Sunday, 8 January 2017

हवा को बहने दो

हवा और क्लौउस्क

बहुत पुरानी बात है समुद्र के किनारे स्थित लकड़ी के बने घर में क्लौउस्क नामक लड़का अपनी दादी के साथ रहता था. एक दिन क्लौउस्क समुद्र के किनारे टहल रहा था, उसकी नजर समुद्र में तैरती बतखों पर पड़ी. शिकार करना चाहिए यह सोच कर क्लौउस्क ने तीर धनुष कंधे पर टांगा और अपनी नन्ही सी कश्ती को पानी मे उतार लिया. अपनी नन्ही कश्ती को चप्पू की मदद से खेते हुए क्लौउस्क बतखों की तरफ बढ़ चला. मस्ती में वह अपना पसंदीदा गाना गुनगुना रहा था. वह आगे बढ़ रहा था अब अधिक दूरी नहीं थी. अचानक तेज हवा आई जिसने उसे पीछे धकेल दिया. हाय, इस हवा ने तो उसे फिर से किनारे पर पहुंचा दिया. थोड़ी झुंझलाहट हुई. लेकिन उसने फिर से चप्पू का सहारा लिया और कश्ती को आगे बढाया. इस बार उसके हाथ तेजी से चल रहे थे और वह उसका गाना भी दूर तक गूँज रहा था. हाँ, दूरी घट रही थी अब थोड़ी देर में वह निशाना साधेगा, लेकिन यह क्या! फिर से हवा का झोंका आया और वह वापस किनारे पहुंच गया. क्लौउस्क ने अनेक बार कोशिश की किन्तु  बार बार हवा ने उसे  पराजित कर दिया.

थका हारा, झुंझलाया क्लौउस्क अपनी दादी के पास गया और उसने दादी से पूछा आखिरकार यह हवा आती कहां से है. दादी ने आश्चर्य से पूछा आखिर क्या बात है ? क्लौउस्क ने कहा मुझे जानना है बस. दादी को पता था जब तक क्लौउस्क को उसके प्रश्न का जवाब नहीं मिलेगा वह प्रश्न पूछता रहेगा. दादी ने उसे बताया, “ यहाँ से काफी दूर अनेक पहाड़ियां हैं. उनमें से सबसे ऊंची वाली पहाडी पर वुसोवेन नामक  एक पक्षी रहता है. उसके पंखों की फडफड़ाहट से यह हवा बनती है. वह जितनी जोर से पंख फड़फड़ायेगा उतनी ही तेज हवा बहेगी. इतना सुनने के बाद क्लौउस्क ने अपनी दादी से उस जगह का पता पूछा. उसके इस प्रश्न के जवाब में दादी ने कहा, “हवा का रुख करो और उसकी दिशा में चल पड़ो. तुम पक्षी तक पहुंच जाओगे.”

क्लौउस्क ने अपनी यात्रा शुरू कर दी. जंगल, झाडी, उबड़ खाबड़ सड़क पार करते हुए वह हवा की दिशा में बढ़ता जा रहा था. हवा तेज थी. लेकिन वह आगे बढ़ते गया. आखिरकार वह पहाड़ियों तक पहुंच गाया. एक पहाडी, दो पहाडी पार कर वह सबसे ऊंची पहाडी तक पहुंच गया. पहाडी से बढ़ती निकटता तेज हवा को निमंत्रण दे रही थी. हवा इतनी तेज हो चुकी थी कि उसके कपडे फट गए. लेकिन उसने हार नहीं मानी. क्लौउस्क ने सबसे ऊंची पहाड़ी की चढ़ाई भी शुरू कर दी और अंतत: चोटी पर पहुंच गया. लेकिन वहां हवा के थपेड़े और भी भारी थे. क्लौउस्क के सर के बाल उस थपेड़े को बर्दास्त नहीं कर पाए और सर का साथ छोड़ दिया. वहाँ पहुंच अपनी बंद होती आँख पर हाथ रखते हुए क्लौउस्क ने गहरी सांस ली और आवाज लगाई प्यारे दादाजी

उसकी पुकार सुन पहाडी पर बैठे बड़े से पक्षी ने अपने पंख को रोक दिया और पूछा “किसने मुझे दादा जी कहा.” 

क्लौउस्क ने अदब से कहा, “मैंने आपको आवाज दी.”

“क्यों” पक्षी ने पूछा

“आप हवा बनाने का इतना अच्छा काम कर रहे हैं कि मुझसे रहा नहीं गया, मैं आपसे मिलने आ गया.” क्लौउस्क ने शान्ति से कहा.

यह सुन कर पक्षी का सीना फूल गया, उसने अपने पंखों को और जोर से फड़फडाना शुरू कर दिया. इतनी तेज हवा चली कि क्लौउस्क तो पहाडी से लगभग गिर ही गया था.

खुद को सम्भालते हुए क्लौउस्क ने कहा, “लेकिन मुझे ऐसा लगता है दादा जी अगर आप बगल वाली पहाडी पर चले जायेंगे तो आपका काम और अच्छा हो जाएगा.” 
.
“ऐसा है!” लेकिन मैं अपने भारी पंख के कारण उड़ कर वहां तक नहीं जा सकता.” पक्षी ने थोड़े उदास स्वर में कहा.

“आप चिंता क्यों करते हैं, मैं हूँ न.” शाहरुख खान के अंदाज में क्लौउस्क ने पक्षी की तरफ सहायता का हाथ बढ़ाया.

“अपने साथ लाये बेल्ट के सहारे पक्षी को अपनी पीठ पर बिठा क्लौउस्क दूसरी पहाडी की तरफ चल पडा. थोड़ा आगे बढ़ने के बाद क्लौउस्क ने जान बूझ कर पक्षी को दोनों पहाड़ियों के बीच के गड्ढे में गिरा दिया. इसके बाद वह घर आ गया. रास्ते में उसे कहीं भी हवा नहीं मिली. समुद्र की लहरें भी एकदम शांत नजर आई. पेड़ पौधे सब बुझे बुझे नजर आ रहे थे. समुद्र के  आस पास बतख भी नजर नहीं आ रहे थे. चिड़ियाँ, जानवर सब शांत हो गए. समुद्र के पानी में भी झाग जैसा बनने लगा यहाँ तक कि उसे भी अच्छा नहीं लग रहा था. उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि आखिरकार यह क्या हो रहा है. घबराकर उसने दादी से पूछा, “यह क्या हो रहा है, ऐसा क्यों हो रहा है?”
दादी ने मुस्कुराकर कहा, “तुमने यही चाहा था, अब तुम्हें क्या परेशानी है?’

“मतलब, मैं ऐसा क्यों कहूंगा.” क्लौउस्क ने परेशान होकर कहा .

“तुमने ही तो हवा के बहाव को रोका है. अब हम सब के पास कम हवा आ रही है. हमें ज़िंदा रहने के लिए हवा की जरूरत होती है. सांस लेने के लिए हवा जरूरी है, हवा के बहने से बीज आदि इधर उधर जा सकते हैं. पानी के अन्दर की जिन्दगी मुस्कुराती है. इसके बिना सब कुछ खत्म हो जाएगा.” दादी ने स्थिति की गंभीरता से क्लौउस्क को अवगत कराया.
यह सुन क्लौउस्क को अपने काम पर पछ्तावा होने लगा. जिस रास्ते से वह आया था उसी रास्ते वापस हो गया. चलते चलते उसके बाल भी वापस आ गए. पहाडी पर पहुंच कर उसने आवाज लगाई, “अंकल, आप कहां हैं?’

“किसने मुझे आवाज दी, मुझे अंकल कहा” गड्ढे से पक्षी ने कहा.

“अरे यहाँ आपको किसने डाल दिया.” क्लौउस्क ने अचरज दिखाया.

“एक फटे कपडे, बिना बाल वाला व्यक्ति आया था उसने मुझे यहाँ गिरा दिया.” पक्षी  ने गुस्से से कहा.

“कोई बात नहीं, मैं आपको वापस निकलता हूँ.” क्लौउस्क ने पक्षी को गड्ढे से निकाल दिया और पहाड़ की चोटी पर वापस बिठा दिया.

“अंकल एक निवेदन करूं.” क्लौउस्क ने हिचकते हुए कहा.

“हाँ, कहो” पक्षी ने अपने पंख फैलाते हुए कहा.

“अंकल, आप अपने पंख हमेशा एक जैसी तेजी से मत चलाईयेगा. कभी तेज तो कभी धीमी गति होगी तो अधिक अच्छा लगेगा.

“ठीक है. ऐसा ही होगा.” पक्षी ने धीमे धीमे पंख चलाना शुरू कर दिया था.

क्लौउस्क मुस्कुराकर पहाड़ से उतर आया. पेड़ पौधे, चिड़ियाँ, जानवर यहाँ तक कि समुद्र की लहरें मुस्कुराकर उसका स्वागत करती नजर आईं.
   
----नार्थ अमेरिकन इन्डियन की कहानियों के खजाने से 

No comments:

Post a Comment