भारत की पहली महिला
वनस्पति शास्त्री
जानकी अम्मल एड्वालेथ कक्कट एक ऐसा नाम जिसने एक
ऐसा मुकाम हासिल किया जसके बारे में उनके समय की महिलायें सोच भी नहीं सकती थी.
जानकी एक अद्भुत व्यक्तित्व. भारत की आजादी के काफी पहले ही इन्होंने
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका से स्नाकोत्तर की उपाधि प्राप्त कर ली थी. यह उस जमाने की
बात है जब भारत की महिलायें घर से बाहर झांकने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाती थी.
जानकी अम्मल ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए घर ही नहीं बल्कि देश की
चाहरदीवारी/ रक्षा-कवच से बाहर कदम रखा.
जानकी निडर महिला.1940-45 के दौरान इंगलैंड पर जर्मनी के द्वारा
हुई बमबारी के दौरान जिस महिला ने शान्ति पूर्वक अपना शोध कार्य जारी रखा था उसे निडर ही तो कहा जा सकता
है. जी हाँ उस दौरान वह इंग्लैण्ड में ही थी. बमबारी के दौरान वह अपने कमरे में बिस्तर
के नीचे बैठ पढ़ने लिखने का काम किया करती थीं और बमबारी रुकने पर प्रयोगशाला में
जाकर प्रयोग और अन्य काम, ऐसी हिम्मत और लगन शायद ही देखने मिलती है.
एक दलित वर्ग की भारतीय महिला पूरे विश्व में वनस्पति-शास्त्र के ज्ञाता
के रूप में उन दिनों जानी जाती थीं जब विज्ञान के क्षेत्र में सिर्फ पुरुषों का
दबदबा था. भारतीय महिलाओं ख़ास कर दलित वर्ग की महिलाओं को विज्ञान तो क्या ज्ञान के
आस पास फटकने भी नहीं दिया जाता था. अनोखा व्यक्तित्व रहा है जानकी अम्मल का.
वनस्पति-शास्त्र में साइटों-जेनेटिक्स (cyto-genetics) इनका पसंदीदा क्षेत्र बना
था. इस क्षेत्र में उस काल में एक महिला की पहुंच बने यह अपने आप में एक बड़ी और
अकल्पनीय उपलब्धी थी.
केरल के तेलिचेरी की जानकी अम्मल एक बड़े परिवार की सदस्या थीं. 11 भाई-बहन के साथ पली बढीं थी जानकी अम्मल. पिता दीवान बहादुर एडावलथ कक्कट
कृष्णन मद्रास प्रेसीडेंसी में सब जज थे. पिता पढाई-लिखाई के महत्व से वाकिफ थे. उस
ज़माने में जब बेटियों को रसोई और घर के अन्दर के काम में दक्ष किया करना शान की
बात समझी जाती थी इन्होंने अपनी बेटियों के हाथ में किताब कॉपी थमाई. इनकी हर बच्चियों
को ऊंची तालीम पाने की छूट थी. लड़कियों ने कला को अपना पसंदीदा क्षेत्र माना था,
किन्तु जानकी को वनस्पति शास्त्र से लगाव हो गया. अपनी स्कूली शिक्षा समाप्त करने
के बाद जानकी अम्मल मद्रास चली गयीं. वनस्पति शास्त्र से नजदीकियां बढाने के लिए
उनहोंने अपनी स्नातक की डिग्री यहाँ के क्वीन मेरी कॉलेज से प्राप्त की. अपनी यात्रा को आगे बढाते हुए वह प्रेसीडेंसी
कॉलेज की छात्रा बनीं और वहां से वनस्पति-शास्त्र में आनर्स की डिग्री प्राप्त की.
इस यात्रा के दौरान उनका झुकाव साइटों-जेनेटिक्स (Cyto-genetics) की
तरफ हो गया. यह जीव-विज्ञानं की एक ऐसी शाखा है जी कोशिका विज्ञान के साथ प्रजनन
के सिद्धांत को जोड़ती है और इसकी मदद से जीव जगत की अनेक उलझनों की गाँठ को खोला
जा सकता है.
भारतीय गन्ने की मिठास का श्रेय जानकी अम्मल को ही जाता है. भारत गन्ने
का प्रमुख उत्पादक माना जाता है किन्तु भारतीय गन्ने में वह मिठास नहीं थी जो पेरू
के गन्ने में मिलती थी. भारत के कोइमबटूर (COIMBATOOR) में वैज्ञानिकों ने भारतीय
गन्ने को मीठा करने का प्रयास शुरू किया था. पेरू के गन्ने और भारतीय गन्ने के बीच
प्रजनन करा तीसरी प्रजाति उत्पन्न करने की कोशिश हो रही थी जहां पेरू के गन्ने की
मिठास और भारतीय गन्ने की दृढ़ता साथ साथ मौजूद हो. वैज्ञानिक की इस टीम में जानकी
अम्मल को भी शामिल किया गया. इन्होने अपने cyto-genetics के ज्ञान का प्रयोग किया
और भारतीय गन्नों में ऐसी मिठास भरी जिसके कारण आज वह विश्व में जाना और माना जाता
है.
गन्ने की इस मिठास ने जानकी अम्मल को सन 1940 में लंडन के जॉन इन्नस
होरटीकलचरल इंस्टिट्यूट पहुंचा दिया. वह पहली वेतनभोगी महिला वैज्ञानिक थी जिन्हें
यहाँ स्थान मिला था. यह उनकी यात्रा की शुरूआत थी. इसके बाद उनहोंने पीछे मुड कर
नहीं देखा. यहाँ उन्हें विश्व के जाने माने वैज्ञानिक का साथ मिला. सी डी
डार्लिगटन के साथ मिल कर उनहोंने Chromosome Atlas of
Cultivated Plants नामक पुस्तक की
रचना की.
अपने इस रुझान के
साथ जानकी अपने देश की पर्यावरण संबंधी समस्यायों को लेकर भी काफी सचेत और सक्रिय
थीं. 1940 में चल रहे grow more food compaign के दुस्प्रभाव को लेकर भी वह चिंतित
थी. जल ऊर्जा के इस्तेमाल के लिए केरल की कुंथिपुज्हा नदी पर बन रहे बाँध का विरोध
उनहोंने जैम कर किया था. अपने इस विरोध की चर्चा उनके सी डी डार्लिंगटन और पंडित
नेहरू को लिखे गए उनके पत्रों में मिलती है.
गन्ने की मिठास
ही नहीं बल्कि यूरोप में फलते फूलते Magnolia kobus Janaki
Ammal भी इनकी विद्वता की एक मिसाल है. इस
फूल का अनोखा रूप जानकी अम्मल के द्वारा ही दिया गया था.
वनस्पति शास्त्र
में अपना एक मुकाम हासिल करने वाली जानकी अम्मल काफी सरल और सीधे सादे तरीके से
जीवन बिताने वाली महिला थीं. अपनी जमीन से उनका एक ख़ास लगाव था. लन्दन में उनके
कार्य काल के दौरान एक बार उनहोंने एक चायनीज कलाकार की पेंटिंग देखी, उस चित्र
में भूरे पृष्ठभूमि में चांदी की तरह चमकता चम्पा का फूल नजर आ रहा था. चम्पा की
डालियों पर पर लम्बी पूंछ काला ड्रोंगो (कोतवाल) पक्षी बैठा था. कलाकार उस पक्षी
को अच्छे भाग्य का वाहक बता रहा था. जानकी अम्मल ने अपनी नातिनियों के पास इस घटना
की चर्चा करते हुए कहा था,” उस पेंटिंग को देख मुझे लगा था अब
घर जाने का समय आ गया है.”
उनकी इस अनुभूति
और इच्छा को पंडित नेहरू के निमंत्रण ने पूरा कर दिया. पंडित नेहरू ने जानकी अम्मल
को भारत बुलाया और उन्हें Botanical survey of India की चाभी थमा दी. सन 1951 में
वह भारत वापस आई और सन 1957 में उन्हें पद्म भूषण की उपाधी से नवाजा गया. इतना ही नहीं सन 2000 में भारत के पर्यावरण और वन विभाग ने वर्गीकरण विज्ञान (Taxonomy) की राष्ट्रीय उपाधी को 1897 में जन्मी जानकी अम्मल के नाम से सुशोभित किया.
जानकी अम्मल जैसे व्यक्तित्व को हमारे विद्यालयी पाठ्य-पुस्तकों में क्यों नहीं शामिल किया जाता!मुझे भी इनके बारे में आज पहली बार जानने का मौका मिला|चाचाजी की कृपा कि आपके ब्लॉग्स्पॉट तक पहुंचा |
ReplyDeleteThanks. मुझे भी पहले जानकारी नही थी। इनके बारे में पढ़ने के बाद सोचा साझा कर लूं।
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