Sunday, 7 September 2014

चीटियों के कितने रूप कितने रंग कुछ खट्टे तो कुछ तीखे



चीटियों से पहचान
चीटियाँ वाकई बहुत ताकतवर हैं, घर की चीजों में लग जाएँ तो उसे हमारे इस्तेमाल के लायक रहने नहीं देंगी, काटा तो उछलते रहो और तो और किताबों में भी नजर आतीं कभी धीरज का पाठ पढ़ाते तो कभी अथक परिश्रम और न हारने की प्रवृति से रू ब रू कराते हुए. दूरंदेशी के लिए भी इनके उदाहरण मिलते ही रहते हैं. थोड़ा सा मेरा मन भी हो रहा है उनकी दूरंदेशी से जुडी कहानी दोहराने की अरे वही झींगुर और चीटी वाली कहानी. 

गर्मी का मौसम था श्यामल झींगुर इस सुहाने मौसम का मजा ले रहा था. घासों के बीच में घूम घूम कर मजे कर रहा था.सब कुछ इस मौसम में बड़े आराम से मिलता है फिर अभी ही तो घूमा फिरा जा सकता है फिर इस दिन को बेकार क्यों जाने दें. झींगुर खाना खा पी कर आराम कर रहा था उसके नजर चिंटू चींटी पर पडी. यह क्या यह तो खाना ढोने में लगा पडा है. सुबह से ही उसे देखा है खाना जमा करते हुए. कितना बड़ा बेवकूफ है, इतना अच्छा मौसम इसको यूं ही गवां रहा है यह. श्यामल से रहा नहीं गया उछलता कूदता वह चिंटू के पास पहुंच गया. चिंटू को समझाने की कोशिश करता हुआ बोला,”अरे चिंटू, इतना खुला मौसम है, क्यों दिन गँवा रहे हो. आओ हमारे साथ मजे करो.” इसपर चिंटू ने मुस्कुराते हुए कहा,’ खुले मौसम का ही फ़ायदा उठा रहा हूँ. बुरे मौसम के लिए खाना और जरूरत का सामान इक्कठा कर रहा हूँ, श्यामल भैया.” “अरे अभी से बुरे मौसम की चिंता क्यों कर रहे हो, ऐसा कभी नहीं होगा, छोडो चलो मेरे साथ”. श्यामल ने कहा. इसपर चिंटू ने हँसते हुए कहा, “ नहीं, श्यामल भैया, सामान इकठ्ठा कर लूं, आने वाले समय की तैयारी तो रहनी चाहिए.” झींगुर को उसकी बेवकूफी पर हंसी आई. चिंटू का मजाक उडाता वह खेलने में जुट गया.
धीरे धीरे सुहाने दिन खत्म हो गए, ठंढ का मौसम आ गया. जरूरत का सामान और खाने की तंगी हो गयी. श्यामल झींगुर को बहुत भूख लगी थी, यहाँ वहां मारे मारे फिर रहा था फिर भी खाना नहीं मिल रहा था. भटकते भटकते वह चिंटू चींटी के घर के पास पहुंचा, वहां उसने चिंटू और उसके परिवार को बड़ा निश्चिन्त पाया. इस मुश्किल के दिन में भी वे परेशान नहीं थे, चिंटू और उसके परिवार वाले जमा खाना और जरूरत की चीजें इस्तेमाल कर रहे थे. श्यामल को देख चिंटू ने उसे बुलाया और खाने का सामान दिया. श्यामल ने हिचकते हुए चिंटू से पूछा ,”आखिर ऐसे मुश्किल समय में तुम्हें खाना कहाँ से मिल गया”. इस पर चिंटू ने बताया,” गर्मियों में ही जमा किया था”. यह सुन श्यामल बहुत शर्मिंदा हो गया उसे याद आ गया चिंटू ने उसे खबरदार कर दिया था लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया था.
यहाँ भी चीटियों की दूरंदेशी का पता चलता है, है न.
इस तरह की न जाने कितनी चीटियों से जुडी कहानियां हमारे चारो तरफ बिखरी पडी है, जो हमें इन चीटियों के स्वभाव से परिचित करवाता रहता है. इन कहानियों में तो हम पूरी चीटियों के कौम के स्वभाव की बात की जाती है. हाँ, हमारे आस पास हमें तरह तरह की चीटियाँ दिखाई पड़ती है. कुछ काली, कुछ छोटी, कुछ लाल, कुछ नारंगी, कुछ बुरी तरह काटतीं है, कुछ लकड़ियों में रहतीं हैं, तो कुछ खेत में. जी हाँ चीटियों की अलग अलग बिरादरी है. हर बिरादरी का अलग अलग स्वभाव है. इन चीटियों की एक किस्म है जिसे हम गुच्छ चीटियाँ/सिट्रोनेला एन्ट  कहते हैं. इन चीटियों की खासियत है इनका नारंगी रंग और नींबू जैसी गंध जो वो कुचले जाने के बाद छोड़ती  हैं. इनमें पंख वाली चीटियाँ थोड़े गाढे रंग की होती हैं. ये चीटियाँ घरों में घुसपैठ करती हैं ख़ास कर उनके प्रजनन के समय में. परन्तु ये घर या खाने के सामान को नुक्सान नहीं पहुंचातीं सिर्फ हमें चिढाती हैं. जबकि कारपेंटर एन्ट /बढ़ई चीटियाँ घरों में घुसती हैं तो बरबादी का समाचार साथ साथ आता है. ये चीटियाँ दीमक की तरह लकड़ियों से बने सामान को तो खाती नहीं हैं. परन्तु उनमें ख़ास कर गीली लकडियाँ में घर जरूर बना लेती हैं. परिणामस्वरूप घर की लकड़ियों के सामान के लिए खतरा जरूर है. गीली लकड़ियों के सामान के लिए हम इन्हें भले ही खतरा मानें पर यह हमारे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosyatem) में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है सड़ते लकड़ियों को खा कर. हार्वेस्टर एन्ट  जो रेगिस्तान और प्रेयरीज़ में पाई जातीं हैं, पौधों के बीज को फसल से बीज अलग कर अपने खाने के लिए अपने घोंसले में जमा कर लेते हैं. इतना ही नहीं अगर ये बीज उनके घोंसले में गीले हो जाते हैं तो  चीटियाँ उन्हें घोंसले से बाहर ला कर सुखाती हैं. इन चीटियों का घर घास के बीच में होता है, और अपने घर के आस पास के पौधों को ये पत्ती विहीन कर देतीं हैं. अपने घर की तरफ ये किसी को आँख उठा कर देखने नहीं देतीं घर को बचाने के लिए इतनी जोर से काटतीं हैं, कि उसके आस पास फटकने की कोई जुर्रत नहीं करता.  ठीक इनकी तरह फायर चीटियाँ भी अपने घर की तरफ किसी को बढ़ने नहीं देतीं. अगर कोई खुली, जगह पर बने उनके घर की तरफ जाता है या उन्हें किसी से भी खतरा लगता उसे इस बुरी तरह काटती हैं, कि उन्हें लगता कि वह आग की लपटों में घिर गया है. छोटी छोटी इन चीटियों से बच कर ही रहना चाहिए. याद रहे पार्क, मैदान जैसे खुले और रौशन स्थान इन्हें घर बनाने के लिए सबसे उपयुक्त लगते हैं. इनका जहर बहुत तेज होता है. ये लाल रंग की छोटी छोटी फायर चीटियाँ (fire ant), काली आकार में थोड़ी बड़ी फिल्ड/मैदानी चीटियों से अलग होती हैं. ये फील्ड/मैदानी चीटियाँ भी खुले और रोशनी से भरे मैदान में ही अपना आशियाना सजाती हैं. इनका घर काफी बड़ा होता है जो ६ फीट तक चौड़ा और ३ तक फीट ऊंचा हो सकता है. शायद इन्हीं चीटियों ने वाल्मीकि मुनी को ढंका होगा. इन चीटियों का डंक भी बहुत खुजली पैदा करता है ये फार्मिक अम्ल छोड़तीं हैं, इसलिए इन्हें फार्मिक एन्ट भी कहते हैं. इस जाति की लाखों वर्कर चीटियाँ हजारो मील तक फ़ैली हो सकती हैं और बड़ी बड़ी कॉलोनी बना सकती हैं. ओड़ोरस हाउस एन्ट ने अपने घर को बचाए रखने के लिए एक दूसरा रास्ता अख्तियार किया है. ये चीटियाँ ब्युटेरीक अम्ल का स्त्राव करती हैं. यह स्त्राव सड़े नारियल या मक्खन की तरह अपनी बदबू फैलाता है. गनीमत है यह हमारे घर में निवास नहीं करता. इसे घर के बाहर रहना पसंद है जहां यह पत्थर या लकड़ी के टुकडे  के नीचे अपना निवास स्थान बनाती है. अगर यह घरों में घुसपैठ करती है तो सिर्फ मीठे की तलाश में. इसलिए इससे बचने के लिए मिठाई को डिब्बे में बंद ही रखें. हांलाकि मैं जानती हूँ इस बदबू को आपने बहुत बार झेला है. आमतौर पर ये चीटियाँ हमारे घर घुस चीजें चोरी करतीं हैं. आपको पता है कुछ चीटियाँ एक दूसरे के घर में भी चोरी करती हैं, हाँ यह काम सिर्फ मनुष्य ही नहीं करते. ये हैं चोर चीटियाँ/थीफ एन्ट. ये प्रोटीन की लालची होती है मीट, घी जैसी चीजों की प्रेमी हैं ये. दूसरी चीटियों का खाना और रहना दोंनो ही चुरा लेने में माहिर. आम तौर पर ये हमारे घर के बाहर रहती हैं, लेकिन अगर घर के अन्दर आ गईं तो छोटी छोटी इन चीटियों से निजात पाना एक मुश्किल टास्क हो जाता है. चलिए खैर मनाये ये तो सिर्फ खाना चुराती हैं, अमेज़न चीटियाँ तो लड़ाकू की तरह दूसरी चीटियों के घर पर हमला कर उस घर की वर्कर चीटियों को अपना दास बना लेती हैं.  अमेज़न रानी चीटी फिल्ड रानी चीटी को मार डालती है और उसकी वर्कर चीटियों को अपना दास बना अपने अण्डों की देख भाल करवाती है. बहुत बार यह फील्ड चीटियों के घोंसले से उनके अंडे उठा लाती है, इस तरह वह यह सुनिश्चित कर लेती है कि भविष्य में भी उसके पास दास की सेना होगी. चलिए चोर लुटेरे की बात तो हो गयी अब कुछ ऐसी चीटियों की बात करते हैं जो बड़ी सुगढ़ हैं. ये हैं लीफ कटर एन्ट. ये चीटियाँ कुशल किसान हैं और हमसे बहुत पहले से इन्होने खेती करना सीख लिया था. ये पौधों ख़ास कर पत्तियों के टुकड़ों को अपने पीठ पर लाद  कर अपने घोंसले तक ले जाती हैं. इनके घांसले आम तौर पर जमीन के नीचे पाए जाते हैं. यहाँ ये इन पत्तियों को चबाती हैं और फिर इन चबाई गयी पत्तियों का इस्तेमाल  फफूंदी उगाने के लिए  करती हैं. ये फफूंदी इनके भोजन हैं. इन फफूदों से यह एंटी-बायटिक  भी तैयार करती हैं. जिनकी सहायता से वे अनचाहे फफूंद का विकास रोक देती हैं. जब एक रानी नया घोसला बनाती है वह फफूंद का जोरन  अपने साथ लाती है. कितनी समझदार है ये चीटियाँ. आखिर में एक पागल सी चीटी की प्रजाति की चर्चा करते हैं, जो हमारे कम्प्यूटर में छुपी बैठी हो सकती है. ये हैं क्रेजी एन्ट . ये चीटियाँ अन्य चीटियों की तरह क्रम बद्ध  तरीके से अच्छे बच्चे की तरह चलती नजर नहीं आती. शैतान बच्चों की तरह इधर उधर बिना मतलब का दौड़ती रहती है. इनके पैर और एंटीना लम्बे लम्बे होते हैं इनका आवास भी बाहर होता है, पर जैसा बताया इन्हें हमारे कंप्यूटर आदि के ठंढे ठंढे छेद/फांक बहुत पसंद हैं. तो ये हैं हमारे साथ साथ और आस पास घूमती चीटियाँ।

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