भी जाना जाता है को हमारे मिथक प्राचीन कथाओं में स्थान न मिले यह कैसे हो सकता है. हमारी प्राचीन कथाएँ इसे समुद्र मंथन का परिणाम मानती हैं. भगवान इंद्र से जीत कर कृष्ण ने इसे अपने आँगन में लगाया. रानी रुक्मिणी के आँगन की शोभा था यह वृक्ष लेकिन इसके फूल महारानी सत्यभामा के आँगन की शोभा बढाते था. कृष्ण की लीला अपरमपार.
यह तो भगवान लोगों का मामला था. लेकिन एक दूसरी कहानी पारिजात के इस फूल की बात करती है. इस कहानी के अनुसार पारिजात एक खूबसूरत सी राजकुमारी थी जिसे सूर्य देवता पसंद आ गए. सूर्य देवता को भी पारिजात पसंद थी लेकिन साथ पाने के लिए पारिजात को सूर्य देवता से कुछ वायदा करना था. वह वायदा था कि वह सूर्य से कभी दूर नहीं जायेंगी. पारिजात ने अपनी सहमती दे दी. शरद ऋतू में दोनों की शादी हो गयी. शरद और वसंत ऋतू आई और चली गयीं. सूर्य और पारिजात को इसकी खबर नहीं हुई. किन्तु ग्रीष्म ऋतु के आगमन के साथ सूर्य का रौद्र रूप सामने  आने लगा. पारिजात इसे बर्दास्त नहीं कर पा रही थीं, नतीजा वह सूर्य से दूर होने लगी. सूर्य को यह बात नागवार गुज़री और उनके क्रोध ने पारिजात को जला डाला. बाद में जब सूर्य को अपनी गलती का अहसास हुआ वह देवताओं से सहायता माँगने गए. देवताओं ने उन्हें सहायता प्रदान की, लेकिन उनकी भी शर्त थी. वह शर्त थी कि वह पारिजात को अपना रौद्र रूप नहीं दिखाएँगे. कहते हैं उसके बाद से पारिजात और सूर्य सिर्फ रात में मिलते हैं. इसलिए पारिजात के फूल रात के समय ही खिल कर अपनी खुशबू बिखेरती है और सुबह होते ही अपने पौधे से जुदा हो जाती है. इसके इस स्वभाव के कारण इसके पेड़ को दुखी पेड़ की उपाधी प्रदान कर दी गयी है. अब पेड़ को आप दुखी पेड़ कह डालो लेकिन यह यह फूल तो बंगला समुदाय (बंगालियों) के बीच उत्साह और रौनक का माहौल लाता है.  
शरद के आगमन की सूचना देने वाला यह फूल बंगालियों के प्रमुख त्यौहार दुर्गापूजा की शोभा है और इसीलिये बंगाल ने इसे अपना राज्य फूल भी घोषित कर रखा है. भारत का बंगाल हो या बंगलादेश वहां के निवासियों के लिए शिउली  फूल काफी ख़ास है. अब इसे रात का चमेली कहो या फिर हरश्रृंगार, पारिजात या फिर शिउली के नाम से पुकारो, हर नाम के साथ इस  नजाकत और मुस्कराहट नजर आती है. इसी मुसकुराहट, नजाकत और सादगी के कारण ही शायद मेरे बाबूजी ने अपनी पोती का नाम “शिउली” रखा.