Saturday, 21 February 2015

सत्ता




सत्ता

कुछ रोज पहले बिहार के पूर्व मुख्य मंत्री द्वारा दिया गया वक्तव्य, “मैंने मांझी को अपनी सरकार दे दी, अब वह मेरी पार्टी चाहता है,” ने मेरा ध्यान ‘मेरी और अपनी’ जैसे शब्दों के इर्द गिर्द घूमने पर मजबूर कर दिया है.  ये दोंनो शब्द हमारे बहुत अपने हैं हमारी सत्ता का द्योतक हैं. इन शब्दों को अगर कोई चुनौती देता नजर आता है तो हम तिलमिला जाते हैं, और ऐसा क्यों न हो हमारे वजूद से जुडा है यह और फिर जानवर भी अपनी सत्ता की रक्षा किसी भी तरह करते हैं हम तो समझदार मनुष्य हैं.

शादी के बाद जब मैंने ससुराल में रसोई का काम सम्भाला था तब मुझे बहुत अजीब से अनुभव हुए थे. मेरी जिठानी जो उस रसोई की आज भी मालकिन हैं अचानक आ कर कभी कूकर में उबलने के लिए रखे गए आलू की संख्या बढ़ा जाती थीं (भले ही वह एक ही आलू डालें) या फिर कभी कड़ाही में तेल की मात्रा. अगर मैं अपनी रेसिपी इस्तेमाल करना चाहती थी तो मुझसे यह कह कर उसे बदलने के लिए प्रेरित करती थीं कि लोंगो को पसंद नहीं आयेगा. पहले मैं उनकी बात मान तो लेती थी पर उसका कारण होता था मेरे पास किसी और उपाय का न होना, क्योंकि मैं बहुत प्रतिरोध नहीं कर पाती. आज उनका मेरी बहुत सारी पहल को रोकना मुझे आश्चर्य में नहीं डालता हाँ झुंझलाहट जरूर होती है, क्योंकि अब मेरा भी यह दावा है कि मैं घर वालों को अच्छी तरह जानती हूँ. पर इतना समझ में तो आता है उनकी यह आदत या कार्रवाही सिर्फ उनकी सत्ता को सुरक्षित रखने का तरीका है, हांलाकि वह शायद ऐसा सोचती नहीं हैं. उनकी एक और आदत है वह कहीं भी जाती हैं तो खुद को सुसुप्त नहीं कर पातीं अपनी सत्ता को बनाए रखने की कोशिश जारी रहती है.
अभी हाल में मैं अपने एक रिश्तेदार के यहाँ गई थी ननद-भाभी काफी दिनों से साथ साथ हैं. भाभी का घर है. दोंनो बहुत ही सहज तरीके से साथ हैं. जिस दिन मैं उनके घर गई उनका ड्राइवर जो कहीं बाहर रहता है आया हुआ था. दिन के करीब 1 बज रहे थे. ननद ने ड्राइवर के लिए खाना तैयार कर लिया था. ड्राइवर को खाना तो देना ही है समय भी हो गया है पर अभी किसी चीज का इंतज़ार है जी हाँ भाभी की हामी का. सत्ता वाली बात है.

मैं भी अपनी भाभी के साथ लंबा समय गुजारती हूँ हमारा रिश्ता भी काफी सहज है. यहाँ तो बहुत सारे निर्णय भी मैं लेती हूँ, पर अभी काम करने वाली ने मुझसे कहा कि जा रही हूँ मेरे मुंह से सहज ही निकला भाभी को बता दो.
एक बार ट्रेन के सफ़र के दौरान मुझे बीच वाली सीट मिली नीचे वाली सीट पर एक जवान लड़का बैठा नजर आया. मैंने उससे सीट बदलने का आग्रह किया, वह राजी हो गया. थोड़ी देर बाद उसके ताऊ आये उन्हें उस बच्चे ने मेरे आग्रह और उसके सहमत होने की बात बताई. ताऊ नाराज हो गए, “बिना मुझसे पूछे तुमने कैसे हाँ कह दिया.” मुझे बीच वाली सीट से संतोष करना पड़ा, यहाँ भी सत्ता का मामला था.

जब मैं स्कूल में पढाती थी मुझे एक वाकया याद है. एक बार मैं क्लास लेने गयी और कुछ बच्चे मैदान में थे. मुझे देख वो दौड़ते हुए कक्षा तक आ गए पर मैंने उन्हें दरवाजे पर पांच मिनट तक खडा कर दिया. पांच मिनट बाद अन्दर बुलाया. सत्ता का मामला था.

उसी विद्यालय की प्राचार्या किसी भी बच्चे या शिक्षक को उनकी गलतियों से रू ब रू कराने की जो कोशिश करती थी वह काफी  जोरदार (आवाज की तीव्रता के साथ) और इतना असरदार होता था कि सामने वाला बुरी तरह उलझ जाता था. उनकी बातों में (जो सत्ता के कारण दमदार होती थी) इतना असर होता था कि न चाहते हुए भी सामने वाले को सहमत होना पड़ता था.

सरोज जो हमारे घर की साफ़ सफाई करती है काफी पुरानी हो गई है, वह हमारे घर में आने वाले किसी भी नए काम करने वाली को अच्छे से तौलती परखती है. उसकी सत्ता को स्वीकार कर लो बहुत अच्छा नहीं तो शिकायतों का पुलिंदा तैयार रहता है.

हम अपने बच्चों को निर्णय लेने के काबिल, आत्मनिर्भर बनाते हैं, यह हमारी दिली इच्छा भी होती है लेकिन जब वह हमें अपने निर्णय में शामिल नहीं करते तो हम  दुखी (Hurt) होते हैं. यहाँ भी कुछ कुछ सत्ता का मामला होता है.

बच्चे भी अपनी सत्ता के प्रति सजग होते हैं, उनक्स चाकलेट कोई और सामान भले ही पड़ा पडा खराब होता रहे किसी ने बिना पूछे छू भी लिया तो तूफ़ान आ जाएगा.

अगर मैं कहीं बाहर थी और किसी और ने मेरा घर सम्हाल रखा है तो शायद मेरा यह हक़ बनता है कि मैं उसमें नुक्स निकालूं , बिना कहे या कह कर. मेरा घर मेरी सत्ता है.

हाँ एक सवाल जरूर उठता है आज कल ज्यादातर समय अपनी सत्ता को साबित करने के लिए हमें ऊंची और कड़े शब्दों से सुसज्जित आवाज का सहारा क्यों लेना पड़ता हो अब वह प्रधान मंत्री मोदी की सभा हो, या आफिस का बॉस, घर के मालिक-मालकिन हों या फिर शिक्षक या माता. ऐसा बहुत कम ही मौक़ा होता है  जब शान्ति और मुलायम शब्दों की सहायता से हम अपनी सत्ता स्थापित कर पाते हों.

ऐसे बहुत सारे उदाहरण हैं हमारे आस पास.  पर मेरे मन में यह सवाल है हमें अपनी सत्ता के प्रति जागरूक तो रहना है पर यह जागरूकता अक्सर बहुत सारी उलझनों, मसलों को जन्म देती है, है न. आखिर सत्ता का मामला है.  

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