जड़ और फफूंद की
दोस्ती
पेड़ पौधों की दुनिया में ताका झांकी कई
ऐसे मसलों को सामने लाता है जिसे देख एक बार यह कहने का मन होता है, “उफ़ यहाँ भी.”
जी हाँ, अपने आप को सामाजिक प्राणी समझने वाले मनुष्य को पेड़ पौधों के सामाजिक
व्यवहार पर गौर फरमाना चाहिए. जंगल में ऊंचें सर उठाये पेड़ एक दूसरे से कंधे से
कंधा मिलाये खड़े नजर आते हैं, गलबहियां डाले झूमते इठलाते दिखाई पड़ते है लेकिन इन सबके साथ धूप और हवा के लिए आपस में इनका संघर्ष भी अनदेखा नहीं रहता है. दोस्ती
दुश्मनी एक स्वस्थ्य और वृद्धि दर्शाने वाले समाज का द्योतक होता है, इसलिए इसे हर
सामाजिक व्यवस्था का आवश्यक अंग तो होना ही है. जमीन के ऊपर इनकी दोस्ती-दुश्मनी तो
नजर आती है लेकिन क्या आपको पता है जमीन
के अन्दर भी जबरदस्त साझेदारी (हर तरह की) चलती रहती है.
इस बात से तो हम सब वाकिफ हैं कि जमीन के
अन्दर की दुनिया भी काफी दिलचस्प है. यहाँ भी इन पेड़ पौधों ने अपना साम्राज्य फैला
रखा है अपनी जड़ों के रूप में. कहते हैं न जितना यह जमीन के ऊपर हैं उतना ही नीचे तभी
तो इनके चहरे पर यह गौरव नजर आता है. जड़ों की शाखाएं, उन शाखाओं से निकलते पतले
पतले रोम जमीन की हर परत की मिट्टी और उनमें पाए जाने वाले जीव जंतुओं की तरफ
दोस्ती का हाथ बढाती है. जितने दूर तक इनकी पहुँच होती है उतना पानी और खनिज पौधों
के विभिन्न भाग तक पहुँच पाता है. इसलिए इनका फैलाव और दोस्ती काफी मायने रखती है.
यहाँ हम जमीन के अंदर के एक ख़ास हमराही की बात करेंगें. यह हमराही अनेक रूप में हमारे आस पास मौजूद
हैं. इनका नाम है फफूंद. यह क्या नाम सुनते ही आपकी नाक सिकुड़ गयी, नाक मत सिकोड़
लीजिये. आईये यहाँ हम इन फफूंद और पेड़ पौधों के रिश्ते पर एक नजर डालते हैं.
फफूंद जीवित जगत का एक ऐसा सदस्य है जिसे हम आमतौर पर हानिकारक समझते हैं. यह जीवित तो हैं किन्तु इन्हें न तो पेड़ पौधों के साथ रखा जाता है न ही जानवरों की दुनिया में जगह मिलती है. कारण है इनका अनोखा स्वभाव और रंग रूप. इनकी कोशिकाओं के पास पौधों की कोशिकाओं की तरह कोशिका की दीवार तो होती है किन्तु यहाँ यह काइटीन (Chitin) की बनी होती है, हमें पता है कि पौधों की कोशिका की दीवार सेल्लुलोज़ की बनी होती है. काइटीन तो कीड़ों के शरीर को बनाती है. इतना ही नहीं यह फफूंद खुद से खाना बनाना पसंद नहीं करतीं, इन आलसियों को भी दूसरे जीवित और मुर्दा पदार्थ से खाना लेना पसंद है. अब सोचिये इन्हें पौधे या जानवर समूह में शामिल करना मुमकिन है? तो कुल मिला कर कहें तो यह एक ख़ास समूह का निर्माण करते हैं, फफूंद समूह.
फफूंद जीवित जगत का एक ऐसा सदस्य है जिसे हम आमतौर पर हानिकारक समझते हैं. यह जीवित तो हैं किन्तु इन्हें न तो पेड़ पौधों के साथ रखा जाता है न ही जानवरों की दुनिया में जगह मिलती है. कारण है इनका अनोखा स्वभाव और रंग रूप. इनकी कोशिकाओं के पास पौधों की कोशिकाओं की तरह कोशिका की दीवार तो होती है किन्तु यहाँ यह काइटीन (Chitin) की बनी होती है, हमें पता है कि पौधों की कोशिका की दीवार सेल्लुलोज़ की बनी होती है. काइटीन तो कीड़ों के शरीर को बनाती है. इतना ही नहीं यह फफूंद खुद से खाना बनाना पसंद नहीं करतीं, इन आलसियों को भी दूसरे जीवित और मुर्दा पदार्थ से खाना लेना पसंद है. अब सोचिये इन्हें पौधे या जानवर समूह में शामिल करना मुमकिन है? तो कुल मिला कर कहें तो यह एक ख़ास समूह का निर्माण करते हैं, फफूंद समूह.
इस समूह के सदस्य दूसरों से खाना लेकर
काफी तेजी से बढ़ते हैं. अपने पतले पतले रेशों (Mycelium) की मदद से जाल जैसी
संरचना का निर्माण करते हैं, यह जाल काफी दूर तक फ़ैल सकती है. जमीन के अंदर की
अंधेरी नमी और गर्माहट से भरपूर दुनिया इन्हें बढ़ने, मुस्कुराने, खिलखिलाने में
बहुत सहायक होती है. इतना ही नहीं इस माहौल में वह पेड पौधों की जड़ों के रूप में
अपना साथी भी ढूंढ लेते हैं. गहरी छनती है दोनों के बीच. हर पेड़ पौधा या दूसरी तरह
कहें तो हर फफूंद अपने हिसाब से साथी ढूंढ लेते हैं. अपने इस साथी से साथ निभाने
के लिए इन जड़ों को खुद को इन साथी के लिए बिल्कुल खुला छोड़ना होता है. मेरा मतलब
है फफूंद के इन मुलायम पतले पतले रेशों को जड़ के पतले पतले रेशों के अन्दर जाना जो
होता है. हाँ यह फफूंद के रेशे अपना आशियाना जड़ के रेशों के अन्दर बनाते हैं.
लेकिन वह सिर्फ जड़ों के इन रेशों के अन्दर ही नहीं रहते बल्कि इन जड़ के ऊपर फैलकर
उन्हें पूरी तरह ढकते नजर आते हैं. अब इनके इस साथ से पेड़ पौधों को दर्द होता है
या नहीं इसकी जानकारी तो हमें नहीं है किन्तु इतना हमें पता है कि इस दोस्ती को
पेड़ पौधे की जड़ खुशी खुशी स्वीकार करते हैं. स्वीकार तो करना है ही आखिरकार यह फंफूंद
जमीन के अन्दर से पानी के साथ साथ फासफोरस, नाइट्रोजन जैसे खनिज सोंख कर इन जड़ों
यानी पेड़ पौधों को देता है. वैज्ञानिकों ने इस बात की जांच की है. अपनी जांच में
हमारे वैज्ञानिकों ने पाया कि ऐसे पेड़ जिनकी जड़ों की दोस्ती इन फफूंद से हो गयी है
के पास पानी और खनिज रूपी खजाना अधिक होता है, इसके फलस्वरूप वह अधिक स्वस्थ्य
होते हैं साथ ही अधिक मात्रा में शर्करा आदि का निर्माण भी कर लेते हैं. यानी
दोस्ती में फायदा तो है.
आगे कहानी सुनो पौधों की जड़ों के अन्दर
विचरण करने के साथ यह फफूंद जड़ों के बाहर भी टहलते घूमते नजर आते हैं. टहलते घूमते
यह आस पास का समाचार भी इकठ्ठा करते नजर आते हैं. बहुत तकड़ी नेटवर्किंग होती है इनकी.
आस पास के समाचार जैसे कोई हानिकारक जीव जंतु या कीड़े मकौड़े जैसे घुसपैठिये या फिर
लाभदायक पदार्थ की उपस्थिति की जानकारी तो चुटकियों में इकठ्ठा कर लेते हैं और
अपने साथी को सतर्क कर देते हैं. इतना ही नहीं अगर जमीन में उर्वरक यानी नाइट्रोजन
आदि कम हों तो कुछ ऐसे रसायन का स्त्राव करते हैं जिससे जमीन में मौजूद कीड़े मकौड़े
मर जाते हैं और उनके शरीर में उपस्थित नाइट्रोजन आदि पेड़ पौधों को मिल जाते हैं.
कितने सच्चे दोस्त हैं.
दोस्ती तो है लेकिन ऐसी सूखी सूखी दोस्ती तो
कम ही नजर आती है. इन फफूंद की भी कुछ जरूरते होती हैं. अब अपनी इन सेवाओं के बदले यह इन
पौधों से शर्करा और अन्य कार्बोहाइड्रेट के रूप में खाद्य पदार्थ माँगते हैं तो
क्या गलत करते हैं. इनकी डील के मुताबिक़ पेड़ पौधे प्रकाश-संश्लेषण के द्वारा जितनी
भी शर्करा (मंड) तैयार करेंगे उसका एक
तिहाई इन फफूंद का होगा. सही है इतना तो बनता है. शायद कुछ ज्यादा ही बनता हो.
क्योंकि यह फफूंद जिन्हें आमतौर पर हम हानीकारक मानते हैं हमारे पौधों के लिए काफी
लाभदायक नजर आ रहे हैं. इनकी तरफ से कुछ बोनस तोहफे भी मिलते हैं इनके
साथियों को. यह अनेक हानिकारक तत्व जैसे heavy-metals को पौधों की जड़ों से दूर रखते
हैं. उन्हें अपने साथियों की जड़ों में घुसने
नहीं देते. बोनस यहाँ खत्म नहीं होता हानिकारक जीवाणु, फफूंद को भी भगा अपने दोस्त
उनके वार से बचा लेते हैं ये सिपाही. वाकई
अच्छी दोस्ती निभाते हैं.
हमारे यह फफूंद साथी काफी संवेदनशील होते
हैं. हर किसी से दोस्ती करना इन्हें नहीं भाता. ख़ास तरह के फफूंद ख़ास तरह के पेड़
पौधों से ही दोस्ती करते हैं. हाँलाकि अनेक बार ऐसा भी होता है एक फफूंद को एक से अधिक
किस्म के पेड़ पौधों का साथ पसंद आ जाता है. ऐसे में वह किसी को भी अपना साथी बना
लेते हैं. एक बार साथ हो गया तो वह जल्दी छूटता नहीं है. आमतौर पर दोस्ती की लम्बी
पारी खेलते नजर आते हैं यह फफूंद परन्तु अगर माहौल अच्छा न हो (प्रदूषण) तो यह
फफूंद दम तोड़ देते हैं. किन्तु किसी के जाने से जिन्दगी कहां रुकती है. इन फफूंद के दोस्त पेड़ अधिक दिन तक शोक मनाते
नजर नहीं आते. जल्दी ही वो पुन: उपयुक्त साथी ढूंढ लेते हैं और उनके साथ अपना
लेन-देन शुरू कर देते हैं. आखिरकार उनके पास एक से अधिक विकल्प जो मौजूद होते हैं.
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