Thursday, 29 September 2016

बच्चों की धारणाएं

बादल में पानी आया कहां से
पिछले छ: दिन से हम और बहराइच जिले के बेगमपुर में अवस्थित  कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की लडकियां रोज तकरीबन 5 घंटा साथ गुजार रहे थे. इतने दिन काफी हैं एक दूसरे को जानने के लिए.  यह हमारा छठा दिन था और यहाँ सुबह से बारिश हो रही थी. किसी तरह हम विद्यालय पहुंचे. बारिश तेज थी इसलिए मैं सामने वाली कक्षा में चली गयी. यूं हम आम तौर पर विद्यालय के पिछले भाग में अवस्थित पुस्तकालय में मिलते थे. बारिश हो रही थी बच्चों का ध्यान बारिश की टिपिर टिपिर की तरफ था, साथ ही शायद यह उत्सुकता भी थी कि आखिर आज किस विषय की चर्चा होगी. मैंने कक्षा पर नजर  दौडाई यह कक्षा 8 थी. मेरी नजर आसमान पर गयी. आसमान काले काले बादलों से भरा था, बारिश रुकने का लक्षण नजर नहीं आ रहा था. “आखिर इन बादल में पानी कहां से आता है?” मेरे मुँह से अचानक यह प्रश्न निकल गया.

कक्षा में कुछ देर तक शाति फ़ैल गयी. मैंने बच्चों को आपस में चर्चा करने उकसाया. उनके सामने दूसरा प्रश्न रखा “बादल आते कहां से हैं क्या यह हमेशा आसमान में रहते हैं?”

एक दबी सी आवाज आई,” हाँ, आसमान में रहते हैं.” मैंने सर घुमाया तो कक्षा में उपस्थित सारे सर हामी में हौले हौले हिल तो रहे थे लेकिन उनकी आँखों में असमंजस भी नजर आ रहा था. 

“अच्छा! यानी आसमान में उनका घर होगा.”

“हाँ, वहीं रहते हैं तो घर होगा ही.” जवाब आया.

अब बहुमत था तो सहमत तो होना ही था.  लेकिन यह अभी तक समझ में नहीं आया कि आखिरकार इनमें पानी कहां से आता है. धरती पर तो नदियों, तालाब, समुद्र, हैण्ड पम्प आदि में पानी होता है हम वहां से पानी लेते हैं. फिर यह बादल पानी कहां से लाता है, आसमान में तो कोई नदी या तालाब नजर नहीं आता?

बच्चे सोच में पड़ चुके थे. मैंने इस चुप्पी की अपेक्षा नहीं की थी. मेरा विचार था आठवीं के बच्चों को जल चक्र की जानकारी होनी चाहिए. खैर बात आगे बढ़ी बच्चियों के सर आपस में जुड़ गए.

अचानक संध्या उठी, “नदी या समुद्र का पानी भाप में बदलता है और उसे बादल ले जाता है.”
“अच्छा! कैसे ले जाता है क्या बादल नीचे आता है और भाप को समेट लेता है?” मैंने बच्चों को परेशान करना तय कर रखा था.

“फिर चुप्पी”

“दरअसल इन्द्रधनुष बादल से समुद्र तक सीढ़ी बनाता है और पानी या भाप उस सीढ़ी से होकर बादल तक पहुँच जाता है.” सकुचाती हुई दीप्ति बोल पडी. 

"मुझे भी बचपन में सूनी कहानी याद आ गयी जिसमें एक बच्ची इन्द्रधनुष पर चढ़ आसमान तक पहुंचती थी. 

“यानी समुद्र या नदी का पानी भाप बनता है फिर इन्द्रधनुष की सीढ़ी से होकर बादल तक पहुंचता है. लेकिन अभी भी एक प्रश्न बचता है.  बादल तक भाप पहुंचा लेकिन बादल से जो नीचे गिरता है वह तो पानी है. अब यह पानी कहां से आया?”

बच्चे फिर मुश्किल में पड़े. वाकई भाप की जगह पानी क्यों नीचे आता है?

थोड़ी देर बाद बहुत सोचने समझने के बाद शहनाज ने कहा, “ आसमान में बर्फ होता है उससे भाप पानी में बदल जाता है और वह पानी बरसा देता है.”

यह रहस्य भी सुलझ गया और इतने देर में यह आश्वासन मिल गया कि बच्चों को यह पता है कि पानी गर्म होकर भाप बनता है और भाप को पानी में बदलने के लिए ठंढक चाहिए.

इसके बाद मैंने सोचा कि चलो परियों के खेल खेल में बादल बनाने वाली कहानी सुना कर हम बादल का बनना, गरजना और बिजली का चमकना आदि सारी बातें एक साथ कर लेंगें.
इस कहानी में परियां सूर्य की मदद से समुद्र के पानी का बादल बनाती हैं उन्हें आसमान में लाकर बिखेर देती हैं. उन्हें इस काम में इतना मजा आता है कि वह ढेर सारा बादल बनाने लगती हैं और नतीजा होता है बादलों का भारी होना, भाप का पानी में बदलना, बादलों का टकराना. इन सारी प्रक्रियाओं के कारण बादल गरजने लगे, बिजली चमकने लगी और बादल पानी में बदल धरती पर वापस आ गए. इस तरह आसमान से फिर बादल गायब हो गए. परियां उदास हो गयीं लेकिन हिम्मत नहीं हारी और फिर से सूरज की मदद से बादल बनाने लगीं. अब परियों को इस काम में बहुत मजा आने लगा और बादल के बार बार पानी के रूप में धरती पर लौटने के बावजूद वह यह काम करती रहती हैं.
कहानी ने बादल बनने की धारणा को थोड़ी स्पष्टता तो प्रदान की. लेकिन एक बार फिर यह पूछे जाने पर की बादल कैसे बनता है. कुछ बच्चियों ने तो सही जवाब दे दिया लेकिन एक ने हल्के से कहा, ”परियां बनाती हैं बादल.”  


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