Sunday, 17 May 2015

कीड़े मकौड़े की नींद कितनी जरूरी




चुपके से आ जा री अँखियन में निंदिया आ जा री आ जा
हर समय घूमते –फिरते, उड़ते, लड़ते-भिड़ते, खाते-पीते, काटते रहने वाले ये कीड़े मकौड़े कभी आराम भी करते हैं? आखिर ये खुद को हमारी तरह रिचार्ज करते हैं या नहीं? इन्हें नींद की जरूरत होती है? क्या ये सोते भी हैं? क्या इनकी माँ इनके लिए बिस्तर तैयार करती है? इनके सोते रहने पर डांटती हैं?”
शायद बहुत मुश्किल है यह कह पाना. थोड़ा छोटा सा दिमाग है इनका, अभी तक बहुत अच्छे से उसके व्यवहार को पढ़ा नहीं गया है. फिर हमारे आस पास, दूर-दराज में इतने सारे, इतनी तरह के कीड़े मकौड़े भी तो हैं. इसलिए बहुत आसानी से तो इस प्रश्न का ज़बाब ‘हाँ’ में तो नहीं दे सकते. पर शोध इतना जरूर बताते हैं कि इनमें से अधिकतर किसी न किसी समय में खुद को समेट कर इस शोर भरी दुनिया से दूर करते हुए झपकी ले ही लेते हैं. वैज्ञानिक शब्दों में कहें तो वो ऐसा समय निकाल लेते हैं जब उनकी जीवन संबधी प्रक्रिया धीमी पड़ती है, वो अपने शरीर और मांसपेशियों को ढीला छोड़ते हैं. ठीक वैसा ही जैसा हमारा शरीर हमारे निद्रा देवी के गोद में जाने के बाद करता है. इन कीड़े मकौडों के पास पलकें तो हैं नहीं जिससे उनकी आँखे बंद दिखें.
अब थोड़ा ध्यान से अपने आस पास वाले कीड़ों को देखते हैं, मक्खियाँ प्रत्येक शाम अपने जबड़ों से किसी डंठल को जकड लेतीं है. अपने पैरों को मोड़ कर पंखों के पीछे/नीचे छुपा देती हैं. और फिर वहीं सिकुड़ कर पड जाती हैं सुबह होने तक. पूरे रात की नींद लेती हैं.
मोनार्च तितलियाँ (Monarch butterfly) अकेले नहीं सोतीं. पूरा समूह पेड़ों की पत्तियों के बीच खुद को  छुपा कर अपने पंखों को बंद कर पडा रहता है. उन दौरान यह पहचानना मुश्किल होता है कि कौन सी तितली है और कौन पत्ता. पूरी रात आराम करती हैं ताकि दिन भर बिना थके अपनी ड्यूटी कर सकें. बहुत सारे कीड़े सोते वक्त खुद को अपने आस पास के वातावरण से इस तरह मिला लेते हैं कि आपके लिए यह पहचान पाना मुश्किल होता है कि वह कीड़ा है या पेड़ की छाल या लकड़ी या कुछ और.
बहुत सारे कीड़े जैसे pill bug खुद को बचाने के लिए सो जाते हैं. ख़तरा भांपते ही खुद को गेंद की तरह बना लेते हैं और जीवन संबंधी सारी प्रक्रिया धीमी कर लेते हैं. और इस तरह खतरे को उस जीवन का भान नहीं होता और वह बच जाते हैं. (ऐसा वो सोचते हैं शायद).
अब न्यूजीलैंड में ऊंचाईयों पर पाए जाने वाले झिंगुर की समझदारी का क्या कहना, प्रत्येक रात को वह सोने के लिए बर्फ बन जाता है (freezes solid) और सुबह देख झटक कर निकल आता है अपने उस रूप से.
बहुत सारे कीड़े जिसमें हड्डा, लेडी बग, फत्तिंगे, भृंग आदि शामिल है  पेड़ों के में लम्बे समय के लिए गहरी नींद सोते हैं जिसे वैज्ञानिक डायपौज़ (diapause) कहते हैं.  
वैज्ञानिकों का कहना है कि इनके लिए भी नींद उतनी ही जरूरी है जितनी हमारे लिए. तेलचट्टा, फलों पर मंडराने वाली मक्खियाँ, बिच्छू को ठीक हमारे तरह अपनी जवानी में अधिक नींद आती है.  इनके भी दिमाग में बनने वाले रसायन इनकी नींद की जरूरत को नियंत्रित करते हैं. यह वही रसायन है जो हमारी नींद की जरूरत को नियंत्रित करता है. नींद नहीं पूरी होने पर ये भी हमारी तरह गलतियां करते हैं. आमतौर पर मधुमक्खियाँ खाने की जगह की दूरी बताने के लिए एक ख़ास तरह का नृत्य करती हैं, जिसे हम वैगल डांस कहते हैं. नींद न पूरी होने पर मधुमक्खियाँ इस नृत्य को सही ढंग से नहीं कर पातीं.
इतनी समानता है इसीलिये हमारी नींद के बारे में जानकारी इकठ्ठा करने के लिए शोधकर्ता फलों पर मंडराने वाली मक्खियों का इस्तेमाल करते है. जी हाँ ये नींद लाने वाली दवाईयों और कॉफ़ी आदि के प्रति वही रवैया रखते हैं जो हम मनुष्य. यानी हमारी नींद के बारे में पता करने के लिए हमें तंग नहीं किया जाता है तंग होती हैं ये बेचारी मक्खियाँ. चलो इन्हें लोरी सुनाते हैं इनका सोना जरूरी है.
चुपके से आ जी री अँखियन में निंदिया आ जा री आ जा.

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