होली रे होली तेरे कितने रंग
इस
बार मेरी होली अपने अंदाज से काफी अलग थी. आस पास में होली के रंग अबीर गुलाल के
रूप में नहीं बिखरे हैं, बिखरे हैं तो मौसम के मनमोहक अंदाज में. ऐसे में होली के
विभिन्न रंगों को समटने की इच्छा जरूर जग गयी. पर्व और पर्व से जुडी रंग बिरंगी
कहानियाँ और मान्यताएं मुझे हमेशा से लुभाती रही हैं. फिर होली के अलग अलग रंग को
तो मैंने देखा भी है. बस थोड़ा पन्ने पलटने लगी. उन पन्नों को पलटते पलटते यह तो
समझ में आ गया कि यह उल्लास और जिन्दगी से भरा पर्व है. होली में बिखरने वाले सारे
रंग वह बिहार में बिखरें या उत्तर प्रदेश या फिर बंगाल, उड़ीसा, मणीपुर, गोवा या मेघालय
की धरती पर फैलें, वसंत ऋतू और जिन्दगी के
उल्लास के मुस्कुराने की घोषणा करते हैं. प्रकृति अपनी मुस्कराहट को गेंहूं के फसल
की कटाई, पलास या टेसू के सूर्ख फूल के रूप में बिखरे रंगों, भीनी भीनी खुशबू वाली
आम की बौर, कोयल की चहक, मोर की छनक के साथ बिखेरती नजर आती है. प्रकृति की इस
खुशी में सहभागी होने का ही एक रूप है होली का यह पर्व. अब पर्व को मनाने का बहाना
तो चाहिए ही बस अनेक कहानियों को जोड़ लिया इस बहाने को एक स्वरूप देने के लिए.
जितने क्षेत्र कहानी के भी उतने ही अंदाज. कहानियाँ
ही नहीं हर क्षेत्र अपने ख़ास अंदाज से रंगता नजर आता है इस पर्व को. चलिए थोड़ा उन
अंदाज के रंग हो देखते हैं.
प्रहलाद,
होलिका और होलिका दहन के बीच के सम्बन्ध से तो हम सब वाकिफ हैं. यह कहानी हर जगह
व्याप्त है. एक दूसरी कहानी शिव और कामदेव से इस पर्व का जुड़ाव दर्शाती है. इस
कहानी के अनुसार भगवान शिव सती के बलिदान के बाद आपे में नही थे, उन्होंने अपना
विनाशकारी रूप धर लिया था. अनके प्रयास से वह कुछ शान्त तो हुए पर उन्होंने दुनिया
से नाता तोड़ लिया था. उनके इस व्यवहार के
कारण सृष्टी खतरे में आ गयी. सती ने पार्वती के रूप जन्म लिया किन्तु शिव दुनिया
से जुड़ने तैयार नहीं थे. थक कर पार्वती ने कामदेव से सहायता मांगीं. कामदेव ने अपने धनुष से शिव पर
वार किया बदले में वह शिव की क्रोधाग्नि का शिकार हुए और भष्म कर दिए गए. जिसदिन कामदेव दुनिया की भलाई के लिए भष्म के
रूप में परिवर्तित हुए उस दिन को होली के
रूप में जाना गया. इसी वजह से होली के अवसर पर कामदेव को चन्दन का लेप अर्पित करते
हैं.
इस
पर्व का एक तीसरा रंग भी है. यह कहानी है दैत्य धुन्धी की. इसे भोले
शंकर का वरदान प्राप्त था. उस वरदान के अनुसार उसे न तो कोई देवता मार सकता था और
न ही कोई मनुष्य. बस इसका फायदा उठा यह अपना कहर बरसा रही थी. पर शिव ने इसे एक
श्राप भी दिया था और वह था कि वह बच्चों की शैतानियों से वह हार
जाएगी. बस होली के दिन बच्चों ने दौड़ा दौड़ा कर इस दुष्टा का खात्मा कर दिया. इस
कहानी को सुन यह समझ आया कि आखिरकार होली के दिन इतनी शैतानियाँ क्यूं बख्श दी
जाती हैं.
इन
सब कहानियों के साथ इस पर्व से जुडी सबसे मनमोहक कहानी है राधा कृष्ण के साथ की.
राधा के उज्जवल रंग से कुंठित कृष्ण को यशोदा मैया ने सुझाया था कि वह राधा को
किसी रंग से रंग दें उनका उज्जवल रंग थोड़ा फीका पड़ जाएगा. बस श्याम ने रंगों की
बरसात कर डाली थी राधा पर.
यह
सब कहानियाँ होली के रंगीन मिजाज का आयना हैं. पर हर प्रदेश में होली को मनाने का
अंदाज भी कम निराला नहीं है. मथुरा की
लठ्ठमार होली का अपना रूप है जहां नन्दगाँव के छोरे गोपियों को छेड़ने के कारण लठ्ठ
से पीटे जाते हैं. बड़े बड़े घूंघट के अनादर से लठ्ठ चलाती महिलायें और उनके वार से
खुद को बचाते नन्दगांव के छोरे एक नया रंग जमाते हैं.
वहीं
बंगाल में दोल यात्रा के दौरान राधा कृष्ण को झूला या पालकी में बिठा फाग (गुलाल)
और रंगीन गीत के साथ समय के खुशनुमा मिजाज का मजा लिया जाता है. गुरूदेव ने तो इसे वसंत उत्सव का रूप दे दिया
है. शान्ति निकेतन में यह समय उलास और रंगीनियों का समय है.
होली
का रंग मणीपुर की होली की चर्चा के बिना अधूरा है. यहाँ इसे योसांग
के नाम से जानते हैं. फाल्गुन पूर्णिमा से शुरू होकर पूरे 7 दिनों
का उत्सव होता है यह. यहाँ भी वैष्णव सम्प्रदाय की छाप साफ़ नजर आती ही. यहाँ के मयती
सम्प्रदाय का यह प्रमुख पर्व है. इस सम्प्रदाय के लोगों ने चैतन्य महापभु के
संसर्ग में आकर इस पर्व को एक नया आयाम दिया. इस प्रदेश में योसांग का जुड़ाव पके
फसल को खेतों से घर लाने की प्रक्रिया से था, परन्तु अब इसका केंद्र भगवान् कृष्ण
की रंगीली छवि भी हो गयी है. यहाँ भी इस पर्व की शुरूआत फाल्गुन पूर्णिमा से होती
है. योसांग शब्द का अर्थ होता है झोंपड़ी. पूर्णिमा के दिन बांस की झोंपड़ी बना कर
उसके अन्दर चैतन्य महाप्रभु की तस्वीर स्थापित
की जाती है. उस तस्वीर की विधि पूर्वक पूजा होती है. पूजा के बाद शाम को तस्वीर को
झोंपड़ी से हटा लिया जाता है और झोंपड़ी में आग लगा कर इस इस पर्व की शुरूआत होती
है. झोंपड़ी में आग लगाना काफी शुभ माना जाता है .यहाँ इस पर्व का सामाजिक रूप
सामने आते है. छोटे बच्चे घर घर जाकर पैसे इकठ्ठा करते हैं.और उन पैसों से मजे
करते हैं. इतना ही नहीं चांदनी से भरी रात में यानी पूर्णिमा के दिन यहाँ की
लड़किओं को छो मिलाती है, उस दिन वह लड़कों से मिल सकती हैं, उनके साथ नृत्य करती हैं
और बदले में पैसे भी वसूलती हैं. है न मजेदार. आनद का एक और रूप इस पर्व को ख़ास
बनाता है और वह है तरह तरह के खेल कूद का
आयोजन. आज के इस बदलते दौर में मणीपुर में इस पर्व का मुख्य आकर्षण खेल कूद का
वृहत आयोजन बन गया है. यानी इस पर्व ने भी खुद को विकास की प्रक्रिया से जोड़ कर
रखा है.
यह
तो है होली का मणिपुरी रूप. ठीक इसी तरह गोवा की होली भी कम मनभावक नहीं होती.
यहाँ यह शिगमोई के नाम से जानी जाती है. यह पांच दिन लम्बा पर्व होता है. खुशी और खुशमिजाजी का
प्रतीक. जाड़े की फसल की कटाई से इसका जुड़ाव यहाँ भी अपना गहरा रंग दर्शाता है. यह
रंग भगवान की प्रतिमाओं की यात्रा के साथ गुलाल के रूप में चारो तरफ फैलता है. शाम
के समय यह तरह तरह के क्षेत्रीय नृत्य के रूप में चारो तरफ बिखर जाता है. अलग अलग
तरह की धार्मिक कथाओं पर आधारित “घोड़े
मोरनी” यानी अश्व नृत्य आपको बांधे रखने के लिए काफी है.
तो
किस सोच में डूब गए अगले साल होली के समय कहाँ जाना चाहिए. कहीं भी जाएँ खुशी और
मस्ती के रंग में सराबोर होना तय है क्योंकि गोंड जाति के कबीले इसी दौरान अपने
जीवन साथी का चुनाव करते हैं.
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