Thursday, 6 November 2014

खाना और खाने का तरीका करता हमें सबसे अलग



खान पान की विविधता

गर्मी और बरसात के आते ही तेलचट्टा, केंचुआ, मकडी, लीच आदि जैसे जीव हमारे चारो तरफ घूमते –फिरते, मस्ती करते नजर आने लगते हैं.  इनमें से कुछ तो हमें जम कर तंग करते हैं. समझ में नहीं आता आखिर ये इतनी ताकत लाते कहाँ से हैं. कभी इन्हें गिलहरी, चिड़िया यहाँ तक की चीटियों की तरह खाते या खाना जमा करते नहीं देखा. चलो कोशिश करते हैं कुछ जानने की.  चलिए थोड़ी सी ताक-झाँक करते हैं इनकी जिन्दगी में.
लन्दन के क्वीन मेरी विश्वविद्यालय में किये रिसर्च हमें बताते हैं कि ठीक हमारी तरह ये तेलचट्टे भी खाने की खोज अपने क्षेत्रीय जानकारी के आधार पर करते हैं साथ ही वह अपने दोस्तों की सलाह पर भी अमल करते हैं. हमें यह तो पता है कि चाहे जैसी भी स्थिति हो ये जीवित रहते हैं. इनके इस गुण का सीधा जुड़ाव इनके खाने पीने की आदत से है, जी हाँ इन्हें जो मिल जाए उसी पर अपनी जिन्दगी काट लेते हैं. हमारा भोजन (दाल, चावल,रोटी, मीट, मछली, दूध, मीठा आदि आदि) के साथ साथ लकड़ी, चमडा, टूथ-पेस्ट, हमारा बाल, नाखून, साबुन, धागा  आदि आदि सब पचा डालता है यह. इनकी संरचना ऐसी है कि ये बड़े आराम से कड़ी से कड़ी चीजों को तोड़ कर पचा लेते है. लकड़ी या पौधे के कड़े भाग (सेल्यूलोज) को पचाने में इनके पेट के अन्दर मौजूद बैक्टीरिया इनकी मदद कर देते है. इनके भोजन का पाचन इनके शरीर के अन्दर ही होता है लेकिन इन्हीं के जाति का दूसरा सदस्य जो अकेला अकेला रह कर खाना पीना पसंद करता है,  ज्यादातर पचे हुए खाना को चूसना पसंद करते है.  मकड़ियां अपने भोजन यानी छोटे मोटे कीड़ों को अपने जाल की मदद से पकड़ लेती हैं, फिर उनके शरीर में अपना जहर इंजेक्ट कर  उन्हें बेहोश कर देती है या मार डालती है. इसके बाद उस शिकार पर खाना पचाने वाला रस उड़ेल कर पचा लेती है, यह सब मकडी के शरीर के बाहर ही होता है. फिर पचा हुआ तरल खाना मकडी के पेट के अन्दर,  और कीड़े का ऊपरी कडा भाग बाहर ही रह जाता है. कितना अंतर है एक ही जाति के दो सदस्य के स्वभाव में हां एक और ख़ास अंतर है तेलचट्टा मिल जुल कर खाना खाता है जबकि मकडी को इस मामले में किसी का साथ पसंद नहीं. इस तरह खान पान में अंतर लगभग हमें सारी जाति में पाया जाता है. चलिए जानवरों की एक और जाति की आदतों पर आदत नजर डालते हैं.
केंचुआ भी हमारी आस पास मिलता है, इसे किसान का दोस्त भी कहते हैं, जबकि इसका दोस्त लीच जो आम तौर पर पानी या गीली जगह पर पाया जाता है को हम दूर ही रखना चाहेंगे. कारण है दोंनो का खान पान. केंचुआ अपना खाना मिट्टी से ले लेता है, सड गल रही पत्तियों , टहनियों के साथ जानवरों का उत्त्सर्जन इनका भोजन होता है. दरअसल  इन सड़ते गलते  भोजन पर पलने वाले बैक्टीरिया और फफूंदी उनका प्रिय भोजन है. ये कुछ समय तक मिट्टी फाँक कर और उससे पोषक तत्व निकाल कर भी ज़िंदा रह सकते हैं. आम तौर पर जमीन के नीचे घर बनाने के लिए ये मिट्टी खोद कर निगल लेते हैं. अपने खान पान के आधार पर केंचुआ अपनी जाति में नीचे तबके का माना जा सकता है और लीच को हम शाही ओहदा दे सकते हैं. जहां एक तरफ केंचुआ मिट्टी और उसमें मिल रही सड़ी गली चीजों से काम चला लेता है वहीं लीच की कुछ किस्म  स्तनधारियों के गरम गर्म खून का पान करती हैं.  ये परजीवी बड़े जानवरों ख़ास कर स्तनधारियों के खून के प्रोटीन का इस्तेमाल खुद को तंदुरुस्त रखने के लिए करते हैं. एक साथ बहुत सारा खून चूस कर यह अपने पाचन तंत्र के ख़ास भाग जिसे हम गिजार्ड कहते में जमा कर लेता है, और फिर आराम के कई दिनों तक  उसका इस्तेमाल करता है. जानवरों के शरीर से खून चूसने की पूरी तैयारी रहती है इनके पास. इनके शिकार सतर्क न हो जाएँ इसलिए वो अपने शिकार की त्वचा पर चिपकने के बाद सबसे पहले  एक दर्द मारने वाला रस उनके  शरीर में डालता  हैं. इससे उनकी उपस्थिति का भान नहीं होता. फिर वो खून के अन्दर खून को ज़मने से रोकने वाला रसायन मिलाता है. इस रसायन के कारण उसके शरीर के अन्दर भी यह खून जम (CLOT) नहीं पाता. ऐसा लीच की कुछ किस्में ही करती हैं,  बाकी किस्में तो कीड़े मकोड़ों को मार कर उस रस को चूस कर अपना काम चलाते हैं. लीच के खून चूसने की आदत  कुछ मामले में हमारे लिए सहायक भी सिद्ध हो रही है. उनके शरीर में जमा खून की मदद से लुप्तप्राय जानवर की जानकारी  प्राप्त करते है हम मनुष्य. इन जीवों के खान पान और खान पान की आदतें प्रकृति के इस अबूझ रूप को समझाने में हमारी बहुत सहायता करती हैं.  


अनुपमा झा
 

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