Tuesday, 3 January 2017

ड़ा.रक्माबाई भारत की पहली महिला पेशेवर डाक्टर जिन्होंने बाल विवाह के विरुद्ध खड़े होना चुना

महिला डाक्टर जिसने बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाई
बाल विवाह नामक इस सामाजिक कुरूति ने मेरी खुशियों पर डाका डाल दिया है. यह कुरीति मेरे और उन चीजों के बीच आता है जिनका मेरे जीवन में बहुत महत्व है. वह चीजें हैं शिक्षा और सभ्य मानसिकता. मेरी कोई गलती नहीं है फिर भी मैं एकाकी जीवन जीने के लिए विवश हूँ. अपनी नासमझ बहनों से अलग रहने की मेरी इच्छा को संदेह की दृष्टी से देखा जाता है साथ ही मेरी इस इच्छा का गलत अर्थ भी निकाला जा रहा है.”
यह 26 जून 1885 के टाइम्स of इंडिया में प्रकाशित पत्र के अंश हैं. यह पत्र द हिन्दू लेडी नामक हिन्दुस्तानी महिला  द्वारा लिखे गए थे. द हिन्दू लेडी दरअसल एक ऐसी स्त्री का छद्म नाम था जिसने उस जमाने में बाल विवाह का विरोध करने का साहस किया था. इस हिम्मत के साथ अपनी बात रखने वाली महिला नही बालिका का नाम था रक्माबाई . द हिन्दू लेडी के नाम से रक्माबाई ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में कई ऐसे पर लिखे जो स्त्रियों के हालात , बाल विवाह जैसे कुप्रथा की चर्चा करते थे.  ड़ा. रक्माबाई जो भारत की पहली महिला डाक्टर थीं. हाँलाकि ड़ा. आनंदी बेन जोशी पहली भारतीय महिला डाक्टर के रूप में जानी जाती हैं. डा जोशी ने डाक्टरी की डिग्री तो हासिल की थी लेकिन अपनी बीमारी के कारण अपने पेशे का इस्तेमाल वह नहीं कर पाईं थीं. वहीं ड़ा. रक्माबाई ने पहली पेशेवर भारतीय महिला डाक्टर होने का गौरव हासिल किया. ड़ा रक्माबाई सिर्फ पहली महिला डाक्टर होने के कारण नहीं जानी जाती हैं.  बल्कि उन्हें उनके उस हिम्मत के लिए याद किया जाता है जिसे दिखलाने का साहस शायद आज की पढी लिखी महिला भी नहीं कर पाती.
रक्माबाई एक ऐसी माँ की बेटी थी जिसकी शादी 14 वर्ष की आयु में हो गयी थी. रुकमाबाई का जन्म उसकी माँ के 15वें साल में हुआ. रक्माबाई के जन्म के दो साल बाद यानी 17 साल की उम्र में वह विधवा हो गयी. इस घटना के करीब 7 साल बाद उन्होंने सखाराम अर्जुन नामक डाक्टर से विवाह कर लिया. सखाराम शिक्षाविद होने के साथ सामजिक बदलाव के हिमायती भी थे.  
समाज के दवाब में आकर रक्माबाई का विवाह 11 वर्ष की आयु में दादाजी भीखाजी के साथ हो गया. उस वक्त के नियमों के अनुसार रुकमाबाई अपने घर में ही रहीं वह अपने पति के घर नहीं गयीं. अपने घर में रह कर उन्होंने अपने सौतेले पिता की सहायता से खुद को शिक्षित करने का प्रयास जारी रखा. उन दिनों हमारा समाज महिला की शिक्षा का हिमायती नहीं था. 
जल्दी ही रक्माबाई को यह आभास हो गया कि उनके पति के विचार उनके विचार से मेल नहीं खाते हैं साथ ही वह एक संदिग्ध चरित्र का व्यक्ति है. यह पता चलने के बाद पढी लिखी और समझदार रुकमाबाई ने इस बंधन भरे सम्बन्ध से आजाद होने की ठान ली.
रक्माबाई अभी स्कूल की छात्रा ही थीं जब उनके पति ने उन्हें अपने साथ ले जाने की मांग रखी. इस इनकार ने जवाब में उनके पति ने बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की. बॉम्बे हाई कोर्ट ने रक्माबाई के सामने दो विकल्प रखे एक वह  कोर्ट का आदेश मानकर वह अपने पति के साथ चली जाएँ और अगर वह ऐसा नहीं करती हैं तो जेल की सलाखों के पीछे जाना मंजूर करें.
दृढ रक्माबाई ने कोर्ट की इस धमकी के बाद भी पति के साथ जाने से इनकार कर दिया. उनहोंने साफ़ शब्दों में कहा कि पति के साथ जीवन बिताने की जगह उन्हें जेल में रहना मंजूर है. उनके अनुसार नाबालिग उम्र में हुई  शादी से बंधने के लिए उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता है. इनकी इस दलील ने हर किसी को अचरज में डाल दिया, क्योंकि ऐसे  दलील उस समय न सुनी गयी थी और न ही इसकी कल्पना की गयी थी. यह 19वीं सदी का सबसे प्रचलित और अनोखा केस था. इसने ब्रिटिश प्रेस का ध्यान भी बाल विवाह और महिला के अधिकारों की तरफ खींचा था.
बेहरामजी मालाबारी, महादेव  गोविन्द रानाड़े जैसे सामाजिक कार्यकर्ता सामने आये और रुकमाबाई के पक्ष में खड़े हुए. इस मसाले पर उस समय की शिक्षाविद और महिलाओं को बंधन से मुक्ति दिलाने के क्षेत्र में काम करने वाली पंडिता रमाबाई ने नाराजगी के साथ लिखा था  
सरकार शिक्षा और उद्धार की हिमायती है. किन्तु जब एक स्त्री ने गुलामी स्वीकार करने से इनकार किया तो वही सरकार उस औरत की हिम्मत को तोड़ने की कोशिश में तल्लीन नजर आई. साथ ही इसने अपने क़ानून का इस्तेमाल उस औरत को बांधने ने लिए किया. “
इन सबकी पहल से इस केस का निपटारा कोर्ट के बाहर ही हो गया और रक्माबाई जेल जाने से बच गयीं. लेकिन इस दृढ और स्वभिमानी महिला ने किसी भी तरह की आर्थिक सहायता को लेने से इनकार कर दिया, यहाँ तक कोर्ट का खर्च का भुगतान भी उन्होंने खुद किया.
रक्माबाई ने आगे मेडिकल की शिक्षा प्राप्त करना तय किया. बॉम्बे के कामा अस्पताल के ब्रिटिश डारेक्टर Edith Pechey Phipson की मदद से उनहोंने अंगरेजी सीखा. 1889 में वह लन्दन चली गयीं और वहां के London School of Medicine for Women में मेडिसिन की पढाई पूरी की. अपनी पढाई पूरी कर ड़ा.रक्माबाई सूरत की  चीफ मेडिकल आफिसर के रूप में भारत वापस आई. यहाँ आ कर उनहोंने महिला डाक्टर के रूप में इस पेशे को आगे बढाया साथ ही बाल विवाह और महिलाओं की पर्दा प्रथा के खिलाफ आवाज उठाती रहीं. इन्होने दुबारा शादी नहीं की और 91 साल की उम्र तक महिलाओं को जागरूक करने के क्षेत्र में काम करती रहीं.   



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