Saturday, 7 February 2015

हँसी : एक अच्छी अनुभूति

हँसी : एक अच्छी अनुभूति
एक थी फूलकुमारी.बहुत प्यारी, बहुत खुश रहने वाली. जब भी फूलकुमारी हँसती थी तो फूल झड़ते थे. वह जब चुप हो जाती तो जैसे सारी दुनिया हँसना भूल जाती थी.फूलकुमारी की हंसी कल कल करते झरने की तरह थी, इसमें चिड़ियों का चहकना शामिल होता था. एक दिन अचानक फूलकुमारी चुप हो गयी, वह जैसे हँसना भूल गयी. नतीजा फूलों ने खिलना छोड़ दिया, चिड़ियाँ जैसे चहकना भूल गईं, झरनों का संगीत बंद हो गया. हर तरफ बस उदासी बिखर गयी, राजा उदास, रानी उदास, मंत्री उदास, प्रजा उदास बच्चे भी हँसना भूल गए. फूलकुमारी का हंसाना जरूरी था. राजा-रानी ने बहुत सारे जतन किये परन्तु वो सफल न हुए. न जाने कितने जादूगर आये, मसखरे आये , कलाबाज आये पर कोई भी फूलकुमारी को हंसा न पाया. सब परेशान थे शहर चहकना भूल गया था. अंत में राजा ने मुनादी करा दी, “ सुनो, सोनो, सुनो, राजा का एलान है, जो भी फूलकुमारी को हंसा देगा, उसे आधे राज्य का मालिक बना दिया जाएगा:, सुनो, सुनो, सुनो.” इस मुनादी को सुन तरह तरह के लोग आये पर सब के सब खाली हाथ वापस हो गए. एक दिन दरबार में बडे से पेट के साथ गधे पर सवार हो एक लड़का आया. पहरेदार ने उसे भगाने की कोशिश की.परन्तु बड़े पेट वाले लडके ने पूरे विश्वास के साथ यह दावा किया कि वह फूलकुमारी को हंसा सकता है. उसके विश्वास को देख राजा ने लडके को बुला लिया. लडके ने फूलकुमारी के चारो तरफ चक्कर लगाना शुरू कर दिया. फूलकुमारी के दांये झुका, बाएं झुका पर फूलकुमारी को हंसी नहीं आई. बड़े पेट के साथ लड़का घूम गया और उसने गधे पर चढने की कोशिश की, यह क्या इस कोशिश में उसका पेट गिर पडा. बड़ा अजीब नजारा था और ---- अचानक ही हा, हा, ही, ही की झडी लग गई, हाँ फूलकुमारी हँस पडी थी वह हंसी से लोट पोट हो रही थी. फूलकुमारी को हँसते देख फूल खिल पड़े, चिड़ियों ने चह्कना शुरू कर दिया, झरने कल कल बहने लगे, राजा खुश, रानी खुश, मंत्री और प्रजा भी खुश हो पडी, ऐसा लगा जैसे जीवन लौट आया.
यह कहानी हमारे कक्षा तीन की हिन्दी पाठ्यपुस्तक का हिस्सा था. आज इस कहानी को दुहराते समय यही महसूस हुआ वाकई हंसी हमें अच्छा महसूस कराती है, हमारी हंसी के साथ भी फूल, आस पास का वातावरण हँस पड़ता है. लेकिन ज़रा सोचते हैं हम कब हँस पडतें हैं, चुटकुले सुन कर, कुछ मजेदार देख कर या सुन कर, बहुत खुश होने पर, गुदगुदाहट के कारण, कभी कभी तो विचित्र स्थिति पर जहां  हँसना हमारे संवेदहीन होने का संकेत दे सकती है जैसे किसी के गिर जाने पर (गिरने वाला भी हँसता है) या किसी या खुद के विचित्र स्थिति में फंसने पर, हम झेंपने पर भी हँसते हैं, अपनी शर्मिन्दगी को छुपाने के लिए भी तो हँस पड़ते हैं. कभी कभी सामने वाले की बातों को नकारने के लिए भी हंसी हमारा हथियार बनती है. बहुत बार एक वक्ता अपनी बात में वजन बढाने के लिए हँसता है तो बहुत बार श्रोता वक्ता को मंच से हटाने के लिए हँस पड़ते हैं. पर यह हंसी होती क्या ऐसा तो कभी महसूस नहीं हुआ कि हमने सोच समझ कर हँसना शुरू किया हो, यह तो बस फूट पड़ती है अब हा, हा, हा हो या ही ही या फिर गुर्राने जैसी बस निकल ही जाती है. और एक चीज मजेदार है न हम हिन्दी भाषी हों, या तमिल या फिर अंगरेजी या फ्रेंच हँसते एक ही तरह हैं. हा, हां, हा........., अरे भाई  भाषा (बोलना) सीखने से पहले हम हँसना जो शुरू कर देते हैं. हाँ इतना जरूर है बच्चे बड़ों से अधिक मजा ले पाते हैं इस क्रिया का. दरअसल किसी बाहरी या अन्दुरूनी प्रेरक के उकसाने पर डायफ्राम और श्वसन तंत्र के अन्य भाग की हलचल (सिकुडन) से यह आवाज पैदा होती है. इन प्रेरक के कारण चेहेरे की मांसपेशियों को भी फ़ैलने और जबड़ों को फैलाने का हुक्म मिलता है और कुल मिला कर बन जाती है, खी, खी, खी या ही, ही, ही या हा, हा, हा.  लेकिन यह ही, ही, खी, खी हमारे दिमाग के किस भाग से नियंत्रित होता है यह अभी तक रहस्य है. परन्तु हम संभावना तलाशते रहते हैं और ऐसा मानते हैं कि हमारे फ्रंटल ब्रेन के साथ लिम्बिक सिस्टम (limbic system) इस कारनामे को अंजाम देता होगा. हमारा लिम्बिक सिस्टम हमारे भावनात्मक पहलुओं से जुडा होता है. यह सिस्टम सेरेब्रल कार्टेक्स के नीचे स्थित होता है. यह मस्तिष्क का ऐसा हिस्सा है जो मनुष्य को उसके जीवन से जुडी आवश्यकताओं जैसे खाने की खोज करना, अपना बचाव करना आदि का निर्देश देता है. वैज्ञानिक दिमाग में हंसी के केंद्र को खोजने की कोशिश में लगे हुए हैं. हाल में मिरगी रोग से ग्रस्त एक लड़की के दिमाग के कार्टेक्स द्वारा किये गए बिजली के तरंग के बहाव की तेजी को बढ़ा घटा कर उसके असर को जांचा गया. ऐसा पाया गया कि जब बिजली का प्रवाह तेज होता था लड़की जोर से हँस पड़ती थी उसे अपने आस पास सफ़ेद कोट में खड़े डाक्टर भी मजेदार नजर आते थे और बिजली के तीव्रता की कमी उसकी हंसी की तीव्रता में भी कमी लाती थी. अपने इस प्रयोग के कारण वैज्ञानिक फ्रंट ब्रेन कार्टेक्स की भूमिका भी हंसी पैदा करने में देखते हैं. वैज्ञानिकों का यह मानना है कि हंसी का दिमाग के भावनात्मक, संज्ञानात्मक और मोटर पहलुओं से सबन्ध है. बोली (भाषा) और हंसी में भी गहरा रिश्ता है.  हंसी की मदद से अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का काम पहले शुरू होता है, बोलना तो हम बाद में शुरू करते हैं. हाँ हँसना तो हमें सीखना नहीं पड़ता, छींक और हिचकी की तरह यह खुद ब खुद फूट पड़ने वाली प्रक्रिया है.  हंसी एक ऐसी प्रक्रिया है जो यह दर्शाती है कि आप अपने वातावरण में आस पास के लोंगो के साथ जुड़े हुए हैं.
 ‘सामाजिक दिमाग अवधारणा’  के अनुसार मस्तिषक का विकास वातावरण की जरूरतों जैसे शिकार करना, खाना बनाना सीखने के लिए नहीं हुआ था यह विकास बड़े समूह में जीने की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हुआ. इस प्रक्रिया में सबसे अधिक मददगार उपकरण था सम्प्रेषण या बात-चीत. हंसी भी इन्हीं  तरीके की एक लड़ी है. यह एक ऐसा जरिया है जो सीधे तौर पर आपको बड़े समूह से जोड़ता है और यह खुद ब खुद झलक पड़ता है हमें इसकी शिक्षा नहीं लेनी पड़ती. सामाजिक वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि दिमाग के बोली (भाषा) वाले भाग का अत्यधिक उत्तेजित होना भी हंसी को जन्म देता है.
थोड़ा आश्चर्य होता है न गली चौबारे, कक्षा, मीटिंग स्थल घरों में कहीं भी घटित होने वाली इस प्रक्रिया के बारे में इतना कम शोध हुआ है. साथ ही बड़ी आसानी से होने वाली इस प्रक्रिया को समझना इतना मुश्किल. सोचा समझा कारनामा नहीं होता है यह शायद इसी लिए इतना मुश्किल है इसे समझना. हाँ यह तो सच है  कि , हैं, हैं कर नकली हंसी को बाहर लाना कितना मुश्किल है. किसी के कमांड या डिमांड पर हँसना या हंसी को रोकना मुश्किल तो है पर बहुत बार आफिस और घरों में बॉस या मालिक  की हंसी ही निर्धारित करती है कर्मचारियों या मातहत का हँसना. जी हाँ हंसी के भी कई प्रकार हैं, वर्चस्व वाली हंसी, मातहत की हंसी, झेंपी हंसी, आजाद हंसी. पर सच्ची हंसी तो आजाद हंसी ही है. अकेले में शायद ही हँसते हैं, हंसी तो हमेशा समूह में ही झलकती है. जी हाँ यह हमें साथ रहने कहती है. और हाँ यह फैलती भी है. यानी एक की हंसी दूसरे को भी अपने चंगुल में ले सकती है, इसीलिये शायद लाफ्टर चैनेल वाले बैग्रांड में हंसी का रिकार्ड बजाते रहते हैं. बोलते बोलते भी हम हँस पड़ते हैं पर यह हंसी हमेशा वाक्य के शुरूआत या अंत में आती है. कहते हैं कि लड़कियां लड़कों से अधिक हँसती हैं, ऐसा होगा भी न लड़कों को तो धीर गम्भीर रहने का लाइसेंस प्राप्त है.
पर लड़का हो या लड़की गुदगुदी का अहसास ही हंसी से दोहरा कर देता है, पर खुद द्वारा की गई गुदगुदी हंसी को आस पास भी नहीं लाती, शायद हमारा दिमाग सचेत होता है.
“हंसी सबसे अच्छी दवा है,’ इस मान्यता के साथ बहुत सारे लाफ्टर क्लब काम करते हैं. सुबह सुबह पार्क में हां हां कर हँसते समूह का उपस्थित होना आम हो गया है. ऐसा मानना है कि यह ह्रदय की गति, रक्त के बहाव, फेफेड़े की क्षमता आदि को सुचारू करने में सहायक होता है. ह्रदय को फेफड़े को हो रहे फायदे के बारे में तो हम निश्चित नहीं हैं पर मन को होने वाले फायदे से हम सब अवगत है. हंसी डर और तनाव को दूर करने में बहुत सहायक होती है यह तो तय है. अगर हम किसी की बात से सहमत नहीं हो पा रहे हैं तो ऐसे में हंसी का इस्तेमाल एक अच्छे और मजबूत ढाल के रूप में किया जा सकता है. चलो हँस लेते हैं परन्तु किसी का मजाक उड़ाने, लज्जित करने नहीं, अच्छा महसूस करने हँसते हैं.


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