रासायनिक बंधन: मनुष्य और कुत्तों के बीच
बहुत बार देखा है पालतू कुत्ते यहाँ तक की गली में घूमने वाले कुत्ते भी अपने
दो पैरों को समेट कर बैठ जाते हैं और फिर सामने बैठे अपने मालिक या जानने वालों को
घूरते रहते हैं. पर कभी सोचा नहीं की आखिरकार इसके पीछे कुछ कारण भी हो सकता है. ये
हमारे काफी करीब पाए जाने वाले जानवर गीदड़ (जिनसे आज भी हमारी प्रजाति थोड़ा परहेज
ही रखती है) जाति के ही हैं. जी हाँ कुछ गीदड़ हमारे करीब आये उनके स्वभाव और
शारीरिक बदलाव में भी थोड़ा बहुत बदलाव आया और बन गए हमारे साथी. यह सोचने की जरूरत
तो है हमें डराने वाले जानवर हमारे इतने करीबी और प्यार बाटने वाले कैसे बन गए.
जापान के अजाबू विश्विद्यालय के मिहो
नागासावा के पास इसका जबाब है. कुत्तों और हमारे बीच बने सम्बन्ध, प्यार –मोहब्बत के लिए कुछ
रसायन को हम जिम्मेदार ठहरा सकते हैं. आक्सीटोसिन नामक हारमोन जिसका स्त्राव
स्तनधारियों में होता और इसे हम सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए आवश्यक रसायन के
रूप में जानते हैं. कुत्तों के घूरने के कारण उसके मालिक में इसी आक्सीटोसिन का
स्त्राव होने लगता है और उनके अपने पालतू के प्रति प्रेम छलक छलक कर बाहर आता है.
यही प्रक्रिया इन प्यारे प्यारे पालतू में ही होती है, मालिक की प्यार भरी नजर
उनके अन्दर भी इस रसायन के स्त्राव को बढाती है और फिर उनकी तरफ से भी शुरू होता है
प्यार का इजहार. इवान मैकलियन लिखते हैं एक दूसरे को घूरने के प्रक्रिया से हम और
हमारे पालतू एक दूसरे का दिल जीत लेते हैं यह रसायनिक गठबंधन हमें करीब ले आता है.
नागासावा ने 25 कुत्तों के साथ एक शोध किया था. उन्होंने इन कुत्तों और उनके
मालिकों को एक दूसरे को घूरने छोड़ दिया था, कुछ घंटों बाद उन्होंने दोंनों के
पेशाब के सैम्पल इकठ्ठा किया और इसकी जांच की, साथ ही उनके व्यवहार को भी नोट
किया. उनहोंने पाया कि जिन मालिकों को
उनके कुत्तों ने ज्यादा देर तक घूरा वह अपने पालतू के साथ अधिक देर तक प्यार जताते
रहे. साथ ही सभी के पेशाब के सैम्पल में आक्सीटोसिन की बढी हुई मात्रा मिली.
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