माँ दुर्गा के बदलते रूप
आज सप्तमी है माँ घर आ चुकी
हैं. बिहार, बंगाल ढ़ोल, ढ़ाक की थाप पर झूम रहा होगा. देश के दूसरे क्षेत्र दुर्गा में
रामलीला का आयोजन हो रहा होगा. पूजा के अवसर पर इससे जुडी सारी कहानियाँ जैसे आस
पास घूमने लगती हैं. कहीं यह नवरात्री है तो कहीं दुर्गा पूजा. नौ दिन पूजा करने
के ढंग भी अलग अलग. कहीं दशमी के दिन रावण को जलाने का महत्व है तो कहीं उमा की
विदाई का समारोह. हम यह जानते हैं कि क्षेत्रीय विविधता त्यौहार के भी अनेक रूप और
उनसे जुडी कहानियों के भी विविध रंग का कारण होते हैं. इस त्यौहार के आयोजन का ढंग
भी अलहदा ओता है. दुर्गापूजा बंगाल का मुख्य त्यौहार है और यहाँ इस त्यौहार के
आगमन का मतलब है उल्लास और मिलन का आगमन. बंगाल
और बंगालियों में यह उल्लास हर रूप में
नजर आता है, कपडे, घर की सजावट यहाँ तक की खान-पान में. मांसाहार तो इस पर्व के
श्रृंगार का अभिन्न हिस्सा होता है. परन्तु खिचडी प्रसाद जिसे मौसम की हर नई सब्जी
से सजाया जाता है का स्वाद साल भर याद रहता है. इसके इस रंग रूप को देख इस त्यौहार से कुछ अधिक नजदीक जाने
की चाहत काफी दिनों से मन में थी. पर हर बार जुडी कहानियों मुझे खुद में बाँध लेती हैं.
दुर्गा माँ के अनेक रूप, दुर्गा पूजा के हर दिन में माँ के अलग अलग रूप की
कहानियाँ इतनी रोचक हैं कि उस मोहक जाल से मन संतुष्ट हो जाता है.
कल इंडियन एक्सप्रेस के एक
आलेख पर नजर पड़ी और शायद मुझे वह मिला जिसे मैं ढूंढ रही थी. वहां से मुझे वह
सुराग मिला. द्य्र्गा के अनेक रूप जैसे मुस्कुरा कर अपना परिचय देने लगे.
अगर हम पलट कर देखें तो इस
त्यौहार का जुड़ाव हमारी कबिलाई जिन्दगी से मिलता है जिसके तार अभी तक बंगाल की
नसों में दौड़ रहा रहे हैं. यह वह समय था जब हम पूरी तरह प्रकृति पर आश्रित थे,
इसके अद्भुत रूप और प्रक्रिया से अचंभित होते रहते थे. उन्हीं दिनों भगवती का
आभिर्भाव भी प्रकृति की विविधता और ख़ूबसूरती बढाने और अनजाने –अबूझे डर से बचाने के लिए हुआ था. दुर्गा
पूजा के दौरान शुभ पूजा कि जगह शुभ शारदीया इस्तेमाल करना इस बात का
संकेत है कि यह उत्सव दरअसल शरद ऋतु के आगमन का उल्लास है. पूजा के दौरान “नव पर्ण”
(नौ पौधों के पत्ते) का इस्तेमाल भी इस बात का गवाह हैं. मूर्ति पूजा शुरू होने से
पहले भी अच्छी फसल की कामना के साथ नवपत्रिका पूजा होती थी. धान, केला,
जयन्ती, बेल, ओल, अनार, अशोक, हल्दी और कंद नौ देवियाँ के रूप में स्थापित हुआ
करती थी.
जिसे पाना कठिन हो वह है
दुर्गा. मांस और शराब पान करने वाले देवी चण्डिका या दुर्गा मातृसत्ता की छात्र
छाया में पलने बढ़ने वाले हिमालय और विन्द्या पर्वत के कबीलों की देवी के रूप में
हमारे बीच आई. विद्वासिनी, तारा और चंडिका जैसे नाम से भी पुकारा गया था दुर्गा को. फिर समय और
सभ्यता के विकास के साथ साथ माँ का भी रूप बदला काली, आदि शक्ति, स्कंदमाता का भी
आविर्भाव हुआ. धीरे धारे पितृसत्ता के आगमन के साथ देवी दुर्गा, महिसासुर मर्दिनी
या शक्ति स्वरूपा का जन्म पुरुष देवताओं के तेज के मिलने से हुआ. और वह उमा या गौरी जो हिमालय की बेटी हैं, शक्ति या पार्वती जो शिव की
पत्नी हैं और अन्नपूर्णा और महामाया जो स्त्रीत्व, मातृत्व से ओत प्रोत हैं
के रूप में स्थापित हो गयीं.
वाकई माँ तेरे अनेक रूप
मनमोहक होने के साथ साथ आज भी हमें अचम्भे में डालते हैं इसलिए ही शायद ढाक और ढोल
की थाप दिल के गहरे उतरती है, आरती के दौरान उठने वाला धुंआ आँखों को धुंधला तो
करता है पर साथ ही खुले रखने का उत्साह भी प्रदान करता है. जय माँ!
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