Thursday, 5 May 2016

हरिचरन की घूमती चाक



हरिचरण का चक्का
हरिचरन के बरामदे पर रखे घूमते चक्के को देखे बिना जैसे रवि की सुबह हो ही नहीं सकती. रोज सुबह हरिचरन का पूरा परिवार इस काम में लगता था और रवि उस घूमते हुते चक्के और चक्के पर रखे मिट्टी के लोंदे पर हरिचरन के थिरकते हाथों का कमाल देखने में व्यस्त हो जाता था.
कहीं दूर से लाई गयी चिकनी मिट्टी को गीला कर अपने पैरों से अच्छी तरह रौंदने के बाद उन्हें मोटे बेलन का स्वरूप दिया जाता था. मोटा बेलन छोटा सा टीला नजर आता था.  उसे उठा कर हरिचरन थप्प से चाक के बीच में रख देता है, एक दम बीचों बीच. पानी की सहायता से उसे चाक पर रोप दिया जाता था. और फिर शुरू होता था चाक का घूमना. हाँ चाक के एक किनारे पर छोटा सा गड्ढा है उसमें एक मजबूत से डंडे के सहारे हरिचरन अपनी पूरी ताकत के साथ चक्के को घुमाता था. एक बार चाक गति पकड़ता था कि हरिचरन की हथेलियाँ मिट्टी के बेलनाकार शरीर पर चलने लगती थी. बीच बीच में अपने हाथ को गीला कर वह उस लोंदे को बड़ा यानी लम्बा करने में वयस्त हो जाता था. उसकी आँखे उन मिट्टी के प्यारे से बेलनाकार रचना पर टिकी होती थीं. चक्के के साथ मिट्टी के लोंदे का चक्कर भी शुरू हो जाता था, इस चक्कर के साथ ऐसा मालूम पड़ता था जैसे उस चिकने लम्बे बेलन के शरीर पर वलय (रिंग) बन रहे हो. गोल गोल नीचे से ऊपर की तरफ उठती धारियां बिल्कुल लहरों की तरह. चाक घूम रहा है उस पर रखी मिट्टी भी घूम रही है और उस मिट्टी पर घूम रहीं हैं हरिचरन की हथेलियाँ. घूमना बहुत जरूरी है यह हरिचरन के व्यवहार को देख लगता था. चाक की गति धीमी पड़ती नहीं थी कि हरिचरन का एक हाथ डंडा उठा लेता है और फिर से चाक में गतिज ऊर्जा भर देता है. कभी कभी तो यह काम उसकी माँ भी कर दिया करती थी. इस डंडे के अलावा एक पानी से भरा कटोरा और एक पतली सी डोरी हरिचरन के औजार हैं. अपनी हथेलियों को हमेशा गीली रखता है नतीजन मिट्टी भी गीली रहती है. धीरे धीरे हरिचरन का हाथ मिट्टी के शरीर पर थिरकते-थिरकते उसके ऊपरी हिस्से में अपने अंगूठे के दबाव से एक छोटा सा गड्ढा  बनाते नजर आते हैं. फिर उसके दोनों हाथ इस बेलन के ऊपरी भाग पर ही चलने लगते हैं उस गड्ढे के सहारे उस बेलन का ऊपरी भाग फैलने लगता है और हरिचरन की हथेलियाँ उस फैलते भाग को मन चाहा रूप देने लगती हैं. पहले तो उस मिट्टी के लोंदे के ऊपरी हिस्से पर एक प्लेट जैसी रचना नजर आती है. फिर उस प्लेट का आकार बढ़ता है और हरिचरन के हाथ उसे मोते हुए एक स्वरूप लेने लगते है. एक प्याली का रूप लेती है वह रचना फिर उस प्याले के ऊपर और अन्दर घूमते हरिचरन के हाथ उसे एक स्वरूप  देने लगते.  कभी वह कुल्ल्हड का रूप धरता है तो कभी मटके का, कभी लंबा सा जार तो कभी सुराही और कभी गुल्लक. कमाल हरिचरन के हाथों का होता है. मन चाहा रूप दे डालते हैं इस मिट्टी के लोंदे को. जब अपनी कृति को हरिचरन के हाथ अपना अंतिम स्वरूप प्रदान कर चुके होते हैं, तब उसके हाथों में चाक के बगल में पड़ी पतली सी डोरी आ जाती थी. यह डोरी  वह डोर लिपटती है उस रचना के निचले भाग से और धीरे धीरे अपने जड़ यानी मिट्टी के लोंदे से उसे अलग कर देती है. फिर उस लरजती हुई रचना को हरिचरन अपने दोनों हाथों से संभाल कर एक तरफ रखता है सूखने के लिए. और फिर शुरू होता है चाक के चाक्कर  और हरिचरन की हथेलियों का खेल.
रवि को यह खेल बहुत मन भावन लगता था. कितने आराम से हरिचरन तरह तरह के बर्तन बना देता है. चक्के को घुमाते जाओ और मिट्टी के बर्तन तैयार करते रहो.
बड़े होने पर रवि को पता चला कि यह काम बहुत आसान नहीं. अनेक तरह के बल को संतुलित करना पड़ता है. चक्के के घूमने से लगता है केंद्राभिसारी बल मेरा मतलब Centripetal force. यह बल चीजों को चक्के के केंद्र की तरफ खींचता है. यह घूमते हु चाक पर लम्बी सी रचना को थामे रखने में सहायक होती है. यह तो ठीक है लेकिन फिर साथ ही लगता है केंद्राभिसारी यानी centrifugal बल. यह चीजों को बाहर की तरफ खींचता है. (जिसके कारण डोर में बाँध एक पत्थर को गोल गोल घुमा कर छोड़ने पर वह बहुत दूर जा कर गिरता है. इस प्रक्रिया में रवि ने देखा था जितनी जोर से वह गोल गोल घुमाया जाता है उतनी ही दूर भागता है पत्थर और डोरी).  यह हरिचरन को मिट्टी को फैलाने में मदद तो करता है लेकिन उसे इस बल को अपने हिसाब से रोकना भी पड़ता है तभी तो वह मन चाहा स्वरूप देगा अपनी वस्तुओं को. यानी हरिचरन बहुत हिसाब से बल भी लगाता है अपने चाक पर स्वरूप लेते हुए इन बर्तन पर. इतना ही नहीं हरिचरन की हथेलियों और मिट्टी के बीच घर्षण यानी friction बल भी अपना जलवा बिखेरता है.  इस बल से होने वाले नुक्सान को रोकने के लिए मिट्टी को चिकना और गीला रखना जरूरी होता है. अगर मिट्टी को चिकना और गीला नहीं रखा गया तो मिट्टी टूट टूट कर अलग होने लगेगी इस घर्षण के कारण. अब समझ में आया हरिचरन के गीले हाथों का राज यहाँ तक की वह बर्तन काटने वाली डोर को भी गीला रखता था. यानी हरिचरन को भौतिकी के इन सारे नियम की जानकारी है. रवि तो आश्चर्य-चकित था और इतना समझ गया था कि तेजी से घूमता हुआ चाक और उस प्रक्रिया  से उत्पन्न बल कितने सहायक हैं बर्तन बनाने में. साथ ही इन सारे बल को अपने हिसाब से नियंत्रित करने की हरिचरन कई क्षमता का भी कायल हो चुका था रवि.
आज तो अनेक किस्मों के बर्तन हम उपयोग में लाते हैं. हमारे पास खाना बनाने के लिए अलग मैटेरियल के बने बर्तन होते हैं, खाने के लिए अलग किस्म के. रंग रूप के साथ के साथ उनके स्वभाव में भी काफी विभिन्नता है. परन्तु एक समय था जब हम मिट्टी के बर्तनों में ही खाना पकाते भी थे और खाते भी थे. अब तो हम शौक से इनका इस्तेमाल करते हैं, यानी हरिचरन और उसके परिवार के व्यवसाय सीमित होते जा रहे हैं. हांलाकि आज भी इन बर्तन की खूबियों को नकार नहीं सकते. इनके शरीर पर पाए जाने वाले छोटे छोटे छिद्र नमी सोंखने के साथ बर्तन को बाहरी वातावरण से जोड़े रखते है, तभी तो मिट्टी के बर्तन का पाने गर्मियों में भी इतना ठंढा रहता है. रवि की माँ को मिट्टी के बर्तन काफी पसंद थे. लेकिन रवि का ध्यान कहीं और था बर्तन बनाने वाला चाक तो काफी पहले से इस्तेमाल में है पहले के लोगों को तो भौतिकी के इन नियमों की जानकारी नहीं थी फिर यह प्रक्रिया इस्तेमाल में आई कैसे.
रवि के इस सवाल का जवाब मिट्टी के बर्तन की प्रेमी उसकी माँ के पास ही था. माँ के अनुसार वह पूरे आकड़े तो नहीं दे सकती कि चाक का इस्तेमाल कब से होने लगा. किन्तु इतना पता है जब लोग जंगल से बस्ती फिर गाँव और शहरों में बसने लगे खाना बनाने के लिए उन्हें बर्तनों की आवश्कता महसूस होने लगी. पेड़-पौधे, मिट्टी यही सब उन दिनों उनके साधन हुआ करते थे. घास-पत्तों की सहायता से टोकरी वगैरह बनाना सीख चुके थे मनुष्य बस उसी तर्ज पर मिट्टी को गीला कर उसे लंबा किया जाता था रस्सी की तरह. उस मिट्टी की रस्सी को रोल कर यानी रिंग का स्वरूप दिया जाता था.सबसे नीचे सबसे छोटा लगभग बंद रिंग होता था फिर क्रमश: रिंग का आकार बढ़ता जाता था और उन्हें मिला कर मन चाहा स्वरूप प्रदान किया जाता था. कहते हैं इस प्रक्रिया को थोड़ा कम समय में ख़त्म करने के लिए उन्हें मिट्टी के प्लेट पर रख कर बनाया जाता था और प्लेट को गोलगोल घुमाया जाता था. और फिर जब चक्का हमारी जिन्दगी में आया तो बस उसने कुम्हार के चाक का विचार भी पैदा कर दिया. इसे कहते हैं आवश्यता खोज की जननी होती है.
रवि माँ की बातें सुन कर मुस्कुरा रहा था. हरिचरन की चाक ने उसे इतना जरूर समझा दिया था  कि भौतिकी/विज्ञान  के नियम उनके आस पास काम करते रहते हैं बस उन्हें समझाने की जरूरत है उसके लिए बहुत बड़ा वैज्ञानिक होना जरूरी नहीं.

No comments:

Post a Comment