Friday, 3 October 2014

महादशमी : खो रहा है वह उत्सव जिसका रहता था हमें इंतज़ार



महादाशमी

महादशमी और अपनों के  दूर होने का अहसास मन को छोटा न करे यह हो ही नहीं सकता. बेटू से बात करने पर पता चला इडली साम्भर से दिन की शुरूआत की है, और नार्मल रूटीन है, यानी कालेज जाना है. दिल्ली में भतीजी सुबह उठ गयी नहा भी रही है, पर उसके पीछे दशहरा वाला कोई मकसद नहीं है. दुमका जहां पूजा  होती है सुबह ब्राह्मण भोजन हो गया बस. इस दिन का उत्सव वाला भान कहीं खो गया है. 

आज का दिन हमारे लिए नए कपडे पहन देवी को अंतिम पुष्पांजली देने के बाद बड़ों से आशीर्वाद लेने का और देवी के पास अपनी किताबों को रख बहुत सी विद्या माँगने वाला हुआ करता था. पूरे दिन कुछ कुछ विशेष होता था, जैसे घर में पकवान बनना, लोंगों का आना जाना और भाग भाग कर पड़ोस की मूर्ती की सजावट देखना. मेरे घर में मूर्ती या कलश स्थापना कभी नहीं हुई,  न ही हमारा घर आस्तिक था. अम्मी एक छोटी सी जगह को पाक बना कर दुर्गा-सप्तशती का पाठ करती थी, हम भी बड़े उत्साह से उसमें शरीक होते थे. कभी कभी हम भी “नमस्तस्य नमस्तस्य नमो नम:” वाला पाठ पढ़ कर खुद को पावन कर लेते थे. इसमें दुर्गा के विभिन्न रूपों “चंडी रूप, शान्ति रूप” का आह्वाहन मुझे बहुत ग्लैमरस लगता था. (अब समझ में आता है कैसे इस ग्लैमरस छवि के शिकंजे में फंसती हैं, हम.  माँ दुर्गा का अवतरण ही इन रूप के प्रलोभन के साथ किया गया था.). षष्ठी की रात को माँ की आँखों का धीरे धीरे खुलना, सप्तमी और अष्टमी के दिन उनके चहरे पर फ़ैली हुई कान्ति और फिर नवमी और दशमी को उनका मलिन होता चेहरा कितने स्पष्ट रूप में नजर आता था हमें. ढाक की आवाज और धूप की सुगंध से रोमांचित होना भी शामिल होता था हमारी अनुभूति में. सुबह उठ गुलाबी ठंढ के बावजूद  गुलाब, शिउली, कनेल, गुलहजरा के फूलों की तलाश और उस मकसद से अपने बगीचे में इन पौधों का लगाना  हमारी व्यस्तता और तैयारी का एक हिस्सा होता था. बाजार में गोभी और मटर की खोज भी उस उत्सव का हिस्सा होता था. पर धीरे धीरे यह सब लुप्त होता चला गया. मौसम के साथ फूलों, अनाज और फल का सम्बन्ध का भी हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी में कोई स्थान नहीं है, फिर इन पर्व से उनका सम्बन्ध हम कैसे समझेंगें. अब हमारी आँखें समझदार हैं, फिर  मूर्ती के बदलते रूप  को ये कैसे देख पाएंगी, हमारी अनुभूति भी परिपक्व है ऐसे में ये शोर शराबा हमें  रोमांचित कैसे कर सकता है. अब तो पूजा का रूप भी बदल गया है, पांडाल की चकाचौंध तरह तरह के बैंड, बाजे और खाने पीने का सामान का स्टाल हमें उन सब अनुभव से दूर करने में सहायक हो गया है. किसी तरह मूर्ती तक पहुचे भी तो अचंभित करने वाली सजावट हमें दुर्गा के चहरे पर टिकने कहाँ देती. शायद अब माँ दुर्गा भी अचंभित रहती हैं अपने लिए किये गए इस तैयारी से. मौसम भी इस अहसास को दूर रखने के साजिश  में पूरी तरह शरीक होता नजर आता है, हमारा सुबह सुबह उठना उस  भीनी भीनी ठंढ, हल्के हवा के झोंकों की तलाश बन कर ही रह जाता है. 

इतनी सारी साजिश, माँ दुर्गा कौन करेगा इन साजिशों को विनाश,  एक और माँ?

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