Tuesday, 10 January 2017

Unity


We, the people of earth,
Should live in peace
We must not fight over
The land & the seas
grow firm hard & strong

We must unite as same people
& then nothing will go wrong
Why fight over
The seas & the land
For this fight will reduce
Everything to sand.
Now this is the time for us to sign
A treaty
That from now we will live in unity.

We must let the tree of peace

MAKARAND PARASHAR (Class Xth)

Monday, 9 January 2017

चुम्बक और चुम्बकत्व

चुम्बक और चुम्बकत्व
लोड स्टोन नामक पत्थर से हमारा परिचय हजारो साल पुराना है. इसकी अजीबो गरीब आदत ने शुरूआती दिनों में हमें बहुत परेशान किया था. अब किसी द्वीप की तरफ अगर लोहे की कोई नाव खुद ब खुद खिंची चली जाए और समुद्र में डूब आ जाए तो इसे हम प्रेत और भूत का काम ही मानेंगे. यह तो हमें बाद में पता चला कि यह काम  दरअसल उस द्वीप पर पाया जाना वाला पत्थर जिसे हम लोड स्टोन के नाम से जानते हैं कर रहा है. हाँ, बहुत विचित्र गुण है उसके पास लोहा या लोहे से बनी चीजों को वह अपनी ओर खींच लेता है. काफी दूर तक इसकी यह ताकत अपना असर दिखाती है. इतना जरूर है कि एक बड़ा पत्थर अधिक दूर से लोहे या उससे बने सामान को अपनी तरफ खींचता है जबकि एक छोटे पत्थर की ताकत कम होगी.
भला हो मैग्नस नामक गड़ेरिये का  जिसने लोहे की कील वाला जूता पहन रखा था और हाथ में लोहे की पेंदी वाला डंडा पकड़ रखा था. इस कहानी से तो हम सब परिचित है कि मैग्नस नामक गड़ेरिया अपनी भेंड चराने निकला था. रास्ते में उसे एक काले रंग का बड़ा सा पत्थर पडा मिला. उसकी भेंड उस पत्थर पर चढ़ गयीं. अपनी भेंड के पीछे पीछे मैग्नस भी उस पत्थर पर चढ़ गया. मगर यह क्या वह अपना दूसरा कदम उठा ही नहीं पा रहा था और न ही अपने डंडे को उठा पा रहा था. यह क्या हुआ सोच सोच आकर वह परेशान हो गया था. उसके जूते तो जैसे पत्थर से चिपक गए थे वही हाल उसके डंडे का था. जूता और डंडा छोड़ कर मैग्नस पत्थर से नीचे उतारा.
लेकिन उसके साथ हुए इस हादसे ने एक ऐसे पत्थर से परिचित करा दिया जिसके पास लोहे और उससे बनी चीज को खुद की तरफ खींचने की ताकत है. फिर क्या इस पत्थर के छोटे छोटे टुकडे काम में आने लगे. इसका नाम पडा मैगनेट (मैग्नस चरवाहा या फिर मिश्र के शहर मैग्नेसिया के नाम पर.  जहां इस पत्थर का खजाना है शायद).  जब वैज्ञानिक ने इस पत्थर के स्वभाव की जांच की तो पता चला कि दरअसल यह लोहे का आक्साइड है (Ferrous oxide). यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूं कि मिश्र देश के साहित्य में इस कहानी का उल्लेख 500 ईसा पूर्व के दस्तावेज में मिलता है जबकि हमारे चीन देश के वाशिंदे इस पत्थर से अपना परिचय इससे भी पहले का बताते हैं. चीन के दस्तावेज के अनुसार 2500 ईसा पूर्व एक चीन के एक जनरल ने गहरे कोहरे में अपनी सेना को दिशा बतलाने के लिये लोडस्टोन के  से मदद ली थी. उन्हें पता था कि इस पत्थर के टुकडे को लटकाने पर यह हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा की तरफ रुख करेगा. बस इस पत्थर के गुण का उपयोग कर गहरे कोहरे में भी उनकी सेना आगे बढ़ चली थी. इतना ही नहीं लोडस्टोन के पतले पतले टुकड़ों को पानी पर रख नाविक भी दिशा का पता लगा लेते थे. वाकई जादुई पत्थर है हमारा लोड स्टोन. आर्कीमिडीज ने तो इस पत्थर का इस्तेमाल कर दुश्मन के नाव के कील निकाल दिए और उन्हें डुबो दिया.
कमाल का पत्थर है यह. इतना ही नहीं चीन के निवासियों ने यह भी बताया कि अगर किसी लोहे की सूई को पीटा जाए तो वह भी चुम्बक के गुण दर्शाने लगता है. इस तरह उन्होंने पहली  चुम्बकीय सूई भी तैयार कर डाली जिसकी मदद से नाविक दिशा की जानकारी लेते थे.  उनकी इस खोज की खबर अरब के व्यापारियों को मिल गयी, वहां से यूरोप के व्यापारियों तक खबर पहुंची और फिर इस जादुई सूई का इस्तेमाल चल पडा. यूरोप के 1269 के दतावेज में इसके उपयोग की चर्चा है.
इस खोज ने नाविकों को अपना दायरा बढाने में सहायता की. अब वह अधिक दूरी तय करने लगे. पहले उन्हें सूर्य पर आश्रित रहना पड़ता था जो अक्सर धोखा देता था. अब दिशा बोध के मामले में सूर्य की जरूरत ख़त्म हो चुकी थी.
लेकिन अभी यह पहेली तो बनी ही थी कि आखिरकार यह सूई उत्तर-दक्षिण का रुख क्यों करती है. यह जवाब हमें 1600 ई. में मिला जब विलियम गिल्बर्ट जो क्वीन एलिज़ाबेथ कॉलेज में डाक्टर थे, ने यह बताया कि हमारी पृथ्वी एक बहुत बड़ा चुम्बक है. आप कहेंगे कि उन्होंने कह दिया और हम मान लें. लेकिन हम यहाँ जान लें कि उन्होंने यूं ही नहीं कहा, अनेक प्रयोग उनकी इस बात का आधार बने.  पहले तो इस सूई को अनेक तरह से घुमा कर टांगा गया,  हर बार सूई एक ही स्थिति में रुकती थी. इस खेल में उनका ध्यान इस तरफ गया कि यह सूई का उत्तरी ध्रुव थोड़ा सा नीचे धरती की ओर झुका होता है. यह देख उन्हें कुछ सूझा और उन्होंने लोड स्टोन की मदद से पृथ्वी का नमूना तैयार किया और फिर अपने विचार की जांच की. अपने प्रयोग से उन्हें यह विश्वास हो गया कि पृथ्वी एक बहुत बड़े चुम्बक की तरह व्यवहार करता है. और पृथ्वी के इस गुण के कारण चुम्बक के दोनों छोर हमेशा ऊत्तर और दक्षिण दिशा की तरफ रुख करते हैं. चुम्बक के गुणों को परखते समय हमने यह पाया था कि अगर दो चुम्बक को साथ साथ रखा जाए तो वह कुछ व्यवहार करते हैं. जी हाँ अगर दोनों चुमबक के सामान ध्रुव मान लो उत्तर दिशा की तरफ रुख करने वाले ध्रुव आस पास होंगे तो दोनों चुमबक एक दूसरे से दूर भागेंगे जैसे पुरानी दुश्मनी हो. वहीं अगर विपरीत ध्रुव यानी एक चुम्बक का उत्तरी ध्रुव और दूसरे का दक्षिण ध्रुव आमने सामने या पास हो तो दो पुराने दोस्तों की तरह कंधे से कंधा मिला खड़े हो जायेंगे. है न मजेदार बात. हाँ तो पृथ्वी के चुम्बक का उत्तरी ध्रुव  हमारे चुम्बक  के पश्चिमी ध्रुव की तरफ और पृथ्वी का पश्चिम ध्रुव हमारे चुम्बक के उत्तरी ध्रुव की तरफ होता है. सच में कितना बड़ा राज था यह. देखते हैं और न जाने कितने रहस्य से हमें रु ब रु कराएगा यह चुम्बक और इसके चुम्बकीय गुण.
सचमुच इतना ही काफी नहीं था अभी कुछ और चीजें थीं जिनका पता चलना बाकी था. 1819 में वैज्ञानिक हंस क्रिसटीशियन अपने दोस्तों को बिजली की धारा से पैदा होने वाली गर्मी के बारे में बता रहे थे. इस बात को बताने के लिए उन्होंने बिजली के तार में बिजली की धारा बहाई थी अचानक तार के पास पड़ी चुम्बकीय सूई में हलचल दिखी. सूई घूम गयी थी. सब आश्चर्य में पड़ गए लेकिन साथ ही यह भी पता चल गया कि बिजली की धारा के पास भी चुम्बकीय गुण हैं.
जल्द की यह भी पता चल गया कि अगर किसी लोहे के टूकडे के चारो तरफ बिजली का तार लपेट दो और उसमें बिजली की धारा बहाई जाए तो वह लोहा चुम्बकीय गुण दर्शाता है. इस चुम्बक को हमने विद्युत् चुम्बक नाम दिया. 1831 में तो इस विद्युत् हुम्बक की मदद से एक लिफ्ट बन कर तैयार हो गया जो तकरीबन 1 टन का भार उठा सकता था. माइकेल फैराडे नामक अंग्रेज वैज्ञानिक को इस चुम्बकीय गुण में बहुत सी संभावनाएं नजर आने लगीं और उन्होंने  यह भी पता कर लिया कि अगर तार के लूप यानी कुण्डली के अन्दर एक चुम्बक रखा जाए और उसे तेजी से घुमाया जाए तो तार में बिजली की धारा दौड़ पड़ेगी. अब उनकी इस खोज ने ही तो हमें बजली के मोटर और जेनेरेटर बनाने की प्रेरणा दी. कितने काम का यह मोटर, जेनेरेटर न जाने कितनी चीजें इनकी सहायता से काम करती हैं.
इन सब खोज के बाद हमारा तकनीकी संसार काफी तेजी से तरक्की करने लगा था. इस तकनीकी संसार को देखो तो मन में सवाल उठता है अगर हमने चुम्बक और चुम्बकीय गुण को नहीं पहचाना होता तो यह पंखा, रेडियो, छोटे छोटे खिलौनों से लेकर कारखानों में लगी बड़ी बड़ी मशीन की कल्पना भी कर पाना संभव नहीं होता. आज चाँद और अंतरिक्ष की सैर करने वाला मनुष्य भारत से इंग्लैण्ड जाने की हिम्मत भी नही करता.


Sunday, 8 January 2017

हवा को बहने दो

हवा और क्लौउस्क

बहुत पुरानी बात है समुद्र के किनारे स्थित लकड़ी के बने घर में क्लौउस्क नामक लड़का अपनी दादी के साथ रहता था. एक दिन क्लौउस्क समुद्र के किनारे टहल रहा था, उसकी नजर समुद्र में तैरती बतखों पर पड़ी. शिकार करना चाहिए यह सोच कर क्लौउस्क ने तीर धनुष कंधे पर टांगा और अपनी नन्ही सी कश्ती को पानी मे उतार लिया. अपनी नन्ही कश्ती को चप्पू की मदद से खेते हुए क्लौउस्क बतखों की तरफ बढ़ चला. मस्ती में वह अपना पसंदीदा गाना गुनगुना रहा था. वह आगे बढ़ रहा था अब अधिक दूरी नहीं थी. अचानक तेज हवा आई जिसने उसे पीछे धकेल दिया. हाय, इस हवा ने तो उसे फिर से किनारे पर पहुंचा दिया. थोड़ी झुंझलाहट हुई. लेकिन उसने फिर से चप्पू का सहारा लिया और कश्ती को आगे बढाया. इस बार उसके हाथ तेजी से चल रहे थे और वह उसका गाना भी दूर तक गूँज रहा था. हाँ, दूरी घट रही थी अब थोड़ी देर में वह निशाना साधेगा, लेकिन यह क्या! फिर से हवा का झोंका आया और वह वापस किनारे पहुंच गया. क्लौउस्क ने अनेक बार कोशिश की किन्तु  बार बार हवा ने उसे  पराजित कर दिया.

थका हारा, झुंझलाया क्लौउस्क अपनी दादी के पास गया और उसने दादी से पूछा आखिरकार यह हवा आती कहां से है. दादी ने आश्चर्य से पूछा आखिर क्या बात है ? क्लौउस्क ने कहा मुझे जानना है बस. दादी को पता था जब तक क्लौउस्क को उसके प्रश्न का जवाब नहीं मिलेगा वह प्रश्न पूछता रहेगा. दादी ने उसे बताया, “ यहाँ से काफी दूर अनेक पहाड़ियां हैं. उनमें से सबसे ऊंची वाली पहाडी पर वुसोवेन नामक  एक पक्षी रहता है. उसके पंखों की फडफड़ाहट से यह हवा बनती है. वह जितनी जोर से पंख फड़फड़ायेगा उतनी ही तेज हवा बहेगी. इतना सुनने के बाद क्लौउस्क ने अपनी दादी से उस जगह का पता पूछा. उसके इस प्रश्न के जवाब में दादी ने कहा, “हवा का रुख करो और उसकी दिशा में चल पड़ो. तुम पक्षी तक पहुंच जाओगे.”

क्लौउस्क ने अपनी यात्रा शुरू कर दी. जंगल, झाडी, उबड़ खाबड़ सड़क पार करते हुए वह हवा की दिशा में बढ़ता जा रहा था. हवा तेज थी. लेकिन वह आगे बढ़ते गया. आखिरकार वह पहाड़ियों तक पहुंच गाया. एक पहाडी, दो पहाडी पार कर वह सबसे ऊंची पहाडी तक पहुंच गया. पहाडी से बढ़ती निकटता तेज हवा को निमंत्रण दे रही थी. हवा इतनी तेज हो चुकी थी कि उसके कपडे फट गए. लेकिन उसने हार नहीं मानी. क्लौउस्क ने सबसे ऊंची पहाड़ी की चढ़ाई भी शुरू कर दी और अंतत: चोटी पर पहुंच गया. लेकिन वहां हवा के थपेड़े और भी भारी थे. क्लौउस्क के सर के बाल उस थपेड़े को बर्दास्त नहीं कर पाए और सर का साथ छोड़ दिया. वहाँ पहुंच अपनी बंद होती आँख पर हाथ रखते हुए क्लौउस्क ने गहरी सांस ली और आवाज लगाई प्यारे दादाजी

उसकी पुकार सुन पहाडी पर बैठे बड़े से पक्षी ने अपने पंख को रोक दिया और पूछा “किसने मुझे दादा जी कहा.” 

क्लौउस्क ने अदब से कहा, “मैंने आपको आवाज दी.”

“क्यों” पक्षी ने पूछा

“आप हवा बनाने का इतना अच्छा काम कर रहे हैं कि मुझसे रहा नहीं गया, मैं आपसे मिलने आ गया.” क्लौउस्क ने शान्ति से कहा.

यह सुन कर पक्षी का सीना फूल गया, उसने अपने पंखों को और जोर से फड़फडाना शुरू कर दिया. इतनी तेज हवा चली कि क्लौउस्क तो पहाडी से लगभग गिर ही गया था.

खुद को सम्भालते हुए क्लौउस्क ने कहा, “लेकिन मुझे ऐसा लगता है दादा जी अगर आप बगल वाली पहाडी पर चले जायेंगे तो आपका काम और अच्छा हो जाएगा.” 
.
“ऐसा है!” लेकिन मैं अपने भारी पंख के कारण उड़ कर वहां तक नहीं जा सकता.” पक्षी ने थोड़े उदास स्वर में कहा.

“आप चिंता क्यों करते हैं, मैं हूँ न.” शाहरुख खान के अंदाज में क्लौउस्क ने पक्षी की तरफ सहायता का हाथ बढ़ाया.

“अपने साथ लाये बेल्ट के सहारे पक्षी को अपनी पीठ पर बिठा क्लौउस्क दूसरी पहाडी की तरफ चल पडा. थोड़ा आगे बढ़ने के बाद क्लौउस्क ने जान बूझ कर पक्षी को दोनों पहाड़ियों के बीच के गड्ढे में गिरा दिया. इसके बाद वह घर आ गया. रास्ते में उसे कहीं भी हवा नहीं मिली. समुद्र की लहरें भी एकदम शांत नजर आई. पेड़ पौधे सब बुझे बुझे नजर आ रहे थे. समुद्र के  आस पास बतख भी नजर नहीं आ रहे थे. चिड़ियाँ, जानवर सब शांत हो गए. समुद्र के पानी में भी झाग जैसा बनने लगा यहाँ तक कि उसे भी अच्छा नहीं लग रहा था. उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि आखिरकार यह क्या हो रहा है. घबराकर उसने दादी से पूछा, “यह क्या हो रहा है, ऐसा क्यों हो रहा है?”
दादी ने मुस्कुराकर कहा, “तुमने यही चाहा था, अब तुम्हें क्या परेशानी है?’

“मतलब, मैं ऐसा क्यों कहूंगा.” क्लौउस्क ने परेशान होकर कहा .

“तुमने ही तो हवा के बहाव को रोका है. अब हम सब के पास कम हवा आ रही है. हमें ज़िंदा रहने के लिए हवा की जरूरत होती है. सांस लेने के लिए हवा जरूरी है, हवा के बहने से बीज आदि इधर उधर जा सकते हैं. पानी के अन्दर की जिन्दगी मुस्कुराती है. इसके बिना सब कुछ खत्म हो जाएगा.” दादी ने स्थिति की गंभीरता से क्लौउस्क को अवगत कराया.
यह सुन क्लौउस्क को अपने काम पर पछ्तावा होने लगा. जिस रास्ते से वह आया था उसी रास्ते वापस हो गया. चलते चलते उसके बाल भी वापस आ गए. पहाडी पर पहुंच कर उसने आवाज लगाई, “अंकल, आप कहां हैं?’

“किसने मुझे आवाज दी, मुझे अंकल कहा” गड्ढे से पक्षी ने कहा.

“अरे यहाँ आपको किसने डाल दिया.” क्लौउस्क ने अचरज दिखाया.

“एक फटे कपडे, बिना बाल वाला व्यक्ति आया था उसने मुझे यहाँ गिरा दिया.” पक्षी  ने गुस्से से कहा.

“कोई बात नहीं, मैं आपको वापस निकलता हूँ.” क्लौउस्क ने पक्षी को गड्ढे से निकाल दिया और पहाड़ की चोटी पर वापस बिठा दिया.

“अंकल एक निवेदन करूं.” क्लौउस्क ने हिचकते हुए कहा.

“हाँ, कहो” पक्षी ने अपने पंख फैलाते हुए कहा.

“अंकल, आप अपने पंख हमेशा एक जैसी तेजी से मत चलाईयेगा. कभी तेज तो कभी धीमी गति होगी तो अधिक अच्छा लगेगा.

“ठीक है. ऐसा ही होगा.” पक्षी ने धीमे धीमे पंख चलाना शुरू कर दिया था.

क्लौउस्क मुस्कुराकर पहाड़ से उतर आया. पेड़ पौधे, चिड़ियाँ, जानवर यहाँ तक कि समुद्र की लहरें मुस्कुराकर उसका स्वागत करती नजर आईं.
   
----नार्थ अमेरिकन इन्डियन की कहानियों के खजाने से 

Tuesday, 3 January 2017

ड़ा.रक्माबाई भारत की पहली महिला पेशेवर डाक्टर जिन्होंने बाल विवाह के विरुद्ध खड़े होना चुना

महिला डाक्टर जिसने बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई
बाल विवाह नामक इस सामाजिक कुरूति ने मेरी खुशियों पर डाका डाल दिया है. यह कुरीति मेरे और उन चीजों के बीच आता है जिनका मेरे जीवन में बहुत महत्व है. वह चीजें हैं शिक्षा और सभ्य मानसिकता. मेरी कोई गलती नहीं है फिर भी मैं एकाकी जीवन जीने के लिए विवश हूँ. अपनी नासमझ बहनों से अलग रहने की मेरी इच्छा को संदेह की दृष्टी से देखा जाता है साथ ही मेरी इस इच्छा का गलत अर्थ भी निकाला जा रहा है.”
यह 26 जून 1885 के टाइम्स of इंडिया में प्रकाशित पत्र के अंश हैं. यह पत्र द हिन्दू लेडी नामक हिन्दुस्तानी महिला  द्वारा लिखे गए थे. द हिन्दू लेडी दरअसल एक ऐसी स्त्री का छद्म नाम था जिसने उस जमाने में बाल विवाह का विरोध करने का साहस किया था. इस हिम्मत के साथ अपनी बात रखने वाली महिला नही बालिका का नाम था रक्माबाई . द हिन्दू लेडी के नाम से रक्माबाई ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कई ऐसे पर लिखे जो स्त्रियों के हालात , बाल विवाह जैसे कुप्रथा की चर्चा करते थे.  ड़ा. रक्माबाई जो भारत की पहली महिला डाक्टर थीं. हाँलाकि ड़ा. आनंदी बेन जोशी पहली भारतीय महिला डाक्टर के रूप में जानी जाती हैं. डा जोशी ने डाक्टरी की डिग्री तो हासिल की थी लेकिन अपनी बीमारी के कारण अपने पेशे का इस्तेमाल वह नहीं कर पाईं थीं. वहीं ड़ा. रक्माबाई ने पहली पेशेवर भारतीय महिला डाक्टर होने का गौरव हासिल किया. ड़ा रक्माबाई सिर्फ पहली महिला डाक्टर होने के कारण नहीं जानी जाती हैं.  बल्कि उन्हें उनके उस हिम्मत के लिए याद किया जाता है जिसे दिखलाने का साहस शायद आज की पढी लिखी महिला भी नहीं कर पाती.
रक्माबाई एक ऐसी माँ की बेटी थी जिसकी शादी 14 वर्ष की आयु में हो गयी थी. रुकमाबाई का जन्म उसकी माँ के 15वें साल में हुआ. रक्माबाई के जन्म के दो साल बाद यानी 17 साल की उम्र में वह विधवा हो गयी. इस घटना के करीब 7 साल बाद उन्होंने सखाराम अर्जुन नामक डाक्टर से विवाह कर लिया. सखाराम शिक्षाविद होने के साथ सामजिक बदलाव के हिमायती भी थे.  
समाज के दवाब में आकर रक्माबाई का विवाह 11 वर्ष की आयु में दादाजी भीखाजी के साथ हो गया. उस वक्त के नियमों के अनुसार रुकमाबाई अपने घर में ही रहीं वह अपने पति के घर नहीं गयीं. अपने घर में रह कर उन्होंने अपने सौतेले पिता की सहायता से खुद को शिक्षित करने का प्रयास जारी रखा. उन दिनों हमारा समाज महिला की शिक्षा का हिमायती नहीं था. 
जल्दी ही रक्माबाई को यह आभास हो गया कि उनके पति के विचार उनके विचार से मेल नहीं खाते हैं साथ ही वह एक संदिग्ध चरित्र का व्यक्ति है. यह पता चलने के बाद पढी लिखी और समझदार रुकमाबाई ने इस बंधन भरे सम्बन्ध से आजाद होने की ठान ली.
रक्माबाई अभी स्कूल की छात्रा ही थीं जब उनके पति ने उन्हें अपने साथ ले जाने की मांग रखी. इस इनकार ने जवाब में उनके पति ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की. बॉम्बे हाई कोर्ट ने रक्माबाई के सामने दो विकल्प रखे एक वह  कोर्ट का आदेश मानकर वह अपने पति के साथ चली जाएँ और अगर वह ऐसा नहीं करती हैं तो जेल की सलाखों के पीछे जाना मंजूर करें.
दृढ रक्माबाई ने कोर्ट की इस धमकी के बाद भी पति के साथ जाने से इनकार कर दिया. उनहोंने साफ़ शब्दों में कहा कि पति के साथ जीवन बिताने की जगह उन्हें जेल में रहना मंजूर है. उनके अनुसार नाबालिग उम्र में हुई  शादी से बंधने के लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता है. इनकी इस दलील ने हर किसी को अचरज में डाल दिया, क्योंकि ऐसे  दलील उस समय न सुनी गयी थी और न ही इसकी कल्पना की गयी थी. यह 19वीं सदी का सबसे प्रचलित और अनोखा केस था. इसने ब्रिटिश प्रेस का ध्यान भी बाल विवाह और महिला के अधिकारों की तरफ खींचा था.
बेहरामजी मालाबारी, महादेव  गोविन्द रानाड़े जैसे सामाजिक कार्यकर्ता सामने आये और रुकमाबाई के पक्ष में खड़े हुए. इस मसाले पर उस समय की शिक्षाविद और महिलाओं को बंधन से मुक्ति दिलाने के क्षेत्र में काम करने वाली पंडिता रमाबाई ने नाराजगी के साथ लिखा था  
सरकार शिक्षा और उद्धार की हिमायती है. किन्तु जब एक स्त्री ने गुलामी स्वीकार करने से इनकार किया तो वही सरकार उस औरत की हिम्मत को तोड़ने की कोशिश में तल्लीन नजर आई. साथ ही इसने अपने क़ानून का इस्तेमाल उस औरत को बांधने ने लिए किया. “
इन सबकी पहल से इस केस का निपटारा कोर्ट के बाहर ही हो गया और रक्माबाई जेल जाने से बच गयीं. लेकिन इस दृढ और स्वभिमानी महिला ने किसी भी तरह की आर्थिक सहायता को लेने से इनकार कर दिया, यहाँ तक कोर्ट का खर्च का भुगतान भी उन्होंने खुद किया.
रक्माबाई ने आगे मेडिकल की शिक्षा प्राप्त करना तय किया. बॉम्बे के कामा अस्पताल के ब्रिटिश डारेक्टर Edith Pechey Phipson की मदद से उनहोंने अंगरेजी सीखा. 1889 में वह लन्दन चली गयीं और वहां के London School of Medicine for Women में मेडिसिन की पढाई पूरी की. अपनी पढाई पूरी कर ड़ा.रक्माबाई सूरत की  चीफ मेडिकल आफिसर के रूप में भारत वापस आई. यहाँ आ कर उनहोंने महिला डाक्टर के रूप में इस पेशे को आगे बढाया साथ ही बाल विवाह और महिलाओं की पर्दा प्रथा के खिलाफ आवाज उठाती रहीं. इन्होने दुबारा शादी नहीं की और 91 साल की उम्र तक महिलाओं को जागरूक करने के क्षेत्र में काम करती रहीं.   



जानकी अम्मल एड्वालेथ कक्कट

भारत की पहली महिला वनस्पति शास्त्री

जानकी अम्मल एड्वालेथ कक्कट एक ऐसा नाम जिसने एक ऐसा मुकाम हासिल किया जसके बारे में उनके समय की महिलायें सोच भी नहीं सकती थी.

जानकी एक अद्भुत व्यक्तित्व. भारत की आजादी के काफी पहले ही इन्होंने संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से स्नाकोत्तर की उपाधि प्राप्त कर ली थी. यह उस जमाने की बात है जब भारत की महिलायें घर से बाहर झांकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाती थी. जानकी अम्मल ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए घर ही नहीं बल्कि देश की चाहरदीवारी/ रक्षा-कवच से बाहर कदम रखा.

जानकी निडर महिला.1940-45 के दौरान इंगलैंड पर जर्मनी के द्वारा हुई बमबारी के दौरान जिस महिला ने शान्ति पूर्वक अपना शोध  कार्य जारी रखा था उसे निडर ही तो कहा जा सकता है. जी हाँ उस दौरान वह इंग्लैण्ड में ही थी. बमबारी के दौरान वह अपने कमरे में बिस्तर के नीचे बैठ पढ़ने लिखने का काम किया करती थीं और बमबारी रुकने पर प्रयोगशाला में जाकर प्रयोग और अन्य काम, ऐसी हिम्मत और लगन शायद ही देखने मिलती है.  

एक दलित वर्ग की भारतीय महिला पूरे विश्व में वनस्पति-शास्त्र के ज्ञाता के रूप में उन दिनों जानी जाती थीं जब विज्ञान के क्षेत्र में सिर्फ पुरुषों का दबदबा था. भारतीय महिलाओं ख़ास कर दलित वर्ग की महिलाओं को विज्ञान तो क्या ज्ञान के आस पास फटकने भी नहीं दिया जाता था. अनोखा व्यक्तित्व रहा है जानकी अम्मल का. वनस्पति-शास्त्र में साइटों-जेनेटिक्स (cyto-genetics) इनका पसंदीदा क्षेत्र बना था. इस क्षेत्र में उस काल में एक महिला की पहुंच बने यह अपने आप में एक बड़ी और अकल्पनीय उपलब्धी थी.

केरल के तेलिचेरी की जानकी अम्मल एक बड़े परिवार की सदस्या थीं.  11 भाई-बहन के साथ पली बढीं थी जानकी अम्मल. पिता दीवान बहादुर एडावलथ कक्कट कृष्णन मद्रास प्रेसीडेंसी में सब जज थे. पिता पढाई-लिखाई के महत्व से वाकिफ थे. उस ज़माने में जब बेटियों को रसोई और घर के अन्दर के काम में दक्ष किया करना शान की बात समझी जाती थी इन्होंने अपनी बेटियों के हाथ में किताब कॉपी थमाई. इनकी हर बच्चियों को ऊंची तालीम पाने की छूट थी. लड़कियों ने कला को अपना पसंदीदा क्षेत्र माना था, किन्तु जानकी को वनस्पति शास्त्र से लगाव हो गया. अपनी स्कूली शिक्षा समाप्त करने के बाद जानकी अम्मल मद्रास चली गयीं. वनस्पति शास्त्र से नजदीकियां बढाने के लिए उनहोंने अपनी स्नातक की डिग्री यहाँ के क्वीन मेरी कॉलेज से प्राप्त की.  अपनी यात्रा को आगे बढाते हुए वह प्रेसीडेंसी कॉलेज की छात्रा बनीं और वहां से वनस्पति-शास्त्र में आनर्स की डिग्री प्राप्त की.  इस यात्रा के दौरान  उनका झुकाव साइटों-जेनेटिक्स (Cyto-genetics) की तरफ हो गया. यह जीव-विज्ञानं की एक ऐसी शाखा है जी कोशिका विज्ञान के साथ प्रजनन के सिद्धांत को जोड़ती है और इसकी मदद से जीव जगत की अनेक उलझनों की गाँठ को खोला जा सकता है.  
भारतीय गन्ने की मिठास का श्रेय जानकी अम्मल को ही जाता है. भारत गन्ने का प्रमुख उत्पादक माना जाता है किन्तु भारतीय गन्ने में वह मिठास नहीं थी जो पेरू के गन्ने में मिलती थी. भारत के कोइमबटूर (COIMBATOOR) में वैज्ञानिकों ने भारतीय गन्ने को मीठा करने का प्रयास शुरू किया था. पेरू के गन्ने और भारतीय गन्ने के बीच प्रजनन करा तीसरी प्रजाति उत्पन्न करने की कोशिश हो रही थी जहां पेरू के गन्ने की मिठास और भारतीय गन्ने की दृढ़ता साथ साथ मौजूद हो. वैज्ञानिक की इस टीम में जानकी अम्मल को भी शामिल किया गया. इन्होने अपने cyto-genetics के ज्ञान का प्रयोग किया और भारतीय गन्नों में ऐसी मिठास भरी जिसके कारण आज वह विश्व में जाना और माना जाता है.

गन्ने की इस मिठास ने जानकी अम्मल को सन 1940 में लंडन के जॉन इन्नस होरटीकलचरल इंस्टिट्यूट पहुंचा दिया. वह पहली वेतनभोगी महिला वैज्ञानिक थी जिन्हें यहाँ स्थान मिला था. यह उनकी यात्रा की शुरूआत थी. इसके बाद उनहोंने पीछे मुड कर नहीं देखा. यहाँ उन्हें विश्व के जाने माने वैज्ञानिक का साथ मिला. सी डी डार्लिगटन के साथ मिल कर उनहोंने Chromosome Atlas of Cultivated Plants नामक पुस्तक की रचना की.

अपने इस रुझान के साथ जानकी अपने देश की पर्यावरण संबंधी समस्यायों को लेकर भी काफी सचेत और सक्रिय थीं. 1940 में चल रहे grow more food compaign के दुस्प्रभाव को लेकर भी वह चिंतित थी. जल ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए केरल की कुंथिपुज्हा नदी पर बन रहे बाँध का विरोध उनहोंने जैम कर किया था. अपने इस विरोध की चर्चा उनके सी डी डार्लिंगटन और पंडित नेहरू को लिखे गए उनके पत्रों में मिलती है.

गन्ने की मिठास ही नहीं बल्कि यूरोप में फलते फूलते Magnolia kobus Janaki Ammal भी इनकी विद्वता की एक मिसाल है. इस फूल का अनोखा रूप जानकी अम्मल के द्वारा ही दिया गया था.
वनस्पति शास्त्र में अपना एक मुकाम हासिल करने वाली जानकी अम्मल काफी सरल और सीधे सादे तरीके से जीवन बिताने वाली महिला थीं. अपनी जमीन से उनका एक ख़ास लगाव था. लन्दन में उनके कार्य काल के दौरान एक बार उनहोंने एक चायनीज कलाकार की पेंटिंग देखी, उस चित्र में भूरे पृष्ठभूमि में चांदी की तरह चमकता चम्पा का फूल नजर आ रहा था. चम्पा की डालियों पर पर लम्बी पूंछ काला ड्रोंगो (कोतवाल) पक्षी बैठा था. कलाकार उस पक्षी को अच्छे भाग्य का वाहक बता रहा था. जानकी अम्मल ने अपनी नातिनियों के पास इस घटना की चर्चा करते हुए कहा था, उस पेंटिंग को देख मुझे लगा था अब घर जाने का समय आ गया है.

उनकी इस अनुभूति और इच्छा को पंडित नेहरू के निमंत्रण ने पूरा कर दिया. पंडित नेहरू ने जानकी अम्मल को भारत बुलाया और उन्हें Botanical survey of India की चाभी थमा दी. सन 1951 में वह भारत वापस आई और सन 1957 में उन्हें पद्म भूषण की उपाधी से नवाजा गया. इतना ही नहीं सन 2000 में भारत के पर्यावरण और वन विभाग ने वर्गीकरण विज्ञान (Taxonomy) की राष्ट्रीय उपाधी को  1897 में जन्मी जानकी अम्मल के नाम से सुशोभित किया.


Monday, 2 January 2017

जड़ और फफूंद

जड़ और फफूंद की दोस्ती

पेड़ पौधों की दुनिया में ताका झांकी कई ऐसे मसलों को सामने लाता है जिसे देख एक बार यह कहने का मन होता है, “उफ़ यहाँ भी.” जी हाँ, अपने आप को सामाजिक प्राणी समझने वाले मनुष्य को पेड़ पौधों के सामाजिक व्यवहार पर गौर फरमाना चाहिए. जंगल में ऊंचें सर उठाये पेड़ एक दूसरे से कंधे से कंधा मिलाये खड़े नजर आते हैं, गलबहियां डाले झूमते इठलाते दिखाई पड़ते है लेकिन इन सबके साथ धूप और हवा के लिए आपस में इनका संघर्ष भी अनदेखा नहीं रहता है. दोस्ती दुश्मनी एक स्वस्थ्य और वृद्धि दर्शाने वाले समाज का द्योतक होता है, इसलिए इसे हर सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक अंग तो होना ही है. जमीन के ऊपर इनकी दोस्ती-दुश्मनी तो नजर आती है लेकिन क्या आपको पता है  जमीन के अन्दर भी जबरदस्त साझेदारी (हर तरह की) चलती रहती है.

इस बात से तो हम सब वाकिफ हैं कि जमीन के अन्दर की दुनिया भी काफी दिलचस्प है. यहाँ भी इन पेड़ पौधों ने अपना साम्राज्य फैला रखा है अपनी जड़ों के रूप में. कहते हैं न जितना यह जमीन के ऊपर हैं उतना ही नीचे तभी तो इनके चहरे पर यह गौरव नजर आता है. जड़ों की शाखाएं, उन शाखाओं से निकलते पतले पतले रोम जमीन की हर परत की मिट्टी और उनमें पाए जाने वाले जीव जंतुओं की तरफ दोस्ती का हाथ बढाती है. जितने दूर तक इनकी पहुँच होती है उतना पानी और खनिज पौधों के विभिन्न भाग तक पहुँच पाता है. इसलिए इनका फैलाव और दोस्ती काफी मायने रखती है. यहाँ हम जमीन के अंदर के एक ख़ास हमराही की बात करेंगें. यह हमराही अनेक रूप में हमारे आस पास मौजूद हैं. इनका नाम है फफूंद. यह क्या नाम सुनते ही आपकी नाक सिकुड़ गयी,  नाक मत सिकोड़ लीजिये. आईये यहाँ हम इन फफूंद और पेड़ पौधों के रिश्ते पर एक नजर डालते हैं. 

फफूंद जीवित जगत का एक ऐसा सदस्य है जिसे हम आमतौर पर हानिकारक समझते हैं. यह जीवित तो हैं किन्तु इन्हें न तो पेड़ पौधों के साथ रखा जाता है न ही जानवरों की दुनिया में जगह मिलती है. कारण है इनका अनोखा स्वभाव और रंग रूप.    इनकी कोशिकाओं के पास पौधों की कोशिकाओं  की तरह कोशिका की दीवार तो होती है किन्तु यहाँ यह काइटीन (Chitin) की बनी होती है, हमें पता है कि पौधों की कोशिका की दीवार सेल्लुलोज़ की बनी होती है. काइटीन तो कीड़ों के शरीर को बनाती है. इतना ही नहीं यह फफूंद खुद से खाना बनाना पसंद नहीं करतीं, इन आलसियों को भी दूसरे जीवित और मुर्दा पदार्थ से खाना लेना पसंद है. अब सोचिये इन्हें पौधे या जानवर समूह में शामिल करना मुमकिन है?  तो कुल मिला कर कहें तो यह एक ख़ास समूह का निर्माण करते हैं, फफूंद समूह.

इस समूह के सदस्य दूसरों से खाना लेकर काफी तेजी से बढ़ते हैं. अपने पतले पतले रेशों (Mycelium) की मदद से जाल जैसी संरचना का निर्माण करते हैं, यह जाल काफी दूर तक फ़ैल सकती है. जमीन के अंदर की अंधेरी नमी और गर्माहट से भरपूर दुनिया इन्हें बढ़ने, मुस्कुराने, खिलखिलाने में बहुत सहायक होती है. इतना ही नहीं इस माहौल में वह पेड पौधों की जड़ों के रूप में अपना साथी भी ढूंढ लेते हैं. गहरी छनती है दोनों के बीच. हर पेड़ पौधा या दूसरी तरह कहें तो हर फफूंद अपने हिसाब से साथी ढूंढ लेते हैं. अपने इस साथी से साथ निभाने के लिए इन जड़ों को खुद को इन साथी के लिए बिल्कुल खुला छोड़ना होता है. मेरा मतलब है फफूंद के इन मुलायम पतले पतले रेशों को जड़ के पतले पतले रेशों के अन्दर जाना जो होता है. हाँ यह फफूंद के रेशे अपना आशियाना जड़ के रेशों के अन्दर बनाते हैं. लेकिन वह सिर्फ जड़ों के इन रेशों के अन्दर ही नहीं रहते बल्कि इन जड़ के ऊपर फैलकर उन्हें पूरी तरह ढकते नजर आते हैं. अब इनके इस साथ से पेड़ पौधों को दर्द होता है या नहीं इसकी जानकारी तो हमें नहीं है किन्तु इतना हमें पता है कि इस दोस्ती को पेड़ पौधे की जड़ खुशी खुशी स्वीकार करते हैं. स्वीकार तो करना है ही आखिरकार यह फंफूंद जमीन के अन्दर से पानी के साथ साथ फासफोरस, नाइट्रोजन जैसे खनिज सोंख कर इन जड़ों यानी पेड़ पौधों को देता है. वैज्ञानिकों ने इस बात की जांच की है. अपनी जांच में हमारे वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसे पेड़ जिनकी जड़ों की दोस्ती इन फफूंद से हो गयी है के पास पानी और खनिज रूपी खजाना अधिक होता है, इसके फलस्वरूप वह अधिक स्वस्थ्य होते हैं साथ ही अधिक मात्रा में शर्करा आदि का निर्माण भी कर लेते हैं. यानी दोस्ती में फायदा तो है.

आगे कहानी सुनो पौधों की जड़ों के अन्दर विचरण करने के साथ यह फफूंद जड़ों के बाहर भी टहलते घूमते नजर आते हैं. टहलते घूमते यह आस पास का समाचार भी इकठ्ठा करते नजर आते हैं. बहुत तकड़ी नेटवर्किंग होती है इनकी. आस पास के समाचार जैसे कोई हानिकारक जीव जंतु या कीड़े मकौड़े जैसे घुसपैठिये या फिर लाभदायक पदार्थ की उपस्थिति की जानकारी तो चुटकियों में इकठ्ठा कर लेते हैं और अपने साथी को सतर्क कर देते हैं. इतना ही नहीं अगर जमीन में उर्वरक यानी नाइट्रोजन आदि कम हों तो कुछ ऐसे रसायन का स्त्राव करते हैं जिससे जमीन में मौजूद कीड़े मकौड़े मर जाते हैं और उनके शरीर में उपस्थित नाइट्रोजन आदि पेड़ पौधों को मिल जाते हैं. कितने सच्चे दोस्त हैं.

दोस्ती तो है लेकिन ऐसी सूखी सूखी दोस्ती तो कम ही नजर आती है. इन फफूंद की  भी कुछ जरूरते होती हैं. अब अपनी इन सेवाओं के बदले यह इन पौधों से शर्करा और अन्य कार्बोहाइड्रेट के रूप में खाद्य पदार्थ माँगते हैं तो क्या गलत करते हैं. इनकी डील के मुताबिक़ पेड़ पौधे प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा जितनी भी शर्करा (मंड)  तैयार करेंगे उसका एक तिहाई इन फफूंद का होगा. सही है इतना तो बनता है. शायद कुछ ज्यादा ही बनता हो. क्योंकि यह फफूंद जिन्हें आमतौर पर हम हानीकारक मानते हैं हमारे पौधों के लिए काफी लाभदायक नजर  आ रहे हैं.  इनकी तरफ से कुछ बोनस तोहफे भी मिलते हैं इनके साथियों को. यह अनेक हानिकारक तत्व जैसे heavy-metals को पौधों की जड़ों से दूर रखते हैं.  उन्हें अपने साथियों की जड़ों में घुसने नहीं देते. बोनस यहाँ खत्म नहीं होता हानिकारक जीवाणु, फफूंद को भी भगा अपने दोस्त उनके वार से बचा लेते हैं ये सिपाही.  वाकई अच्छी दोस्ती निभाते हैं.

हमारे यह फफूंद साथी काफी संवेदनशील होते हैं. हर किसी से दोस्ती करना इन्हें नहीं भाता. ख़ास तरह के फफूंद ख़ास तरह के पेड़ पौधों से ही दोस्ती करते हैं. हाँलाकि अनेक  बार ऐसा भी होता है एक फफूंद को एक से अधिक किस्म के पेड़ पौधों का साथ पसंद आ जाता है. ऐसे में वह किसी को भी अपना साथी बना लेते हैं. एक बार साथ हो गया तो वह जल्दी छूटता नहीं है. आमतौर पर दोस्ती की लम्बी पारी खेलते नजर आते हैं यह फफूंद परन्तु अगर माहौल अच्छा न हो (प्रदूषण) तो यह फफूंद दम तोड़ देते हैं. किन्तु किसी के जाने से जिन्दगी कहां रुकती है.  इन फफूंद के दोस्त पेड़ अधिक दिन तक शोक मनाते नजर नहीं आते. जल्दी ही वो पुन: उपयुक्त साथी ढूंढ लेते हैं और उनके साथ अपना लेन-देन शुरू कर देते हैं. आखिरकार उनके पास एक से अधिक विकल्प जो मौजूद होते हैं.