Monday, 17 October 2016

सुरसती एक आकर्षण

सुरसती

कस्तूरबा बालिका विद्यालय, बेगमपुर में यह मेरी पहली कार्यशाला थी. कार्यशाला शुरू करने के दूसरे दिन एक चेहरे पर मेरी नजर अटक गयी. छोटा सा सांवला चेहरा, जिसके बाल उलझे थे, ओंठ यूं बंद थे जैसे कोई उसे खुलवा न ले. जिस चीज ने मेरा ध्यान खींचा था वह था उसका भावना शून्य चेहरा और खाली आँखें. छठी कक्षा की सुरसती के चहरे पर मासूमियत तो है लेकिन बचपन की चमक और बेपरवाही नजर नहीं आ रही थी. पूछने पर पता चला कि सुरसती बिलकुल अकेले रहना पसंद करती है, वह किसी से बात नहीं करती. उसकी बहन धूपा भी उसकी कक्षा की छात्रा है लेकिन वह धूपा का साथ भी पसंद नहीं करती है. उसे सिर्फ यह कहते सुना गया है कि उसकी तबियत खराब है इसलिए वह कक्षा या खेल के मैदान में नहीं जायेगी. वह शायद ही किसी गतिविधि में शामिल होती है. लाख बुलाने पर भी वह कहीं जाना पसंद नहीं करती है. प्रीति जो विद्यालय की खेल शिक्षिका हैं  भी उसे खेल के मैदान में लाने में असमर्थ रहती थीं.

बहराइच के चितौरा ब्लाक में एक किसान परिवार की लडकी है सुरसती. पांच भाई बहन के परिवार में एक है सुरसती. आर्थिक तंगी से रु ब रु होता रहता है इनका परिवार. धूपा और सुरसती इस साल कस्तूरबा बालिका विद्यालय, बेगमपुर में पढ़ने आ गयी हैं. बड़ी बहन की शादी हो चुकी है उसने पढाई नही की है. दो छोटे भाई हैं.

मेरी कार्यशाला के पहले चरण में बच्चों को अपने आस पास बिखरी आकृतियों को पहचान उन्हें अपने हिसाब से सजाना था. सभी बच्चों के काम पर मेरी नजर थी. सुरसती के हाथ में पकडे गए पन्ने पर टेढ़ी मेढ़ी लकीरों में घिरी विभिन्न आकृतियाँ नजर आ रही थीं जिन्हें काले रंग से रंगा गया था. मैंने ध्यान से सुरसती के चेहरे को देखा उसकी आँखें उठती नहीं थीं. मैंने कुछ सवाल भी पूछे जवाब नहीं मिला. मैंने दूसरा काम शुरू किया इसबार बच्चों को विभिन्न आकृतियों और रंगों का इस्तेमाल कर कुछ पैटर्न बनाने थे. मेरा मकसद था कि बच्चे विभिन्न रंगों के इस्तेमाल के कारण आकृतियों के स्वरूप में आये बदलाव को पहचान पाते हैं या नहीं, साथ ही उनके रंगों के चयन और उसके इस्तेमाल करने के तरीके को भी मैं देखना चाह रही थी. इस बार सुरसती ने काफी गाढे रंग चुने साथ ही स्केच पेन को काफी रगडा गया था ऊपर से उन्हें अनेक डॉट से भर दिया गया था. कुल मिलाकर वह काफी उलझन से भरा नजर आ रहा था. मैंने मुस्कुरा कर बस एक बार उसके पन्ने पर सीधी लकीर के साथ आकृति बना दी. पहली बार वह मुस्कुराई. उसके बाद तीसरी गतिविधि शुरू हुई. सारी बच्चियां मेरे द्वारा बताये गए आकृतियों के साथ व्यस्त थी, लेकिन सुरसती जैसे किसी अलग दुनिया में थी. बिलकुल गोल गोल रिंग बन रहे थे उन्हें बहुत प्यारे रंगों से भरा जा रहा था. मैंने उसे टोका नहीं इस बार लकीरें बिलकुल सही थी.

दूसरे दिन हम बच्चों के साथ पूरा, आधा और एक चौथाई को समझने की कोशिश कर रहे थे. बच्चों को एक लाइन में खडा कर मैंने सुरसती को उन्हें 1/2 में बांटने कहा. पहली बार उसने मुझे देखा थोड़ी देर तक खडी रही और अचानक एक लाइन में खडी लड़कियों के बीच से निकल गयी. थोड़ी देर तक मुझे और मेरी टीम को समझ में नही आया कि क्या हुआ. पर अचानक मेरी समझ में आया कि उसने लड़कियों की लकीर को आधे में बाँट दिया है. मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला अरे वाह. लेकिन सुरसती बस चुप चाप खडी थी. उसके बाद हुए खेल में भी उसने अच्छे से भाग लिया लेकिन कम से कम शब्दों का इस्तेमाल होता था.
अभी मैं एक महीने बाद फिर बेगपुर कास्तूराबा बालिका विद्यालय आई हूँ अपने कार्यक्रम के दूसरे phase के लिए. विद्यालय की शिक्षिकाओं से बस मैंने जानने की कोशिश की कि हमारे काम का कोई असर बच्चियों पर पड़ा है या नहीं. दो तीन शिक्षिकाओं ने अचानक कहा आपने सुरसती को बोलना सिखा दिया अब इससे ज्यादा क्या होगा. सुश्री प्रीति ने बताया कि अब वह उनकी बात का जवाब देती है. कक्षा में भी नियमित है साथ ही गतिविधियों में भी भाग लेती है. अब सुरसती अपनी जरूरत का सामान भी माँगने लगी है. हाँ, लेकिन अभी भी वह बस पूछे हुए प्रशन का जवाब देती है उससे ज्यादा कुछ नहीं.



No comments:

Post a Comment