चुम्बक और
चुम्बकत्व
लोड स्टोन नामक पत्थर से हमारा परिचय हजारो साल पुराना है. इसकी अजीबो
गरीब आदत ने शुरूआती दिनों में हमें बहुत परेशान किया था. अब किसी द्वीप की तरफ
अगर लोहे की कोई नाव खुद ब खुद खिंची चली जाए और समुद्र में डूब आ जाए तो इसे हम प्रेत
और भूत का काम ही मानेंगे. यह तो हमें बाद में पता चला कि यह काम दरअसल उस द्वीप पर पाया जाना वाला पत्थर जिसे
हम लोड स्टोन के नाम से जानते हैं कर रहा है. हाँ, बहुत विचित्र गुण है उसके पास
लोहा या लोहे से बनी चीजों को वह अपनी ओर खींच लेता है. काफी दूर तक इसकी यह ताकत
अपना असर दिखाती है. इतना जरूर है कि एक बड़ा पत्थर अधिक दूर से लोहे या उससे बने
सामान को अपनी तरफ खींचता है जबकि एक छोटे पत्थर की ताकत कम होगी.
भला हो मैग्नस नामक गड़ेरिये का जिसने लोहे की कील वाला जूता पहन रखा था और हाथ
में लोहे की पेंदी वाला डंडा पकड़ रखा था. इस कहानी से तो हम सब परिचित है कि
मैग्नस नामक गड़ेरिया अपनी भेंड चराने निकला था. रास्ते में उसे एक काले रंग का बड़ा
सा पत्थर पडा मिला. उसकी भेंड उस पत्थर पर चढ़ गयीं. अपनी भेंड के पीछे पीछे मैग्नस
भी उस पत्थर पर चढ़ गया. मगर यह क्या वह अपना दूसरा कदम उठा ही नहीं पा रहा था और न
ही अपने डंडे को उठा पा रहा था. यह क्या हुआ सोच सोच आकर वह परेशान हो गया था.
उसके जूते तो जैसे पत्थर से चिपक गए थे वही हाल उसके डंडे का था. जूता और डंडा छोड़
कर मैग्नस पत्थर से नीचे उतारा.
लेकिन उसके साथ हुए इस हादसे ने एक ऐसे पत्थर से परिचित करा दिया जिसके
पास लोहे और उससे बनी चीज को खुद की तरफ खींचने की ताकत है. फिर क्या इस पत्थर के
छोटे छोटे टुकडे काम में आने लगे. इसका नाम पडा मैगनेट (मैग्नस चरवाहा या फिर
मिश्र के शहर मैग्नेसिया के नाम पर. जहां
इस पत्थर का खजाना है शायद). जब वैज्ञानिक
ने इस पत्थर के स्वभाव की जांच की तो पता चला कि दरअसल यह लोहे का आक्साइड है
(Ferrous oxide). यहाँ एक बात और स्पष्ट कर दूं कि मिश्र देश के साहित्य में इस
कहानी का उल्लेख 500 ईसा पूर्व के दस्तावेज में मिलता है जबकि हमारे चीन देश के
वाशिंदे इस पत्थर से अपना परिचय इससे भी पहले का बताते हैं. चीन के दस्तावेज के
अनुसार 2500 ईसा पूर्व एक चीन के एक जनरल ने गहरे कोहरे में अपनी सेना को दिशा
बतलाने के लिये लोडस्टोन के से मदद ली थी.
उन्हें पता था कि इस पत्थर के टुकडे को लटकाने पर यह हमेशा उत्तर-दक्षिण दिशा की
तरफ रुख करेगा. बस इस पत्थर के गुण का उपयोग कर गहरे कोहरे में भी उनकी सेना आगे
बढ़ चली थी. इतना ही नहीं लोडस्टोन के पतले पतले टुकड़ों को पानी पर रख नाविक भी
दिशा का पता लगा लेते थे. वाकई जादुई पत्थर है हमारा लोड स्टोन. आर्कीमिडीज ने तो
इस पत्थर का इस्तेमाल कर दुश्मन के नाव के कील निकाल दिए और उन्हें डुबो दिया.
कमाल का पत्थर है यह. इतना ही नहीं चीन के निवासियों ने यह भी बताया कि
अगर किसी लोहे की सूई को पीटा जाए तो वह भी चुम्बक के गुण दर्शाने लगता है. इस तरह
उन्होंने पहली चुम्बकीय सूई भी तैयार कर
डाली जिसकी मदद से नाविक दिशा की जानकारी लेते थे. उनकी इस खोज की खबर अरब के व्यापारियों को मिल
गयी, वहां से यूरोप के व्यापारियों तक खबर पहुंची और फिर इस जादुई सूई का इस्तेमाल
चल पडा. यूरोप के 1269 के दतावेज में इसके उपयोग की चर्चा है.
इस खोज ने नाविकों को अपना दायरा बढाने में सहायता की. अब वह अधिक दूरी
तय करने लगे. पहले उन्हें सूर्य पर आश्रित रहना पड़ता था जो अक्सर धोखा देता था. अब
दिशा बोध के मामले में सूर्य की जरूरत ख़त्म हो चुकी थी.
लेकिन अभी यह पहेली तो बनी ही थी कि आखिरकार यह
सूई उत्तर-दक्षिण का रुख क्यों करती है. यह जवाब हमें 1600 ई. में मिला जब विलियम
गिल्बर्ट जो क्वीन एलिज़ाबेथ कॉलेज में डाक्टर थे, ने यह बताया कि हमारी पृथ्वी एक
बहुत बड़ा चुम्बक है. आप कहेंगे कि उन्होंने कह दिया और हम मान लें. लेकिन हम यहाँ
जान लें कि उन्होंने यूं ही नहीं कहा, अनेक प्रयोग उनकी इस बात का आधार बने. पहले तो इस सूई को अनेक तरह से घुमा कर टांगा
गया, हर बार सूई एक ही स्थिति में रुकती
थी. इस खेल में उनका ध्यान इस तरफ गया कि यह सूई का उत्तरी ध्रुव थोड़ा सा नीचे
धरती की ओर झुका होता है. यह देख उन्हें कुछ सूझा और उन्होंने लोड स्टोन की मदद से
पृथ्वी का नमूना तैयार किया और फिर अपने विचार की जांच की. अपने प्रयोग से उन्हें
यह विश्वास हो गया कि पृथ्वी एक बहुत बड़े चुम्बक की तरह व्यवहार करता है. और
पृथ्वी के इस गुण के कारण चुम्बक के दोनों छोर हमेशा ऊत्तर और दक्षिण दिशा की तरफ
रुख करते हैं. चुम्बक के गुणों को परखते समय हमने यह पाया था कि अगर दो चुम्बक को
साथ साथ रखा जाए तो वह कुछ व्यवहार करते हैं. जी हाँ अगर दोनों चुमबक के सामान
ध्रुव मान लो उत्तर दिशा की तरफ रुख करने वाले ध्रुव आस पास होंगे तो दोनों चुमबक
एक दूसरे से दूर भागेंगे जैसे पुरानी दुश्मनी हो. वहीं अगर विपरीत ध्रुव यानी एक
चुम्बक का उत्तरी ध्रुव और दूसरे का दक्षिण ध्रुव आमने सामने या पास हो तो दो
पुराने दोस्तों की तरह कंधे से कंधा मिला खड़े हो जायेंगे. है न मजेदार बात. हाँ तो
पृथ्वी के चुम्बक का उत्तरी ध्रुव हमारे
चुम्बक के पश्चिमी ध्रुव की तरफ और पृथ्वी
का पश्चिम ध्रुव हमारे चुम्बक के उत्तरी ध्रुव की तरफ होता है. सच में कितना बड़ा
राज था यह. देखते हैं और न जाने कितने रहस्य से हमें रु ब रु कराएगा यह चुम्बक और
इसके चुम्बकीय गुण.
सचमुच इतना ही काफी नहीं था अभी कुछ और चीजें
थीं जिनका पता चलना बाकी था. 1819 में वैज्ञानिक हंस क्रिसटीशियन अपने दोस्तों को
बिजली की धारा से पैदा होने वाली गर्मी के बारे में बता रहे थे. इस बात को बताने
के लिए उन्होंने बिजली के तार में बिजली की धारा बहाई थी अचानक तार के पास पड़ी
चुम्बकीय सूई में हलचल दिखी. सूई घूम गयी थी. सब आश्चर्य में पड़ गए लेकिन साथ ही
यह भी पता चल गया कि बिजली की धारा के पास भी चुम्बकीय गुण हैं.
जल्द की यह भी पता चल गया कि अगर किसी लोहे के
टूकडे के चारो तरफ बिजली का तार लपेट दो और उसमें बिजली की धारा बहाई जाए तो वह
लोहा चुम्बकीय गुण दर्शाता है. इस चुम्बक को हमने विद्युत् चुम्बक नाम दिया. 1831
में तो इस विद्युत् हुम्बक की मदद से एक लिफ्ट बन कर तैयार हो गया जो तकरीबन 1 टन
का भार उठा सकता था. माइकेल फैराडे नामक अंग्रेज वैज्ञानिक को इस चुम्बकीय गुण में
बहुत सी संभावनाएं नजर आने लगीं और उन्होंने
यह भी पता कर लिया कि अगर तार के लूप यानी कुण्डली के अन्दर एक चुम्बक रखा
जाए और उसे तेजी से घुमाया जाए तो तार में बिजली की धारा दौड़ पड़ेगी. अब उनकी इस
खोज ने ही तो हमें बजली के मोटर और जेनेरेटर बनाने की प्रेरणा दी. कितने काम का यह
मोटर, जेनेरेटर न जाने कितनी चीजें इनकी सहायता से काम करती हैं.
इन सब खोज के बाद हमारा तकनीकी संसार काफी तेजी
से तरक्की करने लगा था. इस तकनीकी संसार को देखो तो मन में सवाल उठता है अगर हमने
चुम्बक और चुम्बकीय गुण को नहीं पहचाना होता तो यह पंखा, रेडियो, छोटे छोटे
खिलौनों से लेकर कारखानों में लगी बड़ी बड़ी मशीन की कल्पना भी कर पाना संभव नहीं
होता. आज चाँद और अंतरिक्ष की सैर करने वाला मनुष्य भारत से इंग्लैण्ड जाने की
हिम्मत भी नही करता.
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