Wednesday, 3 September 2014

मकडी का जाल २



मकडी का जाल:  क्या और कैसे

अपने बिस्तर पर लेटे लेटे छत पर या दीवाल के कोने में नजर जाती है तो अक्सर वहां मकडी का जाला विराजमान नजर आता है. आज हटाओ दो दिन बाद फिर वहीं या आस पास कहीं नजर आ ही जाता है यह जाला.  बहुत बार होता है हम पेड़ों के पास से गुजरते हैं तब वहां कुछ नहीं होता लेकिन आधे घटे बाद ही बड़ा सा जाला तैयार मिलता है. बहुत आश्चर्य होता है इस कारीगर पर, पतला सा दिखने वाला धागा जिससे यह जाला बनता है बड़ा ही मजबूत और लचीला नजर आता है. इतना तो समझ में आता है कि मकडा/मकडी इसका इस्तेमाल कीड़े मकौड़े पकड़ने के लिए करती है जिससे वह अपनी भूख मिटा सके. जितना मकडी द्वारा इसे इतनी तेजी से बनाना हमें अचरज में डाला उससे भी ज्यादा अचरज में डालने वाला इसके बनाने का तरीका और इस धागे का स्वभाव. इत्ती सी मकडी पर कैसी बुनकर है. 

जब मकडी पानी से जमीन की तरफ आये इन्होंने अपने शरीर और अंडे को बचाने के लिए धागे/सिल्क बनाना शुरू किया. धीरे धीरे इन मकड़ियों ने इन धागों/सिल्क का इस्तेमाल खुद के लिए कीड़े मकोड़े पकड़ने के लिए करना शुरू किया. इन मकड़ियों के शरीर (पेट) पर कुछ ग्रंथियां होती हैं, जिनसे सिल्क के धागे बनते हैं. अभी तक सात अलग अलग प्रकार की ग्रथियों की जानकारी है. हर प्रकार की ग्रंथी से एक ख़ास प्रकार का धागा बनता है. लेकिन किसी भी मकडी के पास सातों प्रकार की ग्रंथियां नहीं होतीं. आम तौर पर एक मकडी के पास तीन जोड़े  धागा कातने वाले स्पिनर पाए जाते  है,  पर किसी किसी के पास सिर्फ एक जोड़ा ही होता है और कुछ के पास चार जोड़े. इन स्पिनर में बहुत सारी नलियां होतीं हैं, जो मकडी के शरीर पर पाई जाने वाली ग्रंथियों से जुडी होती हैं. इन ग्रंथियों के स्त्राव से धागे बनाते हैं, ये धागे काफी पतले होते हैं , इतने पतले की हम उन्हें खुली आँखों से देख नहीं सकते. ये हमें उन पड रही सूरज की रोशनी के कारण नजर आते हैं. यह धागा बहुत मजबूत होता है इतना मजबूत कि काफी तेजी से उड़ रही मक्खी को भी रोक साकता है. यह धागा दरअसल एक प्रोटीन का बना होता जो गर्थी के बाहर पाए जाने वाले फाइब्रिन नामक पदार्थ के साथ मिलकर अपनी मजबूती और लचीलेपन को और भी बढ़ा देता है.
हाँ एक सवाल जरूर उठता है कि अगर यह प्रोटीन है तो बाकी प्रोटीन की तरह इसे फफूंदी या जीवाणु नष्ट क्यों नहीं कर पाते. मकड़े के धागे में तीन ऐसी चीजें पाई जाती हैं जो इसे सड़ने-गलने से बचाए रखती हैं. ये हैं पायरोलिन जो पानी सोख सकता है, और धागे को सूखने से बचाता है, दूसरा है पोटासियम हाइड्रोजन फोसफेट जो धागे को एसिडिक बनाए रखता है जिसके कारण यह जीवाणु और फफूंदी से बच जाता है, और पोटासियम नाइट्रेट प्रोटीन को टूटने से बचाता है. यह तो हुई एक खूबी इसके अलावा यह काफी लचीला भी होता है इसे 30 से 40%  तक खींचा जा सकता है जबकि एक स्टील का धागा सिर्फ 8% तक ही खींचा जा सकता है. कितनी अजीब है यह रचना.

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